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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Monday, February 10, 2025

देखता रह गया

असली शायर: अज़ीज़ क़ैसी


आपको देख कर देखता रह गया

मैं भरी भीड़ में बुत बना रह गया 


वो तो घर पे ही थे आईने में मेरे 

और मैं दो जहाँ ढूँढता रह गया 


ख़ाब उनके हुए सच, थे जो ख़ाब में 

ख़ाब मेरा सजा का सजा रह गया


जिनसे मिलता हूँ उनका पता है पता 

जो नहीं मिल सका ला पता रह गया 


कितने अरसे हुए मिलके उनसे मुझे

सोचते सोचते सोचता रह गया


दिल में इज़हार था और लब थे सिले 

सोचता था कहूँ हर दफ़ा रह गया 


रात 'ज़ाहिर' बहुत बादलों की हुई 

देख ले अब खुला आसमा रह गया 


मंजिलें मिल गई उनको जो रुक गए

रासता बे-ग़रज़ रासता रह गया

है मुसलमाँ का मक्का मदीना अना 

पूछ दिल कितना पाक--सफ़ा रह गया

Sunday, February 9, 2025

सुख़न

आदमी ज़ोफ़-ए-तन देख सकता नहीं

रश्क अह्ल-ए-सुख़न देख सकता नहीं

है अना वो बला सर पे चढ़ जाये तो

पैरहन पैरहन देख सकता नहीं

[ज़ोफ़-ए-तन = weakness of body, रश्क = jealousy, अह्ल-ए-सुख़न = poet, अना = ego, पैरहन = clothes]


देखते हैं सभी आईना पर कोई

आइने की घुटन देख सकता नहीं


जो मुझे दिख रहा है यहाँ से अभी

कोई ये अंजुमन देख सकता नहीं

[अंजुमन = नज़ारा]


अब्र ने चाँद को ढँक लिया अब कोई

चाँदनी की किरन देख सकता नहीं

[अब्र = बादल]


जो भी है बुत कदा और है ना ख़ुदा

वो मेरा फ़िक्र-ओ-फ़न देख सकता नहीं

[बुत कदा = जिसे सब कुछ पता हो, ना ख़ुदा = नास्तिक, फ़िक्र-ओ-फ़न = विचारों की कलाकारी]



जब से अपनों ने है मुझको रूखसत किया 

मैं ये अपना बदन देख सकता नहीं

[ज़मीं-दोस्त = ज़मीन में गाड़ देना]


आइने को न जाने गुमा क्या हुआ

के वो मेरा दहन देख सकता नहीं

[गुमा = अहंकार]


मैंने पड़ने न दी अपने सर पे शिकन

अब कफ़न पे शिकन देख सकता नहीं


वाइज़ों ने सुनाई थी जो दास्ताँ

मैं वो 'ज़ाहिर' अदन देख सकता नहीं

[वाइज़ = उपदेश देने वाला, रश्क-ए-अदन = beautifully perfect]



मैं दराज़ों का शायर नहीं हूँ मुड़े

काग़ज़ों पे सुख़न देख सकता नहीं

[सुख़न = कविता]


Thursday, December 12, 2024

ज़िंदगी

ज़िन्दगी ज़िन्दगी हर तरफ ज़िन्दगी
लाख़ कुनबों का है ये शजर ज़िंदगी 
दौर है मुख़्तसर आरज़ू ऐं बड़ी
मौत से मौत तक का सफ़र ज़िंदगी 
[शजर = Tree,  दौर = Time, मुख़्तसर = small, आरज़ू = desire]

वक़्त के छोर पर जो विदा कर चले 
फिर उसी राह पर मुंतज़र ज़िंदगी 
[मुंतज़र = इंतज़ार में ]
 
सबकी आँखों से देखे सुने कान से 
बात 'ज़ाहिर' करे उम्र भर ज़िंदगी 

फ़िक्रे अंजाम से है परेशान तू 
किसकी नज़रों में है सर बसर ज़िंदगी 
 
क्या है अच्छा बुरा पाक बे काएदा
इन सवालों से है बेख़बर ज़िन्दगी

हर सफ़र के किनारे ख़रीदी हि थी 
इक नई ज़िन्दगी बेचकर ज़िन्दगी

नाम कर ले मगर एक दिन ये तुझे 
कर ही जाएगी फिर गुमशुदा ज़िंदगी 

तू नज़र यार अपनी बदल इक दफ़ा
मौत के बीच में है अमर ज़िंदगी 
[नज़रिया = point of view]
 
आग पानी हवा का घुलन भर है ये 
है धड़कती हुई साँस भर ज़िंदगी 

Friday, December 6, 2024

अजनबी

Bahr: 212-212-212-212


हम भि हैं अजनबी तुम भि हो अजनबी
रास्ते अजनबी मंज़िलें अजनबी
सोचा हम ही चलो बात कर लें जहाँ
है सफ़र अजनबी हर नज़र अजनबी

