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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Tuesday, August 27, 2024

अच्छा नहीं लगता

अब तुमसे मुझे मिलना अच्छा नहीं लगता 

ये बात तुमसे कहना भी अच्छा नहीं लगता 

पर ये भी तो अच्छा नहीं लगता जो ना मिलूँ 

फिर मिल के बिछड़ना भी तो अच्छा नहीं लगता 


तुमने कहा शायद तभी मिलने चले आये 

पर सच तो है के हमसे भी अब रहा नहीं जाए 

वादा किया है तुझसे के होंगे ना अब जुदा 

वादे से मुकरना भी तो अच्छा नहीं लगता 


हैरत नहीं होती है मुझे इस जहान से 

कितने ही जा चुके हैं यहाँ अपनी जान से 

क्या फ़ायदा मिलेगा अगर हम ही ना रहे  

इस बात से डरना भी तो अच्छा नहीं लगता 

Saturday, August 17, 2024

ज़ख़्मी

देखूँ तुझे दुआ करूँ 
दिन रात यही ख़ाब 
लेकिन अगर चश्मा न हो 
देखूं क्या तुझे ख़ाक 

महसूस तो होती है 
तेरी रंगत तेरी ख़ुश्बू 
सोने दे हुई रात अब 
आ जाएंगे जुगनू  

सब कहते हैं फूलों से हैं 
लब तेरे गुलाबी 
लेकिन ज़रा कम कर ले 
तू ये पेट की चर्बी 

ज़ख़्मी मेरा दिल है अगर 
वजहों में तेरा नाम 
बातें ज़हन की भूल कर 
चुपचाप करो काम  

Wednesday, July 24, 2024

तुम्हारे जैसा

यही सच है, सच है 
यही सच है मैं नहीं हूँ तुम्हारे जैसा 
कौन होता है ज़िन्दगी में किसीके जैसा 
इक दफ़ा खुद को आइना तो दिखाओ ज़रा 
इल्म होगा तुम्हें तू भी नहीं तुम्हारे जैसा 

तुमने इक बात कही थी एक दिन पहले 
आज कहते हो वाक़या न था कोई ऐसा 
फिर बड़ी देर तक सोचा किया तुमको हमने 
और मुझे मिल न सका कोई तुम्हारे जैसा 

आपकी बात ख़यालों को तो हिजाब नहीं 
झूठ सच है मगर सच का कोई जवाब नहीं 
इक तरफ दार ही ले लो सताइश के लिए 
जो कहेगा नहीं कोई भी तुम्हारे जैसा

यही सच है, सच है 
यही सच है मैं नहीं हूँ तुम्हारे जैसा  

Saturday, March 30, 2024

भूला

मसरूफ़ियत में कई काम भूल जाता हूँ 
मिलकर करना है सलाम भूल जाता हूँ 
दिलचस्प हूँ और अनोखा बोहोत हूँ 
खाने हैं मुझको बादाम भूल जाता हूँ  

फिर से चल पड़ता हूँ लंबे सफर पे 
हासिल किए मैं मक़ाम भूल जाता हूँ
रिश्तों से अक्सर पुकारता हूँ सबको
क्या है के सबके मैं नाम भूल जाता हूँ 

मैययत दिवाली या होली के शादी 
लोगों में हूँ बदनाम भूल जाता हूँ 
सीने से लगकर ही मिलता हूँ सबसे 
दुश्मन मैं अपने तमाम भूल जाता हूँ 

आज़ाद कोई भी होता नहीं है 
याद दाश्त का हूँ ग़ुलाम भूल जाता हूँ 
अपनी सफाई में क्या ही कहूँ मैं 
खुद पर लगे इल्ज़ाम भूल जाता हूँ 

सोचा हुआ लिखना पड़ता है अब तो 
जीवन की अब है ये शाम भूल जाता हूँ 
पढ़ना पड़ेगा मुझे ये भी लिखकर 
खुद के लिखे मैं कलाम भूल जाता हूँ 

Monday, March 25, 2024

नहीं समझोगे

अब तो रहने दो मेरी बात तुम नहीं समझोगे 
मेरी बे-ढंग सोच है तुम नहीं समझोगे 
मैं बोलता ही जाऊँगा दीवानों की तरह 
जो सोच रखा है तुमने तुम वही समझोगे 

तुम नहीं समझोगे के क्यूँ तुम नहीं समझोगे 
ये बात सोचने की है ये नहीं समझोगे 
जो मैं कह दूँ के रहने दो मेरी बातों को 
तो मैं खुद में ही हूँ मग़रूर यही समझोगे 

ये समझ दिल की है दिमाग़ से ना समझोगे 
है सोच के परे की बात नहीं समझोगे 
जो आँख मूँद लो दिमाग़ को खाली कर दो 
तब जो समझोगे तो समझो के सही समझोगे 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...