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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Wednesday, February 19, 2025

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी
तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी

मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को
जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर है ये मेरी ख़ामोशी

शाम हाथों में लिए जाम गुज़र जाती है
जब गुज़र है तो बसर है ये मेरी ख़ामोशी

बात कहने से तो चुक जाती है सारी बातें
मेरी बातों में अमर है ये मेरी ख़ामोशी

बे ख़याली तो नहीं होती न कुछ कहने से
बस ख़यालों का शजर है ये मेरी ख़ामोशी

फिर भी ये शोर जो रुकता तो ज़हन सो लेता
सोचता हूँ के किधर है ये मेरी ख़ामोशी

बुत तराशी जो किया करती है दुनिया मेरी
देती दुनिया को सिफ़र है ये मेरी ख़ामोशी

Friday, January 24, 2025

होता है

मैं ये सुनता हूँ के इंसान में सब होता है
फिर जो खोता है यहाँ खुद से ही सब खोता है

बेसबब फिरता है दुनिया की तलब गारी में
फिर ये होता है के दुनिया का ही सब होता है

पहले आदाब से तस्लीम रवायत में रहे
फिर ये होता है के ख़ुद से ही अदब होता है

दिल तो बेहिस की तरह कल पे टला रहता है
फिर ये होता है के कल आज से अब होता है

ऐसा लगता है के सब दुनिया को 'ज़ाहिर' कर दूँ 
फिर ये होता है के रोने का सबब होता है

फिर किसी खोज में निकले है कहीं पर तनहा
फिर ये होता है के खुद में ही वो रब होता है

Wednesday, October 16, 2024

साहब

Behr (2122 1122 1122 22)

सोचना जब भी क़दम कोई उठाना साहब
लौट के आता नहीं गुज़रा ज़माना साहब

फिर न पूछो के पता मेरा नहीं है कोई 
भूलने दो ना मुझे मेरा ठिकाना साहब 

कुछ मिला ही नहीं खाबों में उन्हें पाने से
अब तो बेहतर है उन्हें भूल ही जाना साहब

कुछ तो नग़मे हैं के जिनमें हैं सुहानी यादें
फिर चला देना मिरा गाना पुराना साहब

खुद मिली हो जो सज़ा याद कहाँ आती है
भूल जाता हूं ज़रा मुझको डराना साहब 

हैं निगाहें भरी महफ़िल में वजाहत पर ही
आप साहब हैं सभी ने ये कहा ना साहब

दो निवाले थे हमारी भी निगाहों में कभी 
पर अब अच्छा नहीं लगता है ये खाना साहब

मुझको आगे नहीं ला सकते हो तो मत लाना
कम से कम पीछे तो मुझको ना गिराना साहब
 
चोट लग सकती है शायर को ज़रा हौले से
इतना आसाँ नहीं कोई वज़्न गिराना साहब

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...