देख चेहरा तू समझता क्या है
अपनी धुन पे ही लरज़ता क्या है
पैराहन देख मेरे चेहरे पे
दिल में क्या है तू समझता क्या है
प्यास है पर कोई साक़ि तो नहीं
मेरी हालत तू समझता क्या है
मेरी बातों को सुन के अक्सर तू
सर हिलाता है समझता क्या है
दिल की चोटों का तो सबब यूँ है
दिल ही नश्तर है समझता क्या है
मुझको पंछी वो ताना मार गया
ख़ुद को आज़ाद समझता क्या है
अब सफाई में क्या बताऊँ विवेक
ख़ुद का मुजरिम हूँ समझता क्या है
About Me
- Vivek Pohre
- I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Sunday, March 29, 2009
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ख़ामोशी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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