About Me

My photo
I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Showing posts with label flirt. Show all posts
Showing posts with label flirt. Show all posts

Saturday, July 13, 2024

ख़ुश्बू (नज़्म)

रात की बात अंधेरों में फैल जाती है 
धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है 
इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर 
तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिलने आती है 

तेरी ख़ुश्बू में जाने क्या बात ऐसी रही 
के वो अशरों के बाद भी ज़हन से जाती नहीं 
अब तो आदत ही हो गई है और मेरे लिए 
तुझे महसूस करना कोई बड़ी बात नहीं 

किसके मानिंद है ख़ुश्बू तेरी मैं कैसे कहूँ 
के कोई इत्र कोई फूल ऐसा मिल न सका 
मुस्कराहट तेरे जैसी किसी को मिल ना सकी
और दुनिया में कोई तेरे जैसा खिल न सका 

Monday, June 17, 2024

मन कंगन

मतवारा मोरा मन 
चंचल जैसे कंगन
मतवारा मोरा मन 

मन चाहत जो भी नाहि मिले 
मिल जाये कदर वा की ना करे 
अभिमानी प्रपंची हठ ये धरे 
और बाजे छन छन छन 

मतवारा मोरा मन 
चंचल जैसे कंगन
मतवारा मोरा मन 

जब ध्यान करे और ज्ञान धरे 
तब एक अग्र चित हाथ धरे 
मन बाहर से आघात करे 
और डोले यह आसन 

मतवारा मोरा मन 
चंचल जैसे कंगन
मतवारा मोरा मन 

यह चंचल और चपल मन है 
चिंतन इसको प्रति पल पल है 
आकाश में घिर घिर आये 
जैसे कारे बादल 

मतवारा मोरा मन 
चंचल जैसे कंगन
मतवारा मोरा मन 

Tuesday, June 4, 2024

बस इक दफ़ा

बस इक दफ़ा तुझे मिलने की मोहलत ही चाहिए 
फिर मुझे कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

आँख भर देख के भर जाए दिल तो क्या ही बात हो 
तेरे होंटों के लरज़िशों सी बेबसी भी चाहिए 
फिर मुझे कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

फूल इठलाना सीख जाएँ तेरी चाल देख कर 
तेरे सबक़ के साथ इनको नसीहत भी चाहिए 
फिर इन्हें कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

बात तस्वीर से बन जाती तो इतना बुरा न था 
मेरी दुनिया को तेरे दिल की मुहब्बत भी चाहिए 
फिर मुझे कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

Friday, April 26, 2024

रूठना तेरा

इस तरह से लूटना तेरा 
दिल को छू जाए रूठना तेरा 
याद रह जाए यूँ मनाने पर
प्यार करने पे टूटना तेरा 

जो सज़ा चाहो वो सज़ा दे दो 
मुझको मंजूर कूटना तेरा 
बेरुखी मुझको करती है मायूस 
अब जरूरी है फूटना तेरा 

दूर जाने की सोचना भी नहीं 
सह न पाऊँगा छूटना तेरा 
सह न पाऊँगा छूटना तेरा 
सह न पाऊँगा छूटना तेरा 

Tuesday, April 9, 2024

सदा

देखा जो उन्हें बाग़ में महसूस ये हुआ 
रंगीन था ये बाग़ महकता कभी न था 
सूरत तो उनकी दूर तक मशहूर थी मगर 
चेहरे से पहले हुस्न टपकता कभी न था 
[बाग़ = garden], [हुस्न = beauty]

नज़रों से देखते तो थे, इस बार बात की 
आँखों में पहले आब चमकता कभी न था 
पहले तमीज़ तीर की होती थी कुछ अलग 
करता था दिल पे चोट, गुज़रता कभी न था 
[आब = water]

