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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Friday, August 30, 2024

ज़रा मुश्किल

Bahr: 1222 1222 1222 1222

ये सूरज आसमा में तो क़मर से रोज़ मिलता है  
मगर बादल जो आए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 

ये माना दिल में रहते हो मेरी साँसों में बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पे खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों में दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है

अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 



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ये सूरज रोज बे नागे चाँद को रोशन करता है  
मगर बादल आ जाए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 
ये माना दिल मे रहते हो मेरी साँसों मे बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पर खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 
दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों मे दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है
अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

मैं इंसान हूँ

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ
खुदी पे मैं सबसे महरबान हूँ 
फ़रिश्ता सा हूँ मैं किसी की नज़र में 
किसी की नज़र में मैं शैतान हूँ 

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ

अगर कोई कहता है मैं नासमझ हूँ 
तो खुद को समझता मैं नादान हूँ 
कभी हूँ शफ़ाक़त कभी बेवफ़ा हूँ 
कभी रंजिशी का मैं इलज़ाम हूँ 

कभी देवताओं का ऐलान हूँ मैं 
कभी खुद खुदा का मैं मुख्तार हूँ 
कभी फ़िक्र-ए-खुद हूँ कभी मस्त बे हिस 
कभी खुद पे खुद ही मैं हैरान हूँ 

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ

कभी मैं शराफ़त की हूँ बानगी तो 
कभी बद-तमीज़ी का परवान हूँ 
जूनून-ए-नफ़ा है कभी मेरे सर पे 
नतीजन यक़ीनन मैं नुक्सान हूँ 

कभी बे ग़रज़ धूप सी इक किरण हूँ 
कभी जंगलों का मैं तूफ़ान हूँ 
है ख्वाहिश ख़ुशी की मुझे ज़िन्दगी में 
ख़ुशी के लिए मैं परेशान हूँ 

मैं इंसान हूँ, मैं इंसान हूँ

Wednesday, August 28, 2024

बोहोत ...

आज बारिश के हैं आसार बोहोत 
अश्क़ आँखों में हैं लाचार बोहोत 
पत्थरों पर ही है शहर ये खड़ा 
और पानी के तलबग़ार बोहोत 

गाँव में मेरे बेक़रारी है 
मेरी नज़रें हैं शर्मसार बोहोत 
कैसी तहज़ीब क्या सियासत है 
जिस तरफ देखो हैं मक्कार बोहोत

दिखाई मैंने चाँद की कलियाँ 
उसने कहा है धब्बेदार बोहोत 
ज़र्द ही ज़र्द देस में है मेरे 
और हरियाली है उस पार बोहोत 

और कितने तू लफ्ज़ माँगेगा
तेरी जुबां पे हैं उधार बोहोत 
सच कहोगे तुम झूठी दुनिया से 
हैं इरादे तेरे ख़ूंखार बोहोत

घाव अपने तो कम ही दिखलाना 
मिलेंगे तुझको सलाहकार बोहोत 
तेरे नसीब में लिखा क्या है 
ये बताने को हैं तैयार बोहोत 

फ़िक्र मेरी तो तुम ही करते हो 
तुमसे देखे हैं होश-ए-यार बोहोत 
वो ही जीतेगा अबकी बार यहाँ 
जिसने देखी है अपनी हार बोहोत

मैं न आऊंगा बाज़ आदत से 
इस ग़ज़ल में भी हैं अशआर बोहोत
अब कहीं जाना इतने बरसों में 
हैं यहाँ पर भी कलमकार बोहोत 

