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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Sunday, February 9, 2025

सुख़न

आदमी ज़ोफ़-ए-तन देख सकता नहीं

रश्क अह्ल-ए-सुख़न देख सकता नहीं

है अना वो बला सर पे चढ़ जाये तो

पैरहन पैरहन देख सकता नहीं

[ज़ोफ़-ए-तन = weakness of body, रश्क = jealousy, अह्ल-ए-सुख़न = poet, अना = ego, पैरहन = clothes]


देखते हैं सभी आईना पर कोई

आइने की घुटन देख सकता नहीं


जो मुझे दिख रहा है यहाँ से अभी

कोई ये अंजुमन देख सकता नहीं

[अंजुमन = नज़ारा]


अब्र ने चाँद को ढँक लिया अब कोई

चाँदनी की किरन देख सकता नहीं

[अब्र = बादल]


जो भी है बुत कदा और है ना ख़ुदा

वो मेरा फ़िक्र-ओ-फ़न देख सकता नहीं

[बुत कदा = जिसे सब कुछ पता हो, ना ख़ुदा = नास्तिक, फ़िक्र-ओ-फ़न = विचारों की कलाकारी]



जब से अपनों ने है मुझको रूखसत किया 

मैं ये अपना बदन देख सकता नहीं

[ज़मीं-दोस्त = ज़मीन में गाड़ देना]


आइने को न जाने गुमा क्या हुआ

के वो मेरा दहन देख सकता नहीं

[गुमा = अहंकार]


मैंने पड़ने न दी अपने सर पे शिकन

अब कफ़न पे शिकन देख सकता नहीं


वाइज़ों ने सुनाई थी जो दास्ताँ

मैं वो 'ज़ाहिर' अदन देख सकता नहीं

[वाइज़ = उपदेश देने वाला, रश्क-ए-अदन = beautifully perfect]



मैं दराज़ों का शायर नहीं हूँ मुड़े

काग़ज़ों पे सुख़न देख सकता नहीं

[सुख़न = कविता]


Saturday, February 1, 2025

इज़्ज़त

इस दुनिया में सबको अपनी कुछ बात सुनानी होती है 

रस्ते की कहानी है तो कहीं मंज़िल की निशानी होती है 

बाज़ारी हो चेहरे की चमक या हो हाथों में फ़ोन नया 

आपा धापी की दुनिया में औक़ात दिखानी होती है 


है क़र्ज़ सभी के माथे पर तो फ़र्ज़ कोई क्या पालेगा 

अपने काँधे पर ख़ुद अपनी ही लाश उठानी होती है 


शहरों की गर्दी में अपने अंदर क्या खून बचाओगे 

जीवन की गाड़ी भी अब तो पानी से चलानी होती है 

[गर्दी = revolution/क्रांति]


दुनिया वाले इक दूजे की दुनिया तो उजाड़े देते हैं 

और फिर अपनी उजड़ी दुनिया ख़ुद को ही बसानी होती है 


ये उम्र तमाशा है इसमें बचपन से है बूढ़ा होना 

देखे दुनिया जिस मंज़र को अक्सर वो जवानी होती है 


ये प्यार भी क्या है बला भला कैसी यादें दे जाता है 

दिल पर जो दाग़ रहे वो ही दिलबर की निशानी होती है 


होता ही नहीं है शहरों में तो वक़्त कहाँ से लाओगे 

ख़ुद से ही 'ज़ाहिर' ख़ुद को ही आवाज़ लगानी होती है 


इज़्ज़त की बातें रहने दो अब नहीं ज़माना इज़्ज़त का 

बोहतों को कार गुज़ारिश में इज़्ज़त ही गवानी होती है 

[कार गुज़ारिश = request for work]

Friday, January 24, 2025

होता है

मैं ये सुनता हूँ के इंसान में सब होता है
फिर जो खोता है यहाँ खुद से ही सब खोता है

बेसबब फिरता है दुनिया की तलब गारी में
फिर ये होता है के दुनिया का ही सब होता है

पहले आदाब से तस्लीम रवायत में रहे
फिर ये होता है के ख़ुद से ही अदब होता है

दिल तो बेहिस की तरह कल पे टला रहता है
फिर ये होता है के कल आज से अब होता है

ऐसा लगता है के सब दुनिया को 'ज़ाहिर' कर दूँ 
फिर ये होता है के रोने का सबब होता है

फिर किसी खोज में निकले है कहीं पर तनहा
फिर ये होता है के खुद में ही वो रब होता है

Thursday, January 9, 2025

तोता

ये जो होता है, जो भी होता है 
कोई हँसता है, कोई रोता है 
सब सिखाया है, सब पढ़ाया है  
मैं भी तोता हूँ, तू भी तोता है 

झूठ सूरज है झूठ तारे हैं 
झूठ मौसम के सब इशारे हैं 
झूठ है के तुम भी इन्हीं से हो 
झूठ ये भी के ये तुम्हारे हैं 
 
वक़्त धोखा है जिसमे जीते हो 
वक़्त धोखा है जिसमे मरते हो 
सच नहीं है ये इस घड़ी में भी 
मैं जो कहता हूँ तुम जो सुनते हो 

कौन कहता है मर गया हूँ मैं 
कौन कहता है खाली पन है अब 
ये तो 'ज़ाहिर' है कुछ नहीं बदला 
काम पे जा ही तो रहे हैं सब 

Tuesday, January 7, 2025

चाहो

धुँदली यादों की चाहत में क्यों अपने सपने खोता है
जो होता है गर चाहो तो जो चाहोगे वो होता है

सब कुछ मिल पाना मुश्किल है कुछ ना कुछ तो कम होता है 

जितना ज़्यादा मिल जाता है उतना पाने को रोता है 


सब जाने है इस दुनिया में जो होता है क्यों होता है
काँटे अक्सर इन्साँ खुद ही 'ज़ाहिर' है ख़ुद ही बोता है

कहते हैं के इस दुनिया में जो सोता है वो खोता है 

मुझको तो ऐसा लगता है जो खोता है वो सोता है 

Monday, January 6, 2025

सपना

सब है पराया रखना क्या है

ग़म हैं किसी के अपना क्या है

उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें  

उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ  

उम्र गुज़ारी तब जागा हूँ 

सोते सोते उम्र गुज़ारी 

नींदों में ही उम्र गुज़ारी   

नींद उतारी उम्र गुज़ारी   

अब समझा मैं सपना क्या है


दिल की बात उभर आएगी

इस मिट्टी में दफ़्ना क्या है


चलना था उसको इतना के

भूल गया वो थकना क्या है


दिल इतनी सी बात न समझे

यादों में कब रखना क्या है


जब रब है सबकी धड़कन में

तो फिर माला जपना क्या है


जब वादे ही टूट चुके हैं 

तो फिर टूटा सपना क्या है


'ज़ाहिर' जब हम रुख़्सत होंगे

तब समझेगा अपना क्या है


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उनकी नशीली आँखें देखी

दिल ने पूछा चखना क्या है

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...