दिल होश में रहता था शराबों के शहर में 
कितने भी जाम हों ये बहकता कभी न था 
दिल की रग़ों में जोश था लेकिन ये इस क़दर 
पैग़ाम देखने को तड़पता कभी न था 
[जाम = peg], [रग = veins], [पैग़ाम = messege]

देखी है क़ायनात में क़यामत से ज़ीनातें 
दो पल भी देखने को ठहरता कभी न था 
उनकी सदा सुनी है जबसे दिल को यूँ लगा 
दिल काम तो करता था धड़कता कभी न था 
[क़ायनात = universe], [क़यामत = doom day]

Saturday, April 6, 2024

मार डाला

जिन्हें चाहतें थी तेरी चाहतों की 
तेरी हसरतों ने उन्हें मार डाला 
तेरी ज़ुल्फ़ की उलझनों से जो निकले
निगाहों ने तेरी उन्हें मार डाल 

तेरी खुशबू जैसा महकता है संदल 
तेरे तन बदन का सुखन है निराला 
जिन्हें तेरी आँखों ने देखा नहीं था 
अदाओं ने तेरी उन्हें मार डाला 

तेरे सुर्ख होंठों पे लफ्जों के झरने 
नहीं जिसने देखे अकल पे है ताला 
तेरे मयकदे तक न जो आ सके हों  
सदाओं ने तेरी उन्हें मार डाला  

Friday, March 22, 2024

लाचारी

गुफ़्तगू में तेरी बारी मेरी बारी से कम है क्या 
मैं जैसे जी रहा हूँ ये कलाकारी से कम है क्या 
न मतलब पूछ तू मुझसे बे वझा क्यों झगड़ते हो 
दिलों के बीच की बातें रिश्तेदारी से कम है क्या 

मेरा क़ातिल मेरे ही घर खून मेरा कर रहा हो 
मेरा ये फिर भी चुप रहना वफ़ादारी से कम है क्या 

किसी भी बात में लफ़्ज़ों का होना तो मुनासिब है 
बिना लफ़्ज़ों के फ़रमाना समझदारी से कम है क्या 

ज़रा देखूं तो पर्दों से ज़रा हट के तुझे भी मैं 
तेरे आँखों की मुस्कानें अदाकारी से कम हैं क्या 

वो कहते हैं नहीं रहते हैं पर्दों में कभी लेकिन 
निगाहों पे पड़ी ज़ुल्फ़ें पर्देदारी से कम है क्या 

न पूछो क्या हुआ है मर्ज़ हमको क्या अलालत है 
तेरी ही धुन में फिरते हैं ये बीमारी से कम है क्या 

फ़िज़ाओं में तेरी खुशबू ज़हन में तुम ही रहते हो 
अकेला दिल धड़कता है ये लाचारी से कम है क्या 

Friday, March 8, 2024

रूह अफ़्ज़ा

आजकल हम भी तेरी उल्फतों में रहते हैं 
बारहा चारों पहर मयकदों में रहते हैं 
नज़्म, शेरों में ग़ज़ल में और मिसरों में 
तेरी  बातों के कई शायरों में रहते हैं 

तेरे रुखसार पे जो तिल की तरह दिखता है 
ये तेरे हुस्न की ही ख़िदमतों में रहते हैं 

रौशनी के लिए हम छत पे खड़े हैं कबसे 
चाँद के साथ हम भी ज़ुल्मतों में रहते हैं 

ज़रा ख़याल करो देखो कभी हमको भी 
हम तेरे साथ कई दावतों में रहते हैं 

कितनी मसरूफ हैं ज़ुल्फ़ें ये तेरे चेहरे पर 
मुश्किलों से ये कभी  फुर्सतों रहते हैं 