Tuesday, August 27, 2024

अच्छा नहीं लगता

अब तुमसे मुझे मिलना अच्छा नहीं लगता 

ये बात तुमसे कहना भी अच्छा नहीं लगता 

पर ये भी तो अच्छा नहीं लगता जो ना मिलूँ 

फिर मिल के बिछड़ना भी तो अच्छा नहीं लगता 


तुमने कहा शायद तभी मिलने चले आये 

पर सच तो है के हमसे भी अब रहा नहीं जाए 

वादा किया है तुझसे के होंगे ना अब जुदा 

वादे से मुकरना भी तो अच्छा नहीं लगता 


हैरत नहीं होती है मुझे इस जहान से 

कितने ही जा चुके हैं यहाँ अपनी जान से 

क्या फ़ायदा मिलेगा अगर हम ही ना रहे  

इस बात से डरना भी तो अच्छा नहीं लगता 

Monday, August 26, 2024

बाज़ आएंगे नहीं

मुस्कुराएंगे 
बहल जाएंगे 
आज़माएंगे 
फिर सताएंगे 
वो बुलाएंगे  
हम ना जाएंगे 
यूँ दिखाएँगे 
ख़ार खाएंगे
तिलमिलायेंगे 
रूठ जाएंगे 
दिल दुखायेंगे 
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बाज़ आएंगे नहीं 
रंजिश ही सही
===========

ठग

Bahr: 221 2122 221 2122

दुश्वारियों का मौसम बिलकुल अलग रहा है 
बातों की बात ये के कोई तो ठग रहा है 
करना तेरा वज़ाहत लाज़िम है यार लेकिन 
आँखें तुम्हारी पढ़ कर कुछ और लग रहा है

इस बार कुछ न कहना बस बात मेरी सुनना 
हर बार की तरह ये बेकार लग रहा है  

कितने ही शायरों ने शब्बाब-ए-ज़िंदगी की 
हब्बाब ज़िंदगी का कुछ और लग रहा है 

ज़ाहिर सी बात है ये मालूम है मुझे भी 
बातों से मेरी उनको कुछ और लग रहा है 

ये रासते ठिकाना पहचान के हैं मेरे 
आते थे हम यहाँ पर अक्सरहाँ लग रहा है 



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दुश्वारियों का मौसम बिलकुल अलग रहा है 
बातों की बात ये के कोई तो ठग रहा है 
करना तेरा वज़ाहत लाज़िम है यार लेकिन 
आँखें तुम्हारी पढ़ कर कुछ और लग रहा है 

इस बार कुछ न कहना बस बात मेरी सुनना 
हर बार की तरह ये बेकार लग रहा है 

कितने ही शायरों ने शब्बाब-ए-ज़िंदगी की 
हब्बाब ज़िंदगी का कुछ और लग रहा है 

ज़ाहिर सी बात है ये मालूम है मुझे भी 
बातों से मेरी उनको कुछ और लग रहा है 

ये जगह ये ठिकाना पहचान के हैं मेरे 
आते थे हम यहाँ पर अक्सरहाँ लग रहा है 

दुश्वारियों का मौसम बिलकुल अलग रहा है 
बातों की बात ये के कोई तो ठग रहा है 

Sunday, August 25, 2024

बाशिंदा

Bahr (1222 1222 1222 1222)

मुझे बेशक सराहो मत मगर इक बात कहने दो 
तुम्हारी क़ौम में यारों मुझे बाशिंदा रहने दो 

सभी को खोना है इक दिन आसमाँ के सितारों में 
अभी तुम ज़िंदा हो जैसे मुझे भी ज़िंदा रहने दो

शहर में पेड़ हरियाली किसे अब रास आते हैं  
मगर खुद पर तरस खाओ ख़ुदी को ज़िंदा रहने दो
[ख़ुदी = fear of God]

मुझे बचपन से जाने क्यूँ बोहोत उड़ने की आदत थी  
खयालातों की दुनिया है मुझे तुम रिंदाँ रहने दो 
[रिंदाँ = carefree]

सिपा सालार कहते हैं तेरी क़ुर्बानी लाज़िम है 
शहीदों में गिनाएंगे फ़लक पे झंडा रहने दो

ज़रा मुर्ग़ी कि मम्ता देख एक दिन मुझसे कहती है 
मुझे चाहो पका खा लो मगर ये अंडा रहने दो 

ना देखी जाएगी मुझसे दरिंदों की ये सौग़ातें 
मैं अंधा था मैं अंधा हूँ मुझे तुम अंधा रहने दो






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मुझे बेशक सराहो मत मगर कुछ बातें कहने दो 
मुझे इस क़ौम में यारों एक बाशिंदा रहने दो 

कहीं कुछ सीख ना लूँ इस लिए शर्मिंदा रहने दो 
मुझे इस क़ौम में यारों एक बाशिंदा रहने दो 

