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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Wednesday, January 31, 2024

खेल

ये खेल है सितारों का कहानी का किताबों का सवालों का जवाबों का पेचीदा पड़े हिसाबों का

ये खेल है रुबाबों का शख़्सीयति हिजाबों का अमीरों का नवाबों का ग़रीबों का गुनाहों का

ये खेल है सराबों का

सन्नाटों का आवाज़ों का शराबों का हयातों का रूहों का ख़राबों का

ये खेल है ख़यालों का कहानी के किरदारों का तन्हाई की शामों का जानों का जहानों का

ये खेल है तलाशों का अपनों का ख़ुदाओं का ग़ुज़ारिश का नियाज़ों का हैरत का हैरानों का

ये खेल है आकाशों का रस्तों का मीनारों का कांटों का गुलाबों का मैं का मैखानों का

ये खेल है ज़दाओं का हुस्नों का अदाओं का पर्दों का हयाओं का आग़ाज़-ओ-अंजामों का

ये खेल है हवाओं का सांसों का दुआओं का बिखरे पड़े तमाशों का ख़ामोशी-अल्फ़ाज़ों का

Saturday, January 27, 2024

रफ़्तारें

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ये रफ़्तारें 

न आँखों से न बातों से 
न मदहोशी की रातों से 
न खुशबू की अदाओं से 
ज़हन के पार गाहों से
याद करता है जब कामिल 
बता देती हैं रफ़्तारें 

ये रफ़्तारें, रग़ों में दौड़ जाती हैं रफ़्तारें 
कभी हौले, कभी हौले से बढ़ जाती हैं रफ़्तारें 

लहू में खेलती है झेलती है ज़िन्दगी को रेलती है 
क्या न करवाती हैं रफ़्तारें 
ये रफ़्तारें, धड़क जाती हैं रफ़्तारें 

कभी ये प्यार की शक्लों में आती है 
कभी डर से ये रंजों को जगाती है 
कभी ज़िंदा कभी है मौत की आहट में रफ़्तारें 

ये रफ़्तारें, कहीं ये खिलखिलाती हैं 
ये रफ़्तारें, कहीं ताक़त दिखाती हैं 
सिसकती हैं थका जाती हैं रफ़्तारें 

बता देती हैं रफ़्तारें 
याद करता है जब कामिल 
ज़हन के पार गाहों से
न खुशबू की अदाओं से 
न मदहोशी की रातों से 
न आँखों से न बातों से 

ये रफ़्तारें

Tuesday, January 23, 2024

प्यार

तेरी तस्वीर रख रख के नज़र से दूर करता हूँ 
बेवजह किसी बहाने से खुद को मजबूर करता हूँ 

मैं अक्सर वादा कर के ही दिल को मायूस करता हूँ
तेरी आदत न रही फिर भी तुझे महसूस करता हूँ 

याद बेशक तेरी मुझको दर्द बेइंतेहा देती 
याद कर कर के ज़ख्मों को लहू नासूर करता हूँ 

तेरी तक़दीर में शायद मैं नहीं और है कोई
तेरी इस बात को अब मैं दिल से  मंज़ूर करता हूँ 

तू मुझसे दूर है लेकिन तू मेरे दिल में बस्ती है 
इसलिए जानेमन तुझको प्यार भरपूर करता हूँ 


Saturday, January 20, 2024

तक़दीर

मैंने धड़कन से पूछा साँसों से पूछा 
रग में लहू की क़तारों से पूछा 
क्या तुम यहाँ बस रही हो 

तुम यहीं हो, यहीं हो, यहीं हो, यहीं हो 
सब ने कहा तुम यहीं हो 

मैंने गुलशन से पूछा सितारों से पूछा
परबत की ठंडी हवाओं से पूछा
तुम हो तस्सव्वुर में मेरे हमेशा
तस्वीर में क्यूँ नहीं हो

क्यूँ नहीं हो, नहीं हो, नहीं हो, नहीं तुम
तस्वीर में क्यूँ नहीं हो 

देखो ये कैसी मेरी बेबसी है 
कैसे मैं कह दूँ वो जो अनकही है 
तक़दीर में तुम नहीं हो 