एक छूटी थी अभी सांस तभी देखा तुम्हें 
एक अरसे से यूँ ही मुद्दतों में रहते हैं 

आँख है झील तेरी ज़ुल्फ़ घने बादल हैं 
देख हम कैसे यहाँ क़ुदरतों में रहते हैं 

किसी नशे से कम नहीं आपकी बातें  
आप अक्सर ही मेरी आदतों में रहते हैं 

बात करते हो तो लगता है जैसे रूहअफ़्ज़ा  
नोश फरमाओ जी हम शर्बतों में रहते हैं 

Thursday, February 29, 2024

नशा

किसी ने ये पूछा मुझे कल कहीं 
कहीं मुझको तेरा नशा तो नहीं 
नहीं है नशा कह तो डाला मगर 
बता उसका कहना सही तो नहीं 

सही तो नहीं ऐसा लगता नहीं 
मगर तुम किसी से ये कहना नहीं 
मुझे भी ज़रा तू बता तो सही 
कहीं तुझको मेरा नशा तो नहीं 

न जाने क्यूँ दिल में ये रफ़्तार है 
न जाने के किस्से किसे प्यार है 
तेरी धक् मेरी धक् से धक्-धक् हुई 
कहीं हमको कोई नशा तो नहीं 

Monday, February 26, 2024

नज़र

बाग़ रंगत के गीत गाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 
दिल धड़कना भी सीख जाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

यूँ पुकारा ना करो टीलों से 
पीछे पीछे ही चले आएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

लब तो हैं पर वो रोशनाई कहाँ 
बात कहना भी सीख जाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

ज़ख़्म दिल का कुरेद कर देखो 
चीज़ इक कीमती दिखाएँगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

रात की बात भूल जाओ तुम  
दिन बता कैसे ये बिताएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

आँख आंसू बहाते हैं साक़ी 
आंसू बहना ही भूल जाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

तेरी शतरंज में मिसाल कहाँ 
खुद की बाज़ी से मात खाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

Friday, February 23, 2024

किश मिश

ज़िन्दगी में कभी ऐसी
फिर से आतीश नहीं होती (आतिश = light)
तुझको पा ही लेते गर हम 
फिर ये ख़्वाहिश नहीं होती (ख़्वाहिश = desire)

इश्क़ में बादल बारिश की
आज़माइश नहीं होती (आज़माइश = test)
शायरी फिर भी कर लेता
ऐसी कोशिश नहीं होती 

तू अगर मेरे ख़्वाबों में 
सारी गर्दिश नहीं होती (गर्दिश = rotation, everywhere)
शेर तुझपे तो पढ़ देता 
ऐसी लर्ज़िश नहीं होती (लर्ज़िश = vibrato)

सोच अपने सफर में गर 
ऐसी बंदिश नहीं होती (बंदिश = restriction)
खीर में सब कुछ तो होता 
मगर किश मिश नहीं होती 

Saturday, February 17, 2024

कोहिनूर

हुस्न तेरा ये कोहिनूरी है 
अब्र की शिद्दतें भी पूरी हैं .... (अब्र = बादल, शिद्दत  = intensity)
दिल संभाले तो कोई कैसे बता 
कुछ तो कहना तुझे ज़रूरी है 

ये चमक है तेरा सुरूर-ए-नशा  .... (सुरूर = toxic)
आँख तेरी ये चश्म-ए-नूरी है  .... (चश्म-ए-नूरी = प्रकाश सी नज़र )
देख अपनी नज़र को देख ज़रा
देख इनको ये भूरी भूरी हैं

मुस्कराहट से काम चलता है 
रुख़ पे तेरे हंसी अधूरी है (रुख़ = चेहरा)
मिलने आये हो कुछ तो बात करो 
बात करना भी तो ज़रूरी है  

कुछ भी करवा ले आज तेरा शबाब 
आज की रात भी सिन्दूरी है 
इम्तेहां लोगे कोई बात नहीं 
हाथ कंगन को कितनी दूरी है 

बात की बात भूलने वाले 
झूठ इतना भी क्या ज़रूरी है 
बक़्श दो अर्ज़ मेरे शेरों को 
मेरी ग़ज़ल अभी अधूरी है 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...