यहाँ के पेड़ हरियाली किसे अब रास आते हैं  
मेरे घर का एक पौधा मगर तुम ज़िंदा रहने दो 

मुझे मत दो बाग़ कोई आसमा भी छुपा लेना 
मगर एहसान ये करना बस एक बराम दा रहने दो 

ना देखी जाएगी मुझसे अब दरिंदों की सौग़ातें 
मैं अंधा था मैं अंधा हूँ मुझे तुम अंधा रहने दो 

मुझे बचपन से जाने क्यूँ बोहोत उड़ने की आदत थी  
ख़यालातों की दुनिया है मुझे परिंदा रहने दो 

सिपाह सालार कहते हैं तेरी क़ुर्बानी लाज़िम है 
शहीदों में गिनाएंगे हाथ में झंडा रहने दो

एक मुर्ग़ी की ममता देख एक दिन मुझसे कहती है 
गोश्त चाहो मेरा खा लो मगर ये अंडा रहने दो 

मुझे बेशक सराहो मत मगर कुछ बातें कहने दो 
मुझे इस क़ौम में यारों एक बाशिंदा रहने दो 

Saturday, August 24, 2024

इंसान-नीयत

बड़ी तक़लीफ करते हैं के अब बातें नहीं होंगी 
चिढ़ाते हैं के अब तुमसे मुलाक़ातें नहीं होंगी 
वो मुझसे पूछते हैं कब तुम आओगे पनाहों में 
वो क्या है के बिना तेरे तो बरसातें नहीं होंगी  

तेरी तफ़री की बातों का कोई सानी नहीं मिलता 
ये माना के तेरे बिन एक पत्ता भी नहीं हिलता 
मेरी आँखें चुरा कर तुझको हैरानी नहीं होगी   
तुझे महसूस कर लूँगा अगर आँखें नहीं होंगी 

अगर सांसें नहीं होती तो तुम भी क्या ही कर लेते 
सर ब सर लुत्फ ओ ताला ज़िंदगी की सर किधर लेते 
सवाल-ए-हिज्र पर देखो हाशिया ये हमारा है
के हम फिर रूह बन जाएंगे गर साँसें नहीं होंगी 

मंजिलों का पता उनको मिले जो रुक गए होंगे 
ज़हन और रूह में खुद की अभी मर चुक गए होंगे 
हमें परवाह कब थी रास्तों के बदगुमानी की   
नया रस्ता बना लेंगे अगर राहें नहीं होंगी 

सितारा है मेरा हमदम फ़लक से टिमटिमाता है 
मैं रुक जाता हूँ कह कर कुछ तो फिर वो सर हिलाता है
(वो कहता है)
रोशनी में हमेशा ही मुलाक़ातें नहीं होंगी 
गुफ़्तगू कर नहीं पाएंगे गर रातें नहीं होंगी 

जो ज़िंदा हैं जहां मे पेट अपना खुद चलाते हैं 
नज़र से जो नज़र मिलती है तो फिर मुसकुराते हैं 
ज़रा हम सोच लें इसपर, तो कुछ बातें नहीं होंगी 
भीख मँगे नहीं होंगे जो खैरातें नहीं होंगी 

हर तरफ बेक़रारी है हर तरफ बे गुज़ारी है 
मज़हबों का बहाना है बस यहाँ जाल साज़ी है 
हर तरफ देश में ये बे ग़रज़ ज़ातें नहीं होंगी  
साफ़ इंसान की नीयत जो हो लाशें नहीं होंगी 

Friday, August 23, 2024

कमाई

ये नाटक है जो दुनिया का 
नाटक ये बनाया है रब ने 
मेरे किरदार को दुनिया से 
आवाज़ लगाई थी सबने 

जब मिट्टी में साँसें आई 
और धड़कन की लहरें छाई 
एक नाम दिया था दुनिया नें  
फिर काना फ़ूसी की सबने 

कुछ देखा था तो सीख लिया 
जो घबराया तो चीख लिया 
मासूम था जब मैं बचपन में 
तो खूब नुमाइश की सबने 

नादानी को जब छोड़ दिया 
रस्ते को अपने मोड़ लिया 
हम पल दो पल के आशिक़ थे 
ये बात सुनाई थी सबने 