मेरी तक़दीर में तुम नहीं हो नहीं हो 
तक़दीर में तुम नहीं हो 


Friday, January 19, 2024

कल-क़ता

मैं तो पीता हूँ आब जीने को 
और जीता हूँ शराब पीने को 
बोतलें जब मुझे पी लेती हैं 
शक्ल देता हूँ मैं नगीने को 

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कहता हूं लफ़्ज़ उसके, जिसने है डाली जान
दिल में आ जाती बातें, कह जाती है ये जुबां
कितना भी लिख, दीवारों पे, मिट जायेंगे ये निशान
मैं कम कहता हूं, लेकिन मेरी कुछ बातें तो मान

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कहते हैं बात अपनी हम अपनी इस क़ता से 
अक्सर सीखा है हमने ठोकर खाकर जहां से 
बैठे जब महफिलों में कहने को दिल की बातें 
वा-वाही लूटी हमने दर्दों की दास्ताँ से 

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आँखों से बोल देना दिल से कुछ सुन लेना
मेरे ख़यालातों से कुछ सपने बुन लेना 
लफ़्ज़ों की बंदिशों को अच्छी सी धुन देना 
दिल की धड़कन सुनते ही ये गीत चुन लेना 

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हाथों की रौशनी ने चेहरे को जगमगाया 
मैं सबको भूल बैठा तू मुझको याद आया 
वो सपना ही था शायद हाँ सपना ही था छाया 
तू सबको भूल बैठा मैं तुझको याद आया 

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Friday, January 12, 2024

कभी याद रखना कभी भूल जाना

समा वादियां दिल मुहब्बत फ़साना
ये बातें ज़रा तुम फिर आज़माना 
ज़रूरी नहीं है तुम्हारी परस्तिश 
कभी याद रखना कभी भूल जाना 

सितारों से लढ़ना बहारें लुटाना
अगर हार जाएँ निगाहें चुराना 
जो हारे हुए हों उन्हें भी जिताकर 
कभी याद रखना कभी भूल जाना 

वो दिन याद आते हैं जब ज़िन्दगी के 
वो लम्हे जिन्हें साथ रखना किसी के 
किसी बात पे बेवझा तिलमिलाना 
कभी याद रखना कभी भूल जाना 

जो कहता है दिल वो ज़ुबान बोलती है
है शायर का दिल कुछ कहाँ तोलती है
ज़रूरी नहीं इनको दिल से लगाना
कभी याद रखना कभी भूल जाना

Thursday, January 11, 2024

इन्सान

इन्सान... ज़ेहन से जो आवारा

ये खुद भी है कठपुतली

खुद इसे क्या पता


बेजान जिस्म में जो है जान

कहां से आती है

खुद इसे क्या पता


जाने क्या ढूंढता है दिल

किसकी ख्वाहिश में है शामिल

किन तलाशों में गुम है ये

खुद इसे क्या पता


ख़ुशी किसमें ये ढूंढे है

सुकूं किसको ये समझे है

कहीं मिलते भी हैं क्या ये

खुद इसे क्या पता


सांस आती और जाती है

जाने क्या कुछ करवाती है

जिंदगी किसको कहते हैं

खुद इसे क्या पता


ख़ुदा का नाम देता है

ख़ुदा का नाम लेता है

मगर खुद में क्या रखा है

ये इसे क्या पता

नज़र लग जाती है

नज़र से बच के ज़रा हां!! नज़र लग जाती है

कोई बेहद सी हुई बात

जब नज़र आती है


तेरे आग़ोश में आकार

और कुछ देर बहला कर

तुझको बेहोश कहला कर

वो सरक जाती है


नज़र से बच के ज़रा ...... 


कोई हमदम नहीं तो क्या

कोई मेहरम नहीं तो क्या

सांस ज़िंदा तुझे रखने 

तो चली आती है


नज़र से बच के ज़रा ...... 


कुछ यहां छुप नहीं सकता

तू छुपा कुछ नहीं सकता

मुश्क सौ तालों में तो क्या

वो महक जाती है

नज़र से बच के ज़रा ...... 


मैंने देखे हैं ऐसे दिल

लगते हमदर्द हैं क़ातिल

जो नज़र से लगा लें तो / (अक़्स गर देख ले उनकी)

नज़र लग जाती है - 3


नज़र से बच के ज़रा हां। … नज़र लग जाती है


ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...