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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Tuesday, December 3, 2024

पुराना

Bahr: 1222-1222-122


मेरा कहना अभी खलता नहीं है
कोई मुझसे यहां जलता नहीं है
किसी से कल कोई ये कह रहा था
पुराना नोट अब चलता नहीं है

ये किन राहों पे है निकला ज़माना
के सूरज शाम को ढलता नहीं है

ये कैसा आदमी बेदर्द है के
लगी है चोट पर मलता नहीं है

पुराना ही तो कहलायेगा मुझसा
हवा के साथ जो चलता नहीं है

मगर अब तक नहीं बदला वो ये के
कभी दिन मौत का टलता नहीं है

दफ़न होकर जिसम पिघला तो है पर
न जाने क्यूँ ये दिल गलता नहीं है

Sunday, November 17, 2024

खुदकुशी

Bahr:
  • 1222
  • 1222
  • 122

  • ये किसने खुदकुशी की बात कह दी  
    जो ज़िम्मेदारियों से डर चुका है ?
    वो बातें बे वजह दोहरा रहा है 
    जो करना है उसे वो कर चुका है 

    नहीं है जड़ से कोई रब्त उसका 
    वो अपनी शाख़ से ही झर चुका है 
    ज़रूरत अब नहीं उसकी किसीको 
    वो पीला पड़ गया है सड़ चुका है 

    नहीं है पीठ में उसके भी हड्डी 
    तभी उसका यहाँ पे सर झुका है 
    तड़पता है वो साँसों के लिए तो 
    उसे कह दे कोई वो मर चुका है 

    Wednesday, October 23, 2024

    इजाज़त

    Behr (1222 1222 122)

    इजाज़त हो ज़रा जी कर के देखूं 
    अदा अपनी पुरानी कर के देखूं 
    हैं दिलकश तेरी नज़रों के नज़ारे 
    ये दिल चाहे तुझे जी भर के देखूं 

    न जाने क्या हुआ मेरी नज़र को 
    तेरे ये होंट गुल अख़्तर के देखूं 
    [गुल अख्तर = Bright ornamental flower]

    तेरी उल्फ़त बड़ी या मेरी उल्फ़त 
    मैं तुझसे इक दफ़ा लड़ कर के देखूं 
    [उलफ़त = affection]

    न मिल पाया ख़ुदा तो सोचा मैंने 
    ख़ुद अपना ही ख़ुदा बन कर के देखूँ 

    तिरे ज़ख़्मों को रखा है संभाले 
    कहीं तू डर ना जाए डर के देखूं 

    अँधेरा मन में हो रखा है कब से 
    जला के ख़ाब उजाला कर के देखूं 

    करो तजरी के आफ़त हर जघा है 
    कहो दुनिया के देखूं घर के देखूं 
    [तजरी = prioritization]

    परस्तिश की अहम की कुछ ना पाया 
    ज़रा ख़ुद से जुदा हो कर के देखूं 
    [परस्तिश = worship]

    धरम मज़हब की बातें एक सी हैं 
    जनेऊं ताविज़ों में भर कि देखूँ 

    कहाँ जन्नत कहाँ दोज़ख़ खड़े हैं 
    यक़ी करने को मैं भी मर के देखूं 
    [जन्नत = heaven, दोज़ख़ = hell]

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...