About Me
- Vivek Pohre
- I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Wednesday, February 12, 2025
दिन आ रहे हैं
Tuesday, February 11, 2025
कोई पागल समझता है
और भी हैं
असली शायर: अल्लामा इक़बाल
निगाहों परे आसमाँ और भी हैं
यहीं इक नहीं आशियाँ और भी हैं
है सर पे फ़लक हैं फ़लक पे सितारे
सितारों के आगे जहाँ और भी हैं
नहीं तू सही, तू नहीं इक सहारा
मेरे हुस्न के कद्रदाँ और भी हैं
किसी इक ज़बाँ की नहीं मिल्कियत तू
मोहब्बत तेरे हम ज़ुबाँ और भी हैं
गुनाहों की बातें ज़रा रुक के सुनना
मेरे दोस्तों के बयाँ और भी हैं
है फ़ेहरिस्त लंबी यही बस नहीं है
मेरे नाम पे ग़लतियाँ और भी हैं
क्या 'ज़ाहिर' सभी अश्क़ तुझपे लूटा दूँ
अभी तुम चलो बे कुआँ और भी हैं
ख़ुशी मत मनाना अगर बैठ जाऊँ
मेरे पास तीर-ओ-कमाँ और भी हैं
Monday, February 10, 2025
देखता रह गया
असली शायर: अज़ीज़ क़ैसी
आपको देख कर देखता रह गया
मैं भरी भीड़ में बुत बना रह गया
वो तो घर पे ही थे आईने में मेरे
और मैं दो जहाँ ढूँढता रह गया
ख़ाब उनके हुए सच, थे जो ख़ाब में
ख़ाब मेरा सजा का सजा रह गया
जिनसे मिलता हूँ उनका पता है पता
जो नहीं मिल सका ला पता रह गया
कितने अरसे हुए मिलके उनसे मुझे
सोचते सोचते सोचता रह गया
दिल में इज़हार था और लब थे सिले
सोचता था कहूँ हर दफ़ा रह गया
रात 'ज़ाहिर' बहुत बादलों की हुई
देख ले अब खुला आसमा रह गया
मंजिलें मिल गई उनको जो रुक गए
रासता बे-ग़रज़ रासता रह गया
है मुसलमाँ का मक्का मदीना अना
पूछ दिल कितना पाक-ओ-सफ़ा रह गया
Sunday, January 12, 2025
उजाला
Wednesday, December 4, 2024
याद आना चाहता हूँ
Wednesday, October 16, 2024
साहब
Saturday, September 14, 2024
अख़बार
ख़ामोशी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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दिल की ये धड़कन इबादत सी है और तेरी मुरादें इनायत सी है ज़िंदा तो वैसे भी रह लेते हम पर दिल को धड़कने की आदत सी है बातें करूँ दिन की रा...
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Bahr: 2122 1212 22 इश्क़ की हद को पार कर बैठा दिल ये दुश्मन से प्यार कर बैठा उसका आना हुआ जो बज़्म ए मज़ार आँख दो से मैं चार कर बैठा दिल स...