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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Monday, October 7, 2024

झूठा नहीं है

Behr (1222 1222 1222 122)

ग़ज़ल कहता हुआ शायर अभी फूटा नहीं है 
है उसका दिल अभी मायूस वो टूटा नहीं है 
समझना है नहीं आसां उसे मैं जानता हूँ 
वो उलटी बात कहता है मगर झूठा नहीं है 

उधेड़ो मत मेरे रिश्तों की गांठें इस क़दर तुम 
मेरी मानो अभी इतना भी वो छूटा नहीं है 
मुझे लगता नहीं वाजिब उसे तोहमत लगाना 
मैं खुद ही लुट गया उसने मुझे लूटा नहीं है 

ये सच है के मुझे मुमकिन नहीं मंज़ूर करना 
किसी में भी यहाँ इतना तो बल बूता नहीं है 
जो मैं मंज़ूर ना हूँ तो भी मुझको देख लेना 
फ़क़त शादाब की खातिर ये अंगूठा नहीं है 

उखड़ तो वो भी जाएगा किसी दिन ज़लज़ले में 
रहा हो ता उमर ऐसा कोई खूंटा नहीं है 
ये दुनिया झूठ है जैसे कोई सपना सुहाना 
यहाँ कुछ सच नहीं है और कुछ सच्चा नहीं है 

वो गुड्डी आसमानों में ही उड़ना चाहती है 
परेतों में मगर उसके अभी सूता नहीं है 
मिलेगी इंतहा ए लल्कारें उसको इस जहाँ में 
मगर अच्छा है के उस से जहाँ रूठा नहीं है 

ये नज़रें खैंचते हो क्या ये लहज़ा लाज़मी है 
कोई सोचो तेरी महफ़िल में क्यूँ आता नहीं हैं 
तसव्वुर खाब की बातें तुम्ही क्या जानते हो 
उन्हें भी खाब आते हैं जिन्हें दिखता नहीं हैं 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...