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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Tuesday, February 11, 2025

कोई पागल समझता है

असली शायर: कुमार विश्वास 

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
कोई ठोकर से है मुझको हुआ घायल समझता है
मैं घायल जानता हूँ हूँ मैं दीवाना मैं पागल हूँ
मगर दीवाने की हालत तो बस पागल समझता है

ये लड्डू है बना घी से तभी ये टेढ़ा मेढ़ा है
मगर तू हाय क्यों जाने इसे मगदल समझता है

कहाँ किस रासते आती है जाड़ों में किनारों से 
हवा घुसती कहाँ से है तेरा कंबल समझता है

कभी दिल्ली का बाशिंदा चला जाता है गर ऊटी
तमिल नाडू को बेचारा हरा केरल समझता है

मेरे बाबा जो कहते थे वो सहगल और है कोई 
मेरा बेटा किसी रैपर को ही सहगल समझता है

दिखाकर और सिखाकर भी किसी को कुछ नहीं समझा 
मगर 'ज़ाहिर' तो आँखों के हर इक सिग्नल समझता है

कभी भी छोड़ना मत अपनी माँ का पाक सा पल्लू
ये तेरा आसमाँ है जिसको तू आँचल समझता है
(आस माँ की आसमाँ है जिसे आँचल समझता है )

Saturday, September 14, 2024

अख़बार

असली शायर: अदा जाफ़री 

तिरे छत की मिरी छत से नज़र दो चार हो जाना 
बिना इज़हार या इनकार के यूँ प्यार हो जाना 
कभी होता था अपनी गुफ़्तगू का ढंग वो नादिर 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हमारे शेर छपते थे तुम्हारी बात छपती थी 
ना जाने किस जनम की किस वतन की बात कबकी थी 
अगर कुछ याद आए तो ज़हन मेरे उतर आना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हुआ अरसा ऍ मेरे दोस्त मिलने तो कभी आना 
मेरी बातें भी सुन लेना और अपनी भी सुना जाना 
अगर कोई बात ना आए ज़हन में तो ये कर लेना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

वो मल्लाह आज भी कहता है बाबू और कैसे हो 
हम उसको नोट देते तो कहते थे के पैसे दो 
हमें बैठा के कश्ती में यही वो काम करता था 
कभी इस पार को आना कभी उस पार को जाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

किसी को सीख देनी हो किसी से सीख लेनी हो 
किसी को दान देना हो किसी से भीख लेनी हो 
जो जैसा हो उसे वैसी ही सूरत अपनी दिखलाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना 

हर इक इंसान पौधे जान की क्या है यहाँ फितरत
बता जाते हैं अज़मत से हर इक शय की यहां कीमत 
यहीं नस्लों ने एक दूजे को जाना और पहचाना
कभी अखबार पढ़ लेना कभी अखबार हो जाना

Friday, August 30, 2024

ज़रा मुश्किल

Bahr: 1222 1222 1222 1222

ये सूरज आसमा में तो क़मर से रोज़ मिलता है  
मगर बादल जो आए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 

ये माना दिल में रहते हो मेरी साँसों में बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पे खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों में दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है

अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 



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ये सूरज रोज बे नागे चाँद को रोशन करता है  
मगर बादल आ जाए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 
ये माना दिल मे रहते हो मेरी साँसों मे बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पर खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 
दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों मे दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है
अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

Sunday, August 25, 2024

बाशिंदा

Bahr (1222 1222 1222 1222)

मुझे बेशक सराहो मत मगर इक बात कहने दो 
तुम्हारी क़ौम में यारों मुझे बाशिंदा रहने दो 

सभी को खोना है इक दिन आसमाँ के सितारों में 
अभी तुम ज़िंदा हो जैसे मुझे भी ज़िंदा रहने दो

शहर में पेड़ हरियाली किसे अब रास आते हैं  
मगर खुद पर तरस खाओ ख़ुदी को ज़िंदा रहने दो
[ख़ुदी = fear of God]

