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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Wednesday, February 12, 2025

दिन आ रहे हैं


क़रीबी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं

हवा मीठी मीठी गुलाबी गुलाबी
मुहब्बत जताने के दिन आ रहे हैं

अभी जिनको उड़ने की न हो इजाज़त
तो पर फड़ फड़ाने के दिन आ रहे हैं

लिखे शेर जो रात दिन जिनकी ख़ातिर
वो पढ़ने पढ़ाने के दिन आ रहे हैं

उन्हें जो सुना हो कभी गुनगुनाते
वो गाने बजाने के दिन आ रहे हैं

जो रूठे हुए हैं बिना बात के ही
उन्हें फिर मनाने के दिन आ रहे हैं

है ठंडी हवा धूप भी बढ़ रही है
कबूतर उड़ाने के दिन आ रहे हैं

कोई दोस्त हों या पडोसी तुम्हारे
सभी को जलाने के दिन आ रहे हैं

नज़र जो चुराते थे अब तक उन्हीं से
तो नज़रें मिलाने के दिन आ रहे हैं

कहीं तन्हा बैठे अकेले अकेले
यूँही बड़बड़ाने के दिन आ रहे हैं

कहीं कोई लैला न मिल जाए 'ज़ाहिर'
ये दाढ़ी बढ़ाने के दिन आ रहे हैं

Friday, February 7, 2025

तेरा ख़याल

जब कभी तेरा ख़याल आता है
जाने क्या दिल को हुआ जाता है

वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है
तू मेरे दिल में समा जाता है

ग़ैर लगती है ये दुनिया मुझ को
तू सगा दिल को नज़र आता है

धड़कनें रफ़्त हैं मेरे दिल की
मैं हूँ ज़िंदा ये यक़ीं आता है

इक दफ़ा मेरी तरफ़ भी देखो
क्या तेरा इसमें चला जाता है

Wednesday, January 8, 2025

आबशार

ग़म दिल में हूँ हवाओं के बे-क़रार में हूँ

या कहो जान तमन्ना मैं तेरे प्यार में हूँ


ये तिरा साथ जो मिल जाए तो शिफ़ा ही मिले

यूँ मचलकर के मैं उड़ने के इंतज़ार में हूँ

[शिफ़ा = रोग से मुक्ति]


है किसे फ़िक्र ज़माने की बात कौन सुने

तिरे होठों से ये कह दो मैं एतबार में हूँ

[एतबार = trust]


ये भवें तेरी नज़र तेरी तेरी चाल बला

है ख़ुदा पहले मगर मैं भी हुस्न कार में हूँ

[हुस्न कार = creator of the beauty]


ये तो 'ज़ाहिर' है के ज़िंदा हूँ आस पे ही तेरी

आजकल शामों सहर तेरे रोज़गार में हूँ


मैं तो तेरे ही पिघलते से इंतज़ार में हूँ

ले मुझे जीत मुसलसल मैं अपनी हार में हूँ


है मुझे तिश्नगी क्या जाने किस जनम की जज़ा

के जनम ले के तिरे बार-ओ-आबशार में हूँ

[तिश्नगी = तपन, जज़ा = बदला, बार = rain, आबशार = झरना]

Saturday, December 14, 2024

क़ातिल

तेरी अदीम निगाहों ने बे पनाह किया
बिना किये मुझे आगाह ही तबाह किया
ये किस तरह कि है उल्फत के मेरी फ़िक्र नहीं
न कैद ही किया मुझको न ही रियाह किया
[अदीम = Unique, आगाह = Warn, रियाह = Set free]

शराब रात कि बूंदों से बारहाती रही
तो जाम ने भी उसे मन्ज़रे गुलाब किया
[बारहाती = Again and Again = Multiple Occurrence]

न गिन सका है कोई भी दिए ये ज़ख्म तेरे
न जाने कितनों ने आकर यही हिसाब किया

ये तार तार से दिल में जो साँस बच के रही
उसे भी हैरते 'ज़ाहिर' ने है मज़ार किया

ये क्या मज़ाह किया है नसीब ने मुझसे
के मैंने अपने ही क़ातिल से रस्मो राह किया
[मज़ाह = Joke, रस्मो राह = Contact/Relation]

Tuesday, December 10, 2024

इंतज़ार

प्यार करते हैं उन्हें ऐसे प्यार करते हैं
प्यार के वास्ते ही रोज़ गार करते हैं
उनसे क्या मिलना जो खाबों से हैं बसे दिल तक
हम कहाँ उनका कभी इंतज़ार करते हैं