नाटक है सब इस नाटक में 
सब नाटक ही तो करते हैं 
डरते तो हैं अँधियारों से 
पर रात ग़ुज़ारी है सबने 

ऐसे जब रात वो गुज़र गई 
रोशन तब नूर बुलाता था 
आराम से हम बस लेटे थे 
और सेज सजाई थी सबने 

घंटे दो घंटे बातें की 
सच्ची झूटी जैसी तैसी 
मिट्टी ने कमाई जो शोहरत 
मिट्टी में मिला दी थी सबने 

Thursday, August 22, 2024

क्या मिला

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 
है कैसी किस जहां की
तेरी अय्याशियां 

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 

इंसानों में बसे हो 
हैवानों की तरह 
और बातें कर रहे हो 
देवताओं की तरह 

क्या मिला क्या मिला 
ये बता दो क्या मिला 
एक नन्ही चिड़िया को  
तुझे रौंद के क्या मिला 

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 

कितना है बदगुमां तू 
किस मिट्टी का बना तू 
कातिल है रहमतों का 
और बनता रहनुमा तू 
फरमान दे रहा है 
ना फरमानों की तरह 

क्या मिला क्या मिला 
इक फूल को कुचल कर 
क्या मिला क्या मिला

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 

तेरी तो मिलकियत है 
अपनी क्या हैसियत है 
लाचारों को मिटाना 
क्या ये ही इंसानियत है 
सदमों से घिर चुके हम 
हैरानों की तरह 

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 
हम सब पे ज़ुल्म ढा कर  
क्या मिला क्या मिला 

Sunday, August 18, 2024

ख़ुद गर्ज़

ऐसे कैसे ये तुमने सोच लिया 
आज के बाद भूल जाओगे 
इतना आसाँ भी नहीं बच पाना 
हर तरफ अक्स मेरे पाओगे 

तुम जो जाने की बात करते हो 
जो हम गए तो जान जाओगे 
बड़ी मुश्किल से रात गुज़रेगी 
बिन मेरे रह ही नहीं पाओगे 

बात ऐसी अगर करोगे तो 
क्या मेरा साथ तुम निभाओगे 
दो घडी बैठ के बातें तो करो 
क्या पता खुद ही मान जाओगे 

तेरी शर्तों के ऐसे पैमाने 
और कितना मुझे रुलाओगे 
प्यार ख़ुद गर्ज़ तो नहीं होता 
प्यार होते ही समझ जाओगे 

Saturday, August 17, 2024

साँस

जुदा हुए थे कभी और कब मिलेंगे भला 
आज भी ज़िंदा मैंने अपनी प्यास रक्खी है 
ज़मी से मेल कभी ना कभी तो होगा ही 
के चाँद ने तो आज भी ये आस रक्खी है 

ये ज़िन्दगी का सफ़र सांस की अमानत है 
तो क्यूँ शिकन यूँ लबों पर उदास रक्खी है 
अपनी साँसों से चुराकर बड़ी हिफ़ाज़त से 
नाम तेरे भी मैंने एक साँस रक्खी है
 
यकीं नहीं तो देख दिल मे मेरे झांक ज़रा 
ज़ियादती वो इश्क की संभाल रक्खी है 
भंवर उठा तो तुझे प्यार खैंच लाएगा 
के मैंने दिल मे क़ैद वो भड़ास रक्खी है

ज़ख़्मी

देखूँ तुझे दुआ करूँ 
दिन रात यही ख़ाब 
लेकिन अगर चश्मा न हो 
देखूं क्या तुझे ख़ाक 

महसूस तो होती है 
तेरी रंगत तेरी ख़ुश्बू 
सोने दे हुई रात अब 
आ जाएंगे जुगनू  

सब कहते हैं फूलों से हैं 
लब तेरे गुलाबी 
लेकिन ज़रा कम कर ले 
तू ये पेट की चर्बी 

ज़ख़्मी मेरा दिल है अगर 
वजहों में तेरा नाम 
बातें ज़हन की भूल कर 
चुपचाप करो काम  

