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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Wednesday, February 12, 2025

दिन आ रहे हैं


क़रीबी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं

हवा मीठी मीठी गुलाबी गुलाबी
मुहब्बत जताने के दिन आ रहे हैं

अभी जिनको उड़ने की न हो इजाज़त
तो पर फड़ फड़ाने के दिन आ रहे हैं

लिखे शेर जो रात दिन जिनकी ख़ातिर
वो पढ़ने पढ़ाने के दिन आ रहे हैं

उन्हें जो सुना हो कभी गुनगुनाते
वो गाने बजाने के दिन आ रहे हैं

जो रूठे हुए हैं बिना बात के ही
उन्हें फिर मनाने के दिन आ रहे हैं

है ठंडी हवा धूप भी बढ़ रही है
कबूतर उड़ाने के दिन आ रहे हैं

कोई दोस्त हों या पडोसी तुम्हारे
सभी को जलाने के दिन आ रहे हैं

नज़र जो चुराते थे अब तक उन्हीं से
तो नज़रें मिलाने के दिन आ रहे हैं

कहीं तन्हा बैठे अकेले अकेले
यूँही बड़बड़ाने के दिन आ रहे हैं

कहीं कोई लैला न मिल जाए 'ज़ाहिर'
ये दाढ़ी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं

Tuesday, February 11, 2025

कोई पागल समझता है

असली शायर: कुमार विश्वास 

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
कोई ठोकर से है मुझको हुआ घायल समझता है
मैं घायल जानता हूँ हूँ मैं दीवाना मैं पागल हूँ
मगर दीवाने की हालत तो बस पागल समझता है

ये लड्डू है बना घी से तभी ये टेढ़ा मेढ़ा है
मगर तू हाय क्यों जाने इसे मगदल समझता है

कहाँ किस रासते आती है जाड़ों में किनारों से 
हवा घुसती कहाँ से है तेरा कंबल समझता है

कभी दिल्ली का बाशिंदा चला जाता है गर ऊटी
तमिल नाडू को बेचारा हरा केरल समझता है

मेरे बाबा जो कहते थे वो सहगल और है कोई 
मेरा बेटा किसी रैपर को ही सहगल समझता है

दिखाकर और सिखाकर भी किसी को कुछ नहीं समझा 
मगर 'ज़ाहिर' तो आँखों के हर इक सिग्नल समझता है

कभी भी छोड़ना मत अपनी माँ का पाक सा पल्लू
ये तेरा आसमाँ है जिसको तू आँचल समझता है
(आस माँ की आसमाँ है जिसे आँचल समझता है )

और भी हैं

असली शायर: अल्लामा इक़बाल 


निगाहों परे आसमाँ और भी हैं 

यहीं इक नहीं आशियाँ और भी हैं 

है सर पे फ़लक हैं फ़लक पे सितारे 

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं 


नहीं तू सही, तू नहीं इक सहारा 

मेरे हुस्न के कद्रदाँ और भी हैं 


किसी इक ज़बाँ की नहीं मिल्कियत तू  

मोहब्बत तेरे हम ज़ुबाँ और भी हैं


गुनाहों की बातें ज़रा रुक के सुनना 

मेरे दोस्तों के बयाँ और भी हैं


है फ़ेहरिस्त लंबी यही बस नहीं है 

मेरे नाम पे ग़लतियाँ और भी हैं 


क्या 'ज़ाहिर' सभी अश्क़ तुझपे लूटा दूँ 

अभी तुम चलो बे कुआँ और भी हैं 


ख़ुशी मत मनाना अगर बैठ जाऊँ

मेरे पास तीर-ओ-कमाँ और भी हैं 

Monday, February 10, 2025

देखता रह गया

असली शायर: अज़ीज़ क़ैसी


आपको देख कर देखता रह गया

मैं भरी भीड़ में बुत बना रह गया 


वो तो घर पे ही थे आईने में मेरे 

और मैं दो जहाँ ढूँढता रह गया 


ख़ाब उनके हुए सच, थे जो ख़ाब में 

ख़ाब मेरा सजा का सजा रह गया


जिनसे मिलता हूँ उनका पता है पता 

जो नहीं मिल सका ला पता रह गया 


कितने अरसे हुए मिलके उनसे मुझे

सोचते सोचते सोचता रह गया


दिल में इज़हार था और लब थे सिले 

सोचता था कहूँ हर दफ़ा रह गया 


रात 'ज़ाहिर' बहुत बादलों की हुई 

देख ले अब खुला आसमा रह गया 


मंजिलें मिल गई उनको जो रुक गए

रासता बे-ग़रज़ रासता रह गया

है मुसलमाँ का मक्का मदीना अना 

पूछ दिल कितना पाक--सफ़ा रह गया

Sunday, January 12, 2025

उजाला

असली शायर: फ़हमी बदायूनी 

ये माना के तुमने संभाला मुझे 
मेरी ज़ुल्मतों से निकाला मुझे 
महरबाँ मगर मैं परेशान हूँ 
बहुत चुभ रहा है उजाला मुझे
[जुलमत = darkness]