दोस्त वो है जो संभाले किसी को राहों में
जो सँभलते नहीं हम उनको यार करते हैं

हम तो वो हैं के जहाँ बैठ जाएँ जन्नत है
आप जन्नत का भी क्या एतबार करते हैं

जो रकम दे नहीं सकते हैं सारी दुनिया को
वो तो बस लफ़्ज़ का ही कारोबार करते हैं

जो बताते नहीं हैं प्यार कितना है तुमसे 
वो ही तो प्यार तुम्हें बेशुमार करते हैं

करते 'ज़ाहिर' जो हमें तो क़रार मिल जाता 
कुछ न कहके वो हमें बेक़रार करते हैं 

Thursday, December 5, 2024

हद करते हो

Bahr: 22-22-22-22

मेरी बातें ज़द करते हो 
अपनी तो लज़्ज़त करते हो 
कैसे मानोगे के तुम तो 
हद करते हो हद करते हो

देखो अब हम घर आये हैं
दिन काला हम कर आये हैं
अंगड़ाई तुम क्यूँ भरते हो
हद करते हो हद करते हो

मेहताबी है आँखें तेरी
दानाई हैं बातें मेरी
रोशन रातें गुम करते हो
हद करते हो हद करते हो

तौबा हमने की है दिल से
धड़कन थामी है मुश्किल से
क्यूँ धड़कन गड़बड़ करते हो
हद करते हो हद करते हो

मंज़िल जो थी अब रस्ता है
अब जब सब लगता सस्ता है
अब किस मंज़िल से डरते हो
हद करते हो हद करते हो

'ज़ाहिर' चाहत जब है दिल में
बैठे हो तुम किस मुश्किल में
हद की बातें क्यूँ करते हो
हद करते हो हद करते हो

जब भी ग़ज़लें पढ़ता हूँ मैं
या कह लो के मढ़ता हूँ मैं 
वावाही का दम भरते हो 
हद करते हो हद करते हो

Friday, August 30, 2024

ज़रा मुश्किल

Bahr: 1222 1222 1222 1222

ये सूरज आसमा में तो क़मर से रोज़ मिलता है  
मगर बादल जो आए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 

ये माना दिल में रहते हो मेरी साँसों में बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पे खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों में दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है

अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 



===================


ये सूरज रोज बे नागे चाँद को रोशन करता है  
मगर बादल आ जाए तो ज़रा मुश्किल सी होती है 
ये माना दिल मे रहते हो मेरी साँसों मे बहते हो 
मगर देखे बिना तुझको ज़रा मुश्किल सी होती है 

सुनो बाग़ों की कलियों को उन्ही पौधों पर खिलने दो
गिरी कलियाँ खिलाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 
दिवाली के चराग़ों को बिना भूले जला लेना 
अँधेरों मे दिवाली हो ज़रा मुश्किल सी होती है 

तुझे कैसे बताऊँ तुम मेरे कुछ भी नहीं लगते 
मुझे ये बात कहने में ज़रा मुश्किल सी होती है
अगर हम भूल जाते तो बोहोत आसान हो जाता  
मगर ये भूल जाने में ज़रा मुश्किल सी होती है 

Monday, July 22, 2024

बेदम

हम तो हुए नहीं थे तुमसे ख़फ़ा कभी 
किस बात का लगा है मजमा यहाँ अभी 
हम आज भी वही हैं ख़ामोश दिल की सुन 
आवाज़ आ रही है दिल से दबी दबी 

पेहचान तुझसे कोई माना कभी न थी 
लगते हो फिर भी मेरे मेहरम कभी कभी 
खुशबू को तो नवाज़िश तुमसे न मिल सकी
आएगी पास तेरे फिर भी कभी कभी 

हर साँस में बिठाकर जीते हैं तुझको हम 
रखते हो तुम भी हमको बेदम कभी कभी 
नज़रें नहीं मिलाकर बेचैन करते हो 
नज़रें मिला के कर दो बे ग़म कभी कभी 

Wednesday, July 17, 2024

बिजली

आज फिर बारिश हुई 
फिर भी हम रोए नहीं 
रात भर बिजली गिरी 
और हम सोए नहीं 

करवटों से सिलवटें 
रात भर बढ़ती रही 
फैसलों के वास्ते 
हम कहीं खोए नहीं 

ये भी कैसी बात है जो 
लफ़्ज़ में ढलती नहीं 
अपने दामन मुह छुपाकर 
कबसे हम रोए नहीं 

