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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Saturday, September 14, 2024

अख़बार

असली शायर: अदा जाफ़री 

तिरे छत की मिरी छत से नज़र दो चार हो जाना 
बिना इज़हार या इनकार के यूँ प्यार हो जाना 
कभी होता था अपनी गुफ़्तगू का ढंग वो नादिर 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हमारे शेर छपते थे तुम्हारी बात छपती थी 
ना जाने किस जनम की किस वतन की बात कबकी थी 
अगर कुछ याद आए तो ज़हन मेरे उतर आना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हुआ अरसा ऍ मेरे दोस्त मिलने तो कभी आना 
मेरी बातें भी सुन लेना और अपनी भी सुना जाना 
अगर कोई बात ना आए ज़हन में तो ये कर लेना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

वो मल्लाह आज भी कहता है बाबू और कैसे हो 
हम उसको नोट देते तो कहते थे के पैसे दो 
हमें बैठा के कश्ती में यही वो काम करता था 
कभी इस पार को आना कभी उस पार को जाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

किसी को सीख देनी हो किसी से सीख लेनी हो 
किसी को दान देना हो किसी से भीख लेनी हो 
जो जैसा हो उसे वैसी ही सूरत अपनी दिखलाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना 

हर इक इंसान पौधे जान की क्या है यहाँ फितरत
बता जाते हैं अज़मत से हर इक शय की यहां कीमत 
यहीं नस्लों ने एक दूजे को जाना और पहचाना
कभी अखबार पढ़ लेना कभी अखबार हो जाना

Monday, April 15, 2024

क्या ख़बर है तेरी

और बता क्या ख़बर है तेरी 
आज कैसे याद आ गई मेरी 
तुम तो मसरूफ़ थे अपनी राहों पे 
आज क्यूँ राह मुड़ गई तेरी 

जबसे मंज़िलें तेरे ख्वाबों में हैं 
और बुलंदी तेरे इरादों में हैं 
नज़र तूने इधर नहीं फेरी 
तो आज कैसे याद आ गई मेरी 

कोई काम निकल आया होगा तेरा 
वरना वक़्त तो काफी ज़ाया होगा तेरा 
कहीं तुझे हो तो नहीं रही देरी 
वैसे कैसे याद आ गई मेरी 

अब आये हो तो ज़रा सुकून कर लो 
ताज़ी सी कुछ साँसें ही भर लो 
सफ़र में बोहोत काम आएँगी तेरी 
और बता क्या ख़बर है तेरी 

Sunday, April 14, 2024

ज़िम्मेदार

मेरे जीवन के मौसम की तू बहार लगता है 
मैं नैया हूँ भँवर में तू मेरी पतवार लगता है 
किसी के मन में तो कोई उतर सकता नहीं लेकिन 
तेरे एहसास की सौगंध मुझे तू यार लगता है 

बुलाने की कभी तुझको ज़रुरत ही नहीं पड़ती 
मेरा बस सोचना तुझको मेरी पुकार लगता है 

मेरी चाहत मेरे सब शौक़ की बातें न मुझसे कर 
तुझे जो ना गवारा हो मुझे बेकार लगता है 

अलावा तेरे कोई भी न हमसे मिलता जुलता है 
तेरा होना मेरे संसार को संसार लगता है 

मेरी गलती पे मुझको टोकना तेरा मुनासिब है 
ख़फ़ा तुम मुझसे हो जाओ तो मन लाचार लगता है 

अगर जीवन में कोई भी मेरे कोई तमाशा हो 
मेरा ज़िम्मा तू रख लेगा तू ज़िम्मेदार लगता है 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...