हरा लाल नीला गुलाबी नहीं  
कोई ला के दे रंग काला मुझे 
 
फ़िसलता चला जा रहा था कहीं 
तभी मुश्किलों ने संभाला मुझे 

मैं करता भी कैसे नवाज़िश वहाँ 
के नज़रों ने ही मार डाला मुझे 
[नवाज़िश = appreciate/respect]

चमकता था सिक्के की मानिंद मैं 
तभी तक सभी ने उछाला मुझे 
[मानिंद = like something, की तरह ]

वो कहता रहा मैं भी सेहता रहा 
अरे बुत बनाकर उबाला मुझे 
[बुत = statue/frozen]

मैं 'ज़ाहिर' हूँ बेबस करूँ शायरी
नहीं चाहिए कोई हाला मुझे
[हाला = शराब]

Wednesday, December 4, 2024

याद आना चाहता हूँ

असली शायर: फ़हमी बदायूनी 

मैं बस के ये बताना चाहता हूँ
मैं तुमसे दूर जाना चाहता हूँ
के हिज्र में किसी कमी की तरह
मैं तुमको याद आना चाहता हूँ

ये तुमसे दिल धड़क रहा है मेरा 
मैं इसका मेहनताना चाहता हूँ

ये कैसा वक़्त हो चला है अभी 
मैं वो अपना ज़माना चाहता हूँ

ये किसने बद्तमीज़ हद बनाई
मैं इसके पार जाना चाहता हूँ

बस एक शै पे क्या उछलते हो तुम
मैं तुमसे मात खाना चाहता हूँ

तुम मेरे हो के तुम मेरे ही तो हो 
'ज़ाहिर' है तुमको पाना चाहता हूँ

Wednesday, October 16, 2024

साहब

Behr (2122 1122 1122 22)

सोचना जब भी क़दम कोई उठाना साहब
लौट के आता नहीं गुज़रा ज़माना साहब

फिर न पूछो के पता मेरा नहीं है कोई 
भूलने दो ना मुझे मेरा ठिकाना साहब 

कुछ मिला ही नहीं खाबों में उन्हें पाने से
अब तो बेहतर है उन्हें भूल ही जाना साहब

कुछ तो नग़मे हैं के जिनमें हैं सुहानी यादें
फिर चला देना मिरा गाना पुराना साहब

खुद मिली हो जो सज़ा याद कहाँ आती है
भूल जाता हूं ज़रा मुझको डराना साहब 

हैं निगाहें भरी महफ़िल में वजाहत पर ही
आप साहब हैं सभी ने ये कहा ना साहब

दो निवाले थे हमारी भी निगाहों में कभी 
पर अब अच्छा नहीं लगता है ये खाना साहब

मुझको आगे नहीं ला सकते हो तो मत लाना
कम से कम पीछे तो मुझको ना गिराना साहब
 
चोट लग सकती है शायर को ज़रा हौले से
इतना आसाँ नहीं कोई वज़्न गिराना साहब

Saturday, September 14, 2024

अख़बार

असली शायर: अदा जाफ़री 

तिरे छत की मिरी छत से नज़र दो चार हो जाना 
बिना इज़हार या इनकार के यूँ प्यार हो जाना 
कभी होता था अपनी गुफ़्तगू का ढंग वो नादिर 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हमारे शेर छपते थे तुम्हारी बात छपती थी 
ना जाने किस जनम की किस वतन की बात कबकी थी 
अगर कुछ याद आए तो ज़हन मेरे उतर आना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हुआ अरसा ऍ मेरे दोस्त मिलने तो कभी आना 
मेरी बातें भी सुन लेना और अपनी भी सुना जाना 
अगर कोई बात ना आए ज़हन में तो ये कर लेना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

वो मल्लाह आज भी कहता है बाबू और कैसे हो 
हम उसको नोट देते तो कहते थे के पैसे दो 
हमें बैठा के कश्ती में यही वो काम करता था 
कभी इस पार को आना कभी उस पार को जाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

किसी को सीख देनी हो किसी से सीख लेनी हो 
किसी को दान देना हो किसी से भीख लेनी हो 
जो जैसा हो उसे वैसी ही सूरत अपनी दिखलाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना 

हर इक इंसान पौधे जान की क्या है यहाँ फितरत
बता जाते हैं अज़मत से हर इक शय की यहां कीमत 
यहीं नस्लों ने एक दूजे को जाना और पहचाना
कभी अखबार पढ़ लेना कभी अखबार हो जाना

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...