मुझे बचपन से जाने क्यूँ बोहोत उड़ने की आदत थी  
खयालातों की दुनिया है मुझे तुम रिंदाँ रहने दो 
[रिंदाँ = carefree]

सिपा सालार कहते हैं तेरी क़ुर्बानी लाज़िम है 
शहीदों में गिनाएंगे फ़लक पे झंडा रहने दो

ज़रा मुर्ग़ी कि मम्ता देख एक दिन मुझसे कहती है 
मुझे चाहो पका खा लो मगर ये अंडा रहने दो 

ना देखी जाएगी मुझसे दरिंदों की ये सौग़ातें 
मैं अंधा था मैं अंधा हूँ मुझे तुम अंधा रहने दो






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मुझे बेशक सराहो मत मगर कुछ बातें कहने दो 
मुझे इस क़ौम में यारों एक बाशिंदा रहने दो 

कहीं कुछ सीख ना लूँ इस लिए शर्मिंदा रहने दो 
मुझे इस क़ौम में यारों एक बाशिंदा रहने दो 

यहाँ के पेड़ हरियाली किसे अब रास आते हैं  
मेरे घर का एक पौधा मगर तुम ज़िंदा रहने दो 

मुझे मत दो बाग़ कोई आसमा भी छुपा लेना 
मगर एहसान ये करना बस एक बराम दा रहने दो 

ना देखी जाएगी मुझसे अब दरिंदों की सौग़ातें 
मैं अंधा था मैं अंधा हूँ मुझे तुम अंधा रहने दो 

मुझे बचपन से जाने क्यूँ बोहोत उड़ने की आदत थी  
ख़यालातों की दुनिया है मुझे परिंदा रहने दो 

सिपाह सालार कहते हैं तेरी क़ुर्बानी लाज़िम है 
शहीदों में गिनाएंगे हाथ में झंडा रहने दो

एक मुर्ग़ी की ममता देख एक दिन मुझसे कहती है 
गोश्त चाहो मेरा खा लो मगर ये अंडा रहने दो 

मुझे बेशक सराहो मत मगर कुछ बातें कहने दो 
मुझे इस क़ौम में यारों एक बाशिंदा रहने दो 

Friday, August 16, 2024

रब

Bahr" 
  • 1222
  • 1222
  • 1222
  • 1222

  • समझने की जो बातें थी उन्हें मैं बद समझ बैठा 
    जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 

    पहन कर मुस्कराहट सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
    मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहा ज़ो दब समझ बैठा 

    क्या मैं मासूम था या फिर ये मेरी बेवक़ूफ़ी थी 
    किसी का हाथ देखा तो उसे मैं हद समझ बैठा 

    यहाँ इंसान चूहों की तरह दौड़ाए जाते हैं 
    हर इक इंसान लालच में तलब से दौड़ने बैठा 

    उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
    के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

    वो माली का जो बेटा है बड़ा नादान बच्चा है 
    जिसे देखा बड़ी गाड़ी में बस साहब समझ बैठा

    यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
    बना कर के मशीनें खुद को इंसां रब समझ बैठा  

    बड़े नुस्खे नहीं थे ज़िन्दगी में कामयाबी के
    बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

    ======================================






    समझने की जो बातें थी उन्हें गलत समझ बैठा 
    जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 

    मुस्कराहट पेहेन कर सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
    मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहाज़ अदब समझ बैठा 

    क्या मैं मासूम था या फिर ये मेरी बेवक़ूफ़ी थी 
    किसी का हाथ देखा तो उसे मदद समझ बैठा 

    यहाँ इंसान चूहों की तरह दौड़ाए जाते हैं 
    हर इक इंसान लालच में दौड़ने को तलब बैठा 

    उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
    के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

    एक बेटा है माली का बड़ा नादान बच्चा है 
    गाड़ियों में जिन्हें देखा उन्हें साहब समझ बैठा 

    यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
    बना कर के मशीन इंसान खुद को  रब समझ बैठा 
     
    पूछते हैं लोग अक्सर कामयाबी के कुछ नुस्खे 
    बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...