About Me
- Vivek Pohre
- I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Friday, May 31, 2024
दिल चाहता है
Wednesday, May 29, 2024
अब चलो जाओ
Monday, May 27, 2024
कुछ बातें
कुछ बातें
तो रह जाती हैं बातों में
जो खुद से ही
कभी कहते हैं रातों में
धुंधली सी
आँखों की बरसातों में
कुछ बातें
झूमती हैं हवाओं में
रह जाती हैं कुछ बातें
कह जाती हैं कुछ रातें
और हम तो बस तुझको ही हैं दोहराते
दोहराते ...... दोहराती हैं कुछ बातें
कुछ बातें
याद आती सन्नाटों में
मुझे पागल
बना जाती जज़्बातों से
बड़ी उलझन
शिकस्तों से और मातों से
हैं कुछ बातें
अटक जाती हैं नातों मे
हारना तो नहीं मुझे
जीतना भी नहीं मुझे
तो कैसे मैं कहूँ तुझे
कि आ जा रे ...... तू आ जा रे, सुना जा रे
तेरी ऐसी ... ही ... कुछ बातें ... कुछ बातें
Sunday, May 26, 2024
फिर वही
Thursday, May 23, 2024
हदें
Tuesday, May 21, 2024
मुराद
वो कहते रहते हैं अक्सर कभी तो याद करो
और हम कहें के भूलने की तुम फ़र्याद करो
राग़ों मे दौड़ते फिरते हैं वो लहू की तरह
ऐ खुदा अब मेरे जसबे को तुम मुराद करो
मेघ
Monday, May 20, 2024
Saturday, May 18, 2024
नाद का स्वाद
जीवन का क्या अर्थ है
प्रश्न करे मन लेकिन सब कुछ
कहना सुनना व्यर्थ है
आहत तो अनिवार्य नहीं है
अनहत से जीवन है
अनहत की आहट सुन लो तब
जीवन तेरा स्वर्ग है
स्वीकार
Thursday, May 16, 2024
दुनिया
Tuesday, May 14, 2024
आदतें
जाएज़ा
Monday, May 13, 2024
दूध
फ़िक्र दुनिया तुझे सताती क्यूँ है
इस तरह ख़ुद को जलाती क्यूँ है
हम तो जी लेंगे तरीके अपने
यूँ ज़माने को रुलाती क्यूँ है
छोड़ जाना है एक दिन तो बता
पास अपने तू बुलाती क्यूँ है
दिन गए जो बात कर उनकी
मखमली याद दिलाती क्यूँ है
हाथ छूटे हैं जबसे सोचता हूँ
दोस्ती हाथ मिलाती क्यूँ है
किसी बच्चे ने माँ से पूछ लिया
मुझको तू दूध पिलाती क्यूँ है
Saturday, May 11, 2024
ये वक़्त है
तेरी पनाहों में
Sunday, May 5, 2024
सवाल
Friday, May 3, 2024
ज़ात
ख़ामोशी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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सब है पराया रख ना क्या है ग़म हैं किसी के अ पना क्या है उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ उम्र गुज़ारी त...
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तेरी अदीम निगाहों ने बे पनाह किया बिना किये मुझे आगाह ही तबाह किया ये किस तरह कि है उल्फत के मेरी फ़िक्र नहीं न कैद ही किया मुझको न ही रियाह ...
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जब कभी तेरा ख़याल आता है जाने क्या दिल को हुआ जाता है वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है तू मेरे दिल में समा जाता है ग़ैर लगती है ये दुनिया मुझ को तू सग...