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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Thursday, February 13, 2025

क्या कहूँ

बे बूझ सवालों में हूँ कब से फँसा कहूँ

आता नहीं समझ के किसे बे तुका कहूँ


इतने हैं रहनुमा यहाँ के सोचता हूँ मैं

किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ


ग़म दिल में बस रहा है और दिल पे बस नहीं 

ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं के ग़म शुदा कहूँ 


कितना क़रीब है तू मेरे क्या कहूँ मैं अब

बातों ने तेरी मुझको है कितना छुआ कहूँ


जीता हूँ मैं यहाँ कभी मरने के लिए ही 

कितना मैं जी चुका कहूँ कितना मरा कहूँ


आँखें तलाशती हैं कोई ख़ुद सा अजनबी

कब तक मैं आइने को भला अब बुरा कहूँ


अफ़्सुर्द हाल दिल का हुआ बाद तेरे मैं

घायल हुआ हूँ कितना मैं कितना बँटा कहूँ


करता हूँ शौक़ से मेरी बर्बादी का हिसाब

लूटा है तूने कितना मैं कितना लुटा कहूँ


जिस बात का था डर मुझे उसके उलट हुई

शुक्रे ख़ुदा कहूँ इसे माँ की दुआ कहूँ


चुभती थी तेरी याद तेरे प्यार की सदा

दिल टूटने पे था मेरा कितना दुखा कहूँ


बादल की शक्ल अश्क़ भी आँखों में गये 

कितना है इसमें कोहरा तो कितना धुआँ कहूँ 


यारों ने तेरे नाम से ताने बहुत दिये

कल रात बज़्म में हुआ कितना मज़ा कहूँ


'ज़ाहिर' को मैं सुनाऊँ ग़ज़ल या क़ता कहो 

क्या क्या नहीं है तुझपे लिखा क्या यहाँ कहूँ

Wednesday, February 12, 2025

दिन आ रहे हैं


क़रीबी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं

हवा मीठी मीठी गुलाबी गुलाबी
मुहब्बत जताने के दिन आ रहे हैं

अभी जिनको उड़ने की न हो इजाज़त
तो पर फड़ फड़ाने के दिन आ रहे हैं

लिखे शेर जो रात दिन जिनकी ख़ातिर
वो पढ़ने पढ़ाने के दिन आ रहे हैं

उन्हें जो सुना हो कभी गुनगुनाते
वो गाने बजाने के दिन आ रहे हैं

जो रूठे हुए हैं बिना बात के ही
उन्हें फिर मनाने के दिन आ रहे हैं

है ठंडी हवा धूप भी बढ़ रही है
कबूतर उड़ाने के दिन आ रहे हैं

कोई दोस्त हों या पडोसी तुम्हारे
सभी को जलाने के दिन आ रहे हैं

नज़र जो चुराते थे अब तक उन्हीं से
तो नज़रें मिलाने के दिन आ रहे हैं

कहीं तन्हा बैठे अकेले अकेले
यूँही बड़बड़ाने के दिन आ रहे हैं

कहीं कोई लैला न मिल जाए 'ज़ाहिर'
ये दाढ़ी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं

Friday, February 7, 2025

तेरा ख़याल

जब कभी तेरा ख़याल आता है
जाने क्या दिल को हुआ जाता है

वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है
तू मेरे दिल में समा जाता है

ग़ैर लगती है ये दुनिया मुझ को
तू सगा दिल को नज़र आता है

धड़कनें रफ़्त हैं मेरे दिल की
मैं हूँ ज़िंदा ये यक़ीं आता है

इक दफ़ा मेरी तरफ़ भी देखो
क्या तेरा इसमें चला जाता है

Wednesday, February 5, 2025

टहनी

बात कहने को बात कहनी थी
जो अनकही थी दिल में रहनी थी

बोझ कैसे उतरता दिल का भला
दिल कि बातें न थी वो ज़हनी थी

गिर गई वो चलो अच्छा ही हुआ
वो इमारत कभी तो ढहनी थी

ख़ुद को अब भी मेरा बताने को
उसने मेरी ही शाल पहनी थी

जाने कैसे हुआ पलट क्यूँ गई
जो हवा मेरी ओर बहनी थी

उससे वा बस्त होके 'ज़ाहिर' था
तंज़ ओ फ़िक्रों की बात सहनी थी

फूल तूफ़ान आ के लेके गया
बच गई सिर्फ़ एक टहनी थी

Sunday, February 2, 2025

देखा

उसके जाने का ये असर देखा
आज वीरान अपना घर देखा
डूबता ही चला गया, जब से 
उसकी आँखों में अपना दर देखा 

उसकी महफ़िल में पारा पारा थे
उसकी मुझपर ही थी नज़र, देखा?

अक्स आईने में मेरा जो दिखा
उसने फिर ख़ुद को देखकर देखा

बात आगे न की के मैंने तुझे  
बात करता अगर मगर देखा 

मैं तो बिलकुल से उसका पूरा था 
उसने तो बस मेरा हो कर देखा 

मैं उजड़ के बिखर न जाऊँ कहीं
उसकी आँखों में मैंने डर देखा

शौक़ 'ज़ाहिर' था लौट कर देखूँ
हूक का मैंने फिर भँवर देखा

उससे मिलना था ख़ाब मेरे लिये
ख़ाब में उसको रात भर देखा

Wednesday, January 8, 2025

आबशार

ग़म दिल में हूँ हवाओं के बे-क़रार में हूँ

या कहो जान तमन्ना मैं तेरे प्यार में हूँ


ये तिरा साथ जो मिल जाए तो शिफ़ा ही मिले

यूँ मचलकर के मैं उड़ने के इंतज़ार में हूँ

[शिफ़ा = रोग से मुक्ति]


है किसे फ़िक्र ज़माने की बात कौन सुने

तिरे होठों से ये कह दो मैं एतबार में हूँ

[एतबार = trust]


ये भवें तेरी नज़र तेरी तेरी चाल बला

है ख़ुदा पहले मगर मैं भी हुस्न कार में हूँ

[हुस्न कार = creator of the beauty]


ये तो 'ज़ाहिर' है के ज़िंदा हूँ आस पे ही तेरी

आजकल शामों सहर तेरे रोज़गार में हूँ


मैं तो तेरे ही पिघलते से इंतज़ार में हूँ

ले मुझे जीत मुसलसल मैं अपनी हार में हूँ


है मुझे तिश्नगी क्या जाने किस जनम की जज़ा

के जनम ले के तिरे बार-ओ-आबशार में हूँ

[तिश्नगी = तपन, जज़ा = बदला, बार = rain, आबशार = झरना]

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...