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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Wednesday, February 19, 2025

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी
तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी

मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को
जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर है ये मेरी ख़ामोशी

शाम हाथों में लिए जाम गुज़र जाती है
जब गुज़र है तो बसर है ये मेरी ख़ामोशी

बात कहने से तो चुक जाती है सारी बातें
मेरी बातों में अमर है ये मेरी ख़ामोशी

बे ख़याली तो नहीं होती न कुछ कहने से
बस ख़यालों का शजर है ये मेरी ख़ामोशी

फिर भी ये शोर जो रुकता तो ज़हन सो लेता
सोचता हूँ के किधर है ये मेरी ख़ामोशी

बुत तराशी जो किया करती है दुनिया मेरी
देती दुनिया को सिफ़र है ये मेरी ख़ामोशी

Thursday, February 13, 2025

क्या कहूँ

बे बूझ सवालों में हूँ कब से फँसा कहूँ

आता नहीं समझ के किसे बे तुका कहूँ


इतने हैं रहनुमा यहाँ के सोचता हूँ मैं

किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ


ग़म दिल में बस रहा है और दिल पे बस नहीं 

ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं के ग़म शुदा कहूँ 


कितना क़रीब है तू मेरे क्या कहूँ मैं अब

बातों ने तेरी मुझको है कितना छुआ कहूँ


जीता हूँ मैं यहाँ कभी मरने के लिए ही 

कितना मैं जी चुका कहूँ कितना मरा कहूँ


आँखें तलाशती हैं कोई ख़ुद सा अजनबी

कब तक मैं आइने को भला अब बुरा कहूँ


अफ़्सुर्द हाल दिल का हुआ बाद तेरे मैं

घायल हुआ हूँ कितना मैं कितना बँटा कहूँ


करता हूँ शौक़ से मेरी बर्बादी का हिसाब

लूटा है तूने कितना मैं कितना लुटा कहूँ


जिस बात का था डर मुझे उसके उलट हुई

शुक्रे ख़ुदा कहूँ इसे माँ की दुआ कहूँ


चुभती थी तेरी याद तेरे प्यार की सदा

दिल टूटने पे था मेरा कितना दुखा कहूँ


बादल की शक्ल अश्क़ भी आँखों में गये 

कितना है इसमें कोहरा तो कितना धुआँ कहूँ 


यारों ने तेरे नाम से ताने बहुत दिये

कल रात बज़्म में हुआ कितना मज़ा कहूँ


'ज़ाहिर' को मैं सुनाऊँ ग़ज़ल या क़ता कहो 

क्या क्या नहीं है तुझपे लिखा क्या यहाँ कहूँ

Wednesday, February 12, 2025

दिन आ रहे हैं


क़रीबी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं

हवा मीठी मीठी गुलाबी गुलाबी
मुहब्बत जताने के दिन आ रहे हैं

अभी जिनको उड़ने की न हो इजाज़त
तो पर फड़ फड़ाने के दिन आ रहे हैं

लिखे शेर जो रात दिन जिनकी ख़ातिर
वो पढ़ने पढ़ाने के दिन आ रहे हैं

उन्हें जो सुना हो कभी गुनगुनाते
वो गाने बजाने के दिन आ रहे हैं

जो रूठे हुए हैं बिना बात के ही
उन्हें फिर मनाने के दिन आ रहे हैं

है ठंडी हवा धूप भी बढ़ रही है
कबूतर उड़ाने के दिन आ रहे हैं

कोई दोस्त हों या पडोसी तुम्हारे
सभी को जलाने के दिन आ रहे हैं

नज़र जो चुराते थे अब तक उन्हीं से
तो नज़रें मिलाने के दिन आ रहे हैं

कहीं तन्हा बैठे अकेले अकेले
यूँही बड़बड़ाने के दिन आ रहे हैं

कहीं कोई लैला न मिल जाए 'ज़ाहिर'
ये दाढ़ी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं

आहट

दिल तरसता है किसी रोज़ की आहट के लिए
मुद्दतों से हूँ परेशान मैं राहत के लिए

चश्म-ए-साक़ी की निगाहों में ख़ुशी की ख़ातिर
फूल चुनता हूँ लगाता हूँ सजावट के लिए

ख़ाब सच करने को मिलना था मुझे भी उनसे
और मिलना भी था 'ज़ाहिर' है मलामत के लिए

ख़ुशबू-ए-दिल की महक आती है मेरे घर से 
रूह जलती है महकती है इबादत के लिए

दिल को तालीम दिलाता हूँ डुबा कर खुद में
नींव गहरी हो ज़रूरी है इमारत के लिये

वो नहीं आये न आएंगे मुझे लगता है
क्या उनका आना ज़रूरी है मोहब्बत के लिए?

Tuesday, February 11, 2025

और भी हैं

असली शायर: अल्लामा इक़बाल 


निगाहों परे आसमाँ और भी हैं 

यहीं इक नहीं आशियाँ और भी हैं 

है सर पे फ़लक हैं फ़लक पे सितारे 

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं 


नहीं तू सही, तू नहीं इक सहारा 

मेरे हुस्न के कद्रदाँ और भी हैं 


किसी इक ज़बाँ की नहीं मिल्कियत तू  

मोहब्बत तेरे हम ज़ुबाँ और भी हैं


गुनाहों की बातें ज़रा रुक के सुनना 

मेरे दोस्तों के बयाँ और भी हैं


है फ़ेहरिस्त लंबी यही बस नहीं है 

मेरे नाम पे ग़लतियाँ और भी हैं 


क्या 'ज़ाहिर' सभी अश्क़ तुझपे लूटा दूँ 

अभी तुम चलो बे कुआँ और भी हैं 


ख़ुशी मत मनाना अगर बैठ जाऊँ

मेरे पास तीर-ओ-कमाँ और भी हैं 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...