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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Tuesday, January 28, 2025

खून जलता है

इक तो अल्फ़ाज़ तराशी से खून जलता है
उसपे बेनाम तराशी से खून जलता है
[दाग़ बेदाग़ तराशी = Judge karna, अल्फ़ाज़ तराशी = Gyan dena]

जिनको बस अर्ज़ ग़ुज़ारी ही रास आती है
उनकी इल्ज़ाम तराशी से खून जलता है
[अर्ज़ ग़ुज़ारी = chaatukarita/chamcha giri, इल्ज़ाम तराशी = ungli dikhaana]

अहलियत आज दिखा दो तो बात मानेंगे
नस्ली अंदाज तराशी से खून जलता है
[अहलियत = ability, नस्ली अंदाज के पाशी = racist commenter]

बेझिझक कह दे तुझे बात जो भी कहनी है
बात के बीच राशी से खून जलता है
[ख़राशी = irritation /गला साफ़ करने की प्रक्रिया ]

जो हिफ़ाज़त ही बताते तो कोई बात न थी
यूँ हि बे बात तलाशी से खून जलता है

लो गला घोंट दिया मैंने अपने ख़ाबों का
इस पे 'ज़ाहिर' कि शबाशी से खून जलता है

हमको मालूम है मज़मून क्या लिखा तुमने
पर लिफ़ाफ़े कि नकाशी से खून जलता है

खून जलता है यही सोचकर कहूँ अब क्या
और कुछ कहना न हो तो भी खून जलता है


Friday, January 24, 2025

होता है

मैं ये सुनता हूँ के इंसान में सब होता है
फिर जो खोता है यहाँ खुद से ही सब खोता है

बेसबब फिरता है दुनिया की तलब गारी में
फिर ये होता है के दुनिया का ही सब होता है

पहले आदाब से तस्लीम रवायत में रहे
फिर ये होता है के ख़ुद से ही अदब होता है

दिल तो बेहिस की तरह कल पे टला रहता है
फिर ये होता है के कल आज से अब होता है

ऐसा लगता है के सब दुनिया को 'ज़ाहिर' कर दूँ 
फिर ये होता है के रोने का सबब होता है

फिर किसी खोज में निकले है कहीं पर तनहा
फिर ये होता है के खुद में ही वो रब होता है

Sunday, January 12, 2025

उजाला

असली शायर: फ़हमी बदायूनी 

ये माना के तुमने संभाला मुझे 
मेरी ज़ुल्मतों से निकाला मुझे 
महरबाँ मगर मैं परेशान हूँ 
बहुत चुभ रहा है उजाला मुझे
[जुलमत = darkness]

हरा लाल नीला गुलाबी नहीं  
कोई ला के दे रंग काला मुझे 
 
फ़िसलता चला जा रहा था कहीं 
तभी मुश्किलों ने संभाला मुझे 

मैं करता भी कैसे नवाज़िश वहाँ 
के नज़रों ने ही मार डाला मुझे 
[नवाज़िश = appreciate/respect]

चमकता था सिक्के की मानिंद मैं 
तभी तक सभी ने उछाला मुझे 
[मानिंद = like something, की तरह ]

वो कहता रहा मैं भी सेहता रहा 
अरे बुत बनाकर उबाला मुझे 
[बुत = statue/frozen]

मैं 'ज़ाहिर' हूँ बेबस करूँ शायरी
नहीं चाहिए कोई हाला मुझे
[हाला = शराब]

Thursday, January 9, 2025

तोता

ये जो होता है, जो भी होता है 
कोई हँसता है, कोई रोता है 
सब सिखाया है, सब पढ़ाया है  
मैं भी तोता हूँ, तू भी तोता है 

झूठ सूरज है झूठ तारे हैं 
झूठ मौसम के सब इशारे हैं 
झूठ है के तुम भी इन्हीं से हो 
झूठ ये भी के ये तुम्हारे हैं 
 
वक़्त धोखा है जिसमे जीते हो 
वक़्त धोखा है जिसमे मरते हो 
सच नहीं है ये इस घड़ी में भी 
मैं जो कहता हूँ तुम जो सुनते हो 

कौन कहता है मर गया हूँ मैं 
कौन कहता है खाली पन है अब 
ये तो 'ज़ाहिर' है कुछ नहीं बदला 
काम पे जा ही तो रहे हैं सब 

Wednesday, January 8, 2025

आबशार

ग़म दिल में हूँ हवाओं के बे-क़रार में हूँ

या कहो जान तमन्ना मैं तेरे प्यार में हूँ


ये तिरा साथ जो मिल जाए तो शिफ़ा ही मिले

यूँ मचलकर के मैं उड़ने के इंतज़ार में हूँ

[शिफ़ा = रोग से मुक्ति]


है किसे फ़िक्र ज़माने की बात कौन सुने

तिरे होठों से ये कह दो मैं एतबार में हूँ

[एतबार = trust]


ये भवें तेरी नज़र तेरी तेरी चाल बला

है ख़ुदा पहले मगर मैं भी हुस्न कार में हूँ

[हुस्न कार = creator of the beauty]


ये तो 'ज़ाहिर' है के ज़िंदा हूँ आस पे ही तेरी

आजकल शामों सहर तेरे रोज़गार में हूँ


मैं तो तेरे ही पिघलते से इंतज़ार में हूँ

ले मुझे जीत मुसलसल मैं अपनी हार में हूँ


है मुझे तिश्नगी क्या जाने किस जनम की जज़ा

के जनम ले के तिरे बार-ओ-आबशार में हूँ

[तिश्नगी = तपन, जज़ा = बदला, बार = rain, आबशार = झरना]

Tuesday, January 7, 2025

चाहो

धुँदली यादों की चाहत में क्यों अपने सपने खोता है
जो होता है गर चाहो तो जो चाहोगे वो होता है

सब कुछ मिल पाना मुश्किल है कुछ ना कुछ तो कम होता है 

जितना ज़्यादा मिल जाता है उतना पाने को रोता है 


सब जाने है इस दुनिया में जो होता है क्यों होता है
काँटे अक्सर इन्साँ खुद ही 'ज़ाहिर' है ख़ुद ही बोता है

कहते हैं के इस दुनिया में जो सोता है वो खोता है 

मुझको तो ऐसा लगता है जो खोता है वो सोता है 

Monday, January 6, 2025

सपना

सब है पराया रखना क्या है

ग़म हैं किसी के अपना क्या है

उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें  

उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ  

उम्र गुज़ारी तब जागा हूँ 

सोते सोते उम्र गुज़ारी 

नींदों में ही उम्र गुज़ारी   

नींद उतारी उम्र गुज़ारी   

अब समझा मैं सपना क्या है


दिल की बात उभर आएगी

इस मिट्टी में दफ़्ना क्या है


चलना था उसको इतना के

भूल गया वो थकना क्या है


दिल इतनी सी बात न समझे

यादों में कब रखना क्या है


जब रब है सबकी धड़कन में

तो फिर माला जपना क्या है


जब वादे ही टूट चुके हैं 

तो फिर टूटा सपना क्या है


'ज़ाहिर' जब हम रुख़्सत होंगे

तब समझेगा अपना क्या है


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उनकी नशीली आँखें देखी

दिल ने पूछा चखना क्या है

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...