ये भी सच है इस में तेरी 
और मेरी गलती नहीं 
रात भर बिजली गिरी 
और हम सोए नहीं 

आज फिर बारिश हुई 
फिर भी हम रोए नहीं 
रात भर बिजली गिरी 
और हम सोए नहीं 

Saturday, July 13, 2024

ख़ुश्बू (नज़्म)

रात की बात अंधेरों में फैल जाती है 
धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है 
इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर 
तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिलने आती है 

तेरी ख़ुश्बू में जाने क्या बात ऐसी रही 
के वो अशरों के बाद भी ज़हन से जाती नहीं 
अब तो आदत ही हो गई है और मेरे लिए 
तुझे महसूस करना कोई बड़ी बात नहीं 

किसके मानिंद है ख़ुश्बू तेरी मैं कैसे कहूँ 
के कोई इत्र कोई फूल ऐसा मिल न सका 
मुस्कराहट तेरे जैसी किसी को मिल ना सकी
और दुनिया में कोई तेरे जैसा खिल न सका 

Monday, June 10, 2024

बात नाज़ुक है

बात नाज़ुक है ज़रा हौले से 
फिर कभी हम तुझे बता देंगे 
आज रहने दो बात इतनी ही 
दाग़ हम फिर कभी दिखा देंगे 

रास्ते फूल के बना डाले 
ये तो मुमकिन नहीं किसी के लिए 
कोई पत्थर मगर जो बन आए 
रास्तों से उसे हटा देंगे 

खोज लोगों को खुदा की है यहाँ 
क्यूँ भटकते हैं मुझे इल्म नहीं 
कोई पूछे अगर खुदा का पता 
तो तेरा घर उसे दिखा देंगे 

उनको इस बात का बड़ा ग़म है 
के जाताना हमें नहीं आता 
वक़्त आएगा एक दिन उनको 
प्यार कर के ही हम बता देंगे

Tuesday, June 4, 2024

बस इक दफ़ा

बस इक दफ़ा तुझे मिलने की मोहलत ही चाहिए 
फिर मुझे कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

आँख भर देख के भर जाए दिल तो क्या ही बात हो 
तेरे होंटों के लरज़िशों सी बेबसी भी चाहिए 
फिर मुझे कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

फूल इठलाना सीख जाएँ तेरी चाल देख कर 
तेरे सबक़ के साथ इनको नसीहत भी चाहिए 
फिर इन्हें कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

बात तस्वीर से बन जाती तो इतना बुरा न था 
मेरी दुनिया को तेरे दिल की मुहब्बत भी चाहिए 
फिर मुझे कुछ भी, नहीं कुछ भी ज़िंदगी से चाहिए 
बस इक दफ़ा, इक दफ़ा, बस इक दफ़ा

Wednesday, May 29, 2024

अब चलो जाओ

जब भी मिलते हो तो कहते हो 'अब चलो जाओ'
इतना आसां नहीं ये बात फिर ना दोहराओ  
हम समझते हैं के हम कुछ भी समझते ही नहीं 
और ये चाहत है के ये बात तुम समझ जाओ 

इस गली भूल कर आना भी अब नहीं होता 
आँख पथरा गई हैं अब तो कुछ तरस खाओ 
बात ये है के अगर अब कोई बहाना भी नहीं 
ये बता कर के मेरी आँख नम ही कर जाओ 

Friday, April 26, 2024

ज़माने

ऐसा क्या देखा मेरी आँखों में 
के बस ही गए हो निगाहों में 
भला किसने तुमको बताया है  
के चाँद तारे हैं मेरी आँखों में 

बन के दरिया मैं जिसमें मिल जाऊँ 
वो समंदर है तेरी आँखों में 
माना घाटे का मेरा सौदा है 
पर मुनाफ़ा है तेरी आँखों में 

देखते हो जो एक टक तो बता 
ख्वाब कितने हैं मेरी आँखों में 
डर मुझे है के आँख सच ना कहे 
राज़ रहते हैं मेरी आँखों में 

ये जहां देख लिया देख लिया 
कोई जचता नहीं है आँखों में 
हर एक पल नया ज़माना है 
तुम ज़माने हो मेरी आँखों में 

||||| FEMALE
||||| MALE

रूठना तेरा

इस तरह से लूटना तेरा 
दिल को छू जाए रूठना तेरा 
याद रह जाए यूँ मनाने पर
प्यार करने पे टूटना तेरा 

जो सज़ा चाहो