हमने सोचा बोहोत और पाया यही
हर किसी तौर पर हर कोई अजनबी
ज़ाइदों के लिए बारहा ही रहा
है ज़हन अजनबी और बदन अजनबी
[ज़ाइद = छोटे बच्चे, बारहा = हमेशा से]

ये जो पहचान है ये भी मिट जाएगी
दर-बदर रूह भटकेगी फिर अजनबी
दीद की बात कहता है 'ज़ाहिर' सुनो
ज़िन्दगी अजनबी मौत भी अजनबी
[दीद = philosophy]

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
सीख लेती है एहले हुनर अजनबी
घर बसाने की खातिर चली जाती है
हो जहाँ पर की दीवारो-दर अजनबी

हाल तेरा जो है वो पता है मुझे
माना तकदीर का है ज़हर अजनबी
छोड़ दो वक़्त को वक़्त के हाल पर
है फ़िकर अजनबी चारगर अजनबी
[चारगर = solution दिलाने वाला]

Sunday, October 26, 2008

तौहीन

Bahr" 
  • 212
  • 212
  • 212
  • 212

  • ग़म जो करता है दिल किस लिए किस लिए
    कौन अपना है हम किस लिए किस लिए
    साथ मजधार में छोड़ना है अगर
    हाथ में हाथ फिर किस लिए किस लिए

    जब के एहले खुदा खाब से कम नहीं
    तर्जुमाँ दिल में है किस लिए किस लिए

    मौत है ज़िन्दगी ज़िन्दगी मौत है
    बेबसी बेखुदी किस लिए किस लिए

    जब सफर का कोई हमसफ़र ही नहीं
    बात की तिश्नगी किस लिए किस लिए

    तू पशेमां नहीं फ़िक्र ऐ अंजाम से
    फिर ये बेचारगी किस लिए किस लिए

    वो मेरे ना रहे मैं किसी का नहीं 
    तू परेशान है किस लिए किस लिए

    सुबह से रात तक सोचते हम रहे
    शाम होती नहीं किस लिए किस लिए

    साँस लेना तो कब का भुला हम चुके
    जान जाती नहीं किस लिए किस लिए

    आज महगी बड़ी लग रही हैं मुझे
    प्यार की क़ीमतें किस लिए किस लिए

    कितनी तौहीन अपनी सहूँ और अभी 
    मस्ल-ऐ-इंसानियत किस लिए किस लिए

    जब ग़ज़ल को तरन्नुम में गाना नहीं 
    बेह्र में मैं लिखूं किस लिए किस लिए 




    Gham jo karta hai dil kis liye kis liye
    ग़म जो करता है दिल किस लिए किस लिए
    Kaun apna hai ham kis liye kis liye
    कौन अपना है हम किस लिए किस लिए
    Saath majdhar me chhodna hai agar
    साथ मजधार में छोड़ना है अगर
    Hath me haath phir kis liye kis liye
    हाथ में हाथ फिर किस लिए किस लिए

    Jab ke ahl-e-Khuda Khaab se kam nahi
    जब के एहल-ऐ-ख़ुदा ख़ाब से कम नहीं
    TarjumaaN dil me hai kis liye kis liye [TarjumaaN = interpretation]
    तर्जुमाँ दिल में है किस लिए किस लिए
    Maut hai zindagi, zindagi maut hai
    मौत है ज़िन्दगी, ज़िन्दगी मौत है
    Tohfa-o-taaj-e-takht kis liye kis liye
    तोहफा-ओ-ताज-ऐ-तख्त किस लिए किस लिए

    Jab safar ka koi hamsafar hi nahi
    जब सफर का कोई हमसफ़र ही नहीं
    Ishq ki tishnagee kis liye kis liye [tishnagee=desire]
    इश्क की तिश्नगी किस लिए किस लिए

    Too pashemaaN nahi fikr-e-anjaam se [pashemaaN=ashamed]
    तू पशेमां नहीं फ़िक्र-ऐ-अंजाम से
    Phir ye bechaargee kis liye kis liye
    फिर ये बेचारगी किस लिए किस लिए

    Kal wo kehta tha tum ab rahe na mere
    कल वो कहता था तुम अब रहे ना मेरे
    Mai pareshaan hoon kis liye kis liye
    मैं परेशान हूँ किस लिए किस लिए

    Raat se subah tak sochte ham rahe
    रात से सुबह तक सोचते हम रहे
    Shaam hoti nahi kis liye kis liye
    शाम होती नहीं किस लिए किस लिए

    Saans lena to kab ka bhula ham chuke
    साँस लेना तो कब का भुला हम चुके
    Jaan jati nahi kis liye kis liye
    जान जाती नहीं किस लिए किस लिए

    Aaj mehngi badi lag rahi hain mujhe
    आज महंगी बड़ी लग रही हैं मुझे
    Pyar ki qeematein kis liye kis liye
    प्यार की क़ीमतें किस लिए किस लिए

    Kitni tauheen apni sahoge vivek
    कितनी तौहीन अपनी सहोगे विवेक
    Masl-e-insaaniyat kis liye kis liye [masl=likeness]
    मस्ल-ऐ-इंसानियत किस लिए किस लिए

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...