Friday, August 16, 2024

रब

Bahr" 
  • 1222
  • 1222
  • 1222
  • 1222

  • समझने की जो बातें थी उन्हें मैं बद समझ बैठा 
    जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 

    पहन कर मुस्कराहट सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
    मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहा ज़ो दब समझ बैठा 

    क्या मैं मासूम था या फिर ये मेरी बेवक़ूफ़ी थी 
    किसी का हाथ देखा तो उसे मैं हद समझ बैठा 

    यहाँ इंसान चूहों की तरह दौड़ाए जाते हैं 
    हर इक इंसान लालच में तलब से दौड़ने बैठा 

    उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
    के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

    वो माली का जो बेटा है बड़ा नादान बच्चा है 
    जिसे देखा बड़ी गाड़ी में बस साहब समझ बैठा

    यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
    बना कर के मशीनें खुद को इंसां रब समझ बैठा  

    बड़े नुस्खे नहीं थे ज़िन्दगी में कामयाबी के
    बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

    ======================================






    समझने की जो बातें थी उन्हें गलत समझ बैठा 
    जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 

    मुस्कराहट पेहेन कर सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
    मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहाज़ अदब समझ बैठा 

    क्या मैं मासूम था या फिर ये मेरी बेवक़ूफ़ी थी 
    किसी का हाथ देखा तो उसे मदद समझ बैठा 

    यहाँ इंसान चूहों की तरह दौड़ाए जाते हैं 
    हर इक इंसान लालच में दौड़ने को तलब बैठा 

    उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
    के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

    एक बेटा है माली का बड़ा नादान बच्चा है 
    गाड़ियों में जिन्हें देखा उन्हें साहब समझ बैठा 

    यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
    बना कर के मशीन इंसान खुद को  रब समझ बैठा 
     
    पूछते हैं लोग अक्सर कामयाबी के कुछ नुस्खे 
    बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

    Wednesday, August 14, 2024

    बात

    बहरों के सामने तू आवाज़ क्या करेगा 
    ख़ुद उड़ सके न उनको आज़ाद क्या करेगा 

    चादर को ओढ़ते हैं अपना क़फ़न समझ कर 
    तू उनसे ज़िन्दगी की फ़रियाद क्या करेगा 

    इल्ज़ाम हर किसी पर लाज़िम नहीं है क्यों कि  
    जो साथ ही नहीं था वो याद क्या करेगा 

    मायूस है वो मुझसे ये सोच कर के मेरी 
    बर्बाद ज़िन्दगी को बर्बाद क्या करेगा 

    रेहमत उसे न बक्शो वेह्शी है वो दरिंदा 
    पहले ही मर चुका है जल्लाद क्या करेगा 

    साँसें ये चल रही हैं कह दे तू जो है कहना 
    जो सांस रुक गई तो फिर बात क्या करेगा 

    Sunday, August 11, 2024

    सादा दिली

    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना - २ 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    महफ़िल में इक दफ़ा भी मुझे देखता नहीं 
    तन्हाईयों में मुझको मनाता है आइना
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    मुझसे ही मांगता है रौशनी के सौ दिए 
    एहसान मेरे मुझको गिनाता है आइना 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    रखा था कब से हमने संभाले जिस आग को 
    आंसू की शक्ल उसको बुझाता है आइना 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    बातें बनाओगे वो भी तुम इसके सामने?
    दुनिया की सारी बातें जानता है आईना
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    सादा दिली मगर ये किसी को न आ सकी
    कोई न चाह कर भी बन सका है आइना 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    Sunday, August 4, 2024

    आते जाते

    मुझसे,
    बोहोत लोग मिलते हैं यूँ ही आते जाते 
    एक तुम ही मिले मुझसे हँसते हँसाते - 2
    कैसे,
    मदहोश आँखों से हम खुद को बचाते 
    मेरे, 
    दोस्त मुझसे कहते हैं जलते जलाते - 2 

    हरदम ही गुनगुनाना हरदम ही मुसकुराना 
    तुम कैसे ढूंढते हो हंसने का कोई बहाना 
    अच्छा,
    अब तो बताओ के तुम कैसे फ़रमाते
    अगर मैं रूठ जाती मुझको कैसे मनाते 

