About Me
- Vivek Pohre
- I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Tuesday, January 28, 2025
खून जलता है
Friday, January 24, 2025
होता है
Sunday, January 12, 2025
उजाला
Thursday, January 9, 2025
तोता
Wednesday, January 8, 2025
आबशार
ग़म ए दिल में हूँ हवाओं के बे-क़रार में हूँ
या कहो जान ए तमन्ना मैं तेरे प्यार में हूँ
ये तिरा साथ जो मिल जाए तो शिफ़ा ही मिले
यूँ मचलकर के मैं उड़ने के इंतज़ार में हूँ
[शिफ़ा = रोग से मुक्ति]
है किसे फ़िक्र ज़माने की बात कौन सुने
तिरे होठों से ये कह दो मैं एतबार में हूँ
[एतबार = trust]
ये भवें तेरी नज़र तेरी तेरी चाल बला
है ख़ुदा पहले मगर मैं भी हुस्न कार में हूँ
[हुस्न कार = creator of the beauty]
ये तो 'ज़ाहिर' है के ज़िंदा हूँ आस पे ही तेरी
आजकल शामों सहर तेरे रोज़गार में हूँ
मैं तो तेरे ही पिघलते से इंतज़ार में हूँ
ले मुझे जीत मुसलसल मैं अपनी हार में हूँ
है मुझे तिश्नगी क्या जाने किस जनम की जज़ा
के जनम ले के तिरे बार-ओ-आबशार में हूँ
[तिश्नगी = तपन, जज़ा = बदला, बार = rain, आबशार = झरना]
Tuesday, January 7, 2025
चाहो
जितना ज़्यादा मिल जाता है उतना पाने को रोता है
कहते हैं के इस दुनिया में जो सोता है वो खोता है
मुझको तो ऐसा लगता है जो खोता है वो सोता है
Monday, January 6, 2025
सपना
सब है पराया रखना क्या है
ग़म हैं किसी के अपना क्या है
उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें
उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ
उम्र गुज़ारी तब जागा हूँ
सोते सोते उम्र गुज़ारी
नींदों में ही उम्र गुज़ारी
नींद उतारी उम्र गुज़ारी
अब समझा मैं सपना क्या है
दिल की बात उभर आएगी
इस मिट्टी में दफ़्ना क्या है
चलना था उसको इतना के
भूल गया वो थकना क्या है
दिल इतनी सी बात न समझे
यादों में कब रखना क्या है
जब रब है सबकी धड़कन में
तो फिर माला जपना क्या है
जब वादे ही टूट चुके हैं
तो फिर टूटा सपना क्या है
'ज़ाहिर' जब हम रुख़्सत होंगे
तब समझेगा अपना क्या है
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उनकी नशीली आँखें देखी
दिल ने पूछा चखना क्या है
ख़ामोशी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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सब है पराया रख ना क्या है ग़म हैं किसी के अ पना क्या है उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ उम्र गुज़ारी त...
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तेरी अदीम निगाहों ने बे पनाह किया बिना किये मुझे आगाह ही तबाह किया ये किस तरह कि है उल्फत के मेरी फ़िक्र नहीं न कैद ही किया मुझको न ही रियाह ...
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जब कभी तेरा ख़याल आता है जाने क्या दिल को हुआ जाता है वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है तू मेरे दिल में समा जाता है ग़ैर लगती है ये दुनिया मुझ को तू सग...