    कैसे,
    मदहोश आँखों से हम खुद को बचाते 
    मेरे, 
    दोस्त मुझसे कहते हैं जलते जलाते - 2 
    मुझसे,
    बोहोत लोग मिलते हैं यूँ ही आते जाते 
    एक तुम ही मिले मुझसे हँसते हँसाते - 2

    पैग़ाम देखा तेरा तो फिर याद आ गया रे 
    मैं कुछ,
    भूल गया गलती से और पकड़ा गया रे 
    फिर सोचा अब तो तुझको मनाना पड़ेगा 
    और ये गीत बन गया देखो मनाते मनाते 

    मुझसे,
    बोहोत लोग मिलते हैं यूँ ही आते जाते 
    एक तुम ही मिले मुझसे हँसते हँसाते - 2
    कैसे,
    मदहोश आँखों से हम खुद को बचाते 
    मेरे, 
    दोस्त मुझसे कहते हैं जलते जलाते - 2 

    हमनशीं

    ये रातें, दिल की बातें घुल गई हैं ज़िंदगी में
    बड़े काम आएगी ये हसीं बातें आशिक़ी में

    ये रातें, दिल की बातें ...

    मंज़र तो आईना है धड़कते से दो दिलों का 
    ये दिल सुन रहा है एहतराम मंजिलों का
    उलझनों में मत उलझना बोहोत कम ज़िंदगी है 
    अपना प्यार बंदगी है बेशुमार ज़िंदगी है 

    ये रातें, दिल की बातें ...

    जब अंधेरा आए तो तुम मेरे साथ साथ रहना 
    हम साथी हर जनम के इस जनम भी साथ है ना 
    ता उम्र रहना चाहे दिल ऐसी बेखुदी में 
    मैं तेरी हमसफ़र हूँ तू मेरा हमनशीं है 

    ये रातें, दिल की बातें घुल गई हैं ज़िंदगी में
    बड़े काम आएगी ये हसीं बातें आशिक़ी में

    ये रातें, दिल की बातें ...
    ये रातें, दिल की बातें ...

    Duet Song: Female, Male, Both

    Saturday, August 3, 2024

    जवाब

    क़िस्सों को कहानी में ढलते हुए देखा 
    और ऐसे हक़ीक़त को जलते हुए देखा 

    'इंसान हूँ' इंसान ये कहते हैं सर-ए-आम 
    कितनों को मैंने जिस्म बदलते हुए देखा 

    करते हैं जो शफ़्क़त की बातें बड़ी बड़ी 
    एक फूल उन्हें कल ही कुचलते हुए देखा
     [ शफ़्क़त = करुणा, compassion ]

    कल रात से भूखा था मैं अब भूख मर गई  
    इक तिफ्ल को खाने को तरसते हुए देखा
     [ तिफ़्ल = बच्चा, child ]

    एक बाप सर झुका के सुन रहा था कोई बात 
    उसे खून के प्यालों को निगलते हुए देखा 

    नज़रों के सवालों का जब जवाब ना मिला 
    मैंने तुझे नज़रों से उतरते हुए देखा 

    Thursday, August 1, 2024

    कभी

    क़ता:

    भूल जाना मुझे आसां तो नहीं 
    किसको झूठी क़ता सुनाती है 
    क्या अंधेरा भी ऐसे होता है 
    दो पहर में दिया बुझाती है 

    Bahr (2122 1212 112)
    ग़ज़ल:
    साँस लेता हूँ हर किसी की तरह 
    एक आदत हूँ ज़िंदगी की तरह

    आदतन सबको भूल जाता हूँ मैं 
    याद आते हो तुम कमी की तरह 

    मश्ग़ला बात क्यों करे है तेरी 
    जाने पहचाने आदमी की तरह 

    मैं ज़मी पर हूँ ख़ाक बन के पड़ा 
    तुम फलक पर हो चाँदनी की तरह 

    फिर नया दिन है फिर सवाल कई 
    फिर मैं उलझा हूँ हर किसी की तरह 

    इक दफा फिर से प्यार कर लो कभी 
    फिर झटक देना तुम दरी की तरह 

    हो ना हो तुमको याद हूँ मैं अभी 
    जैसे था तेरा मैं कभी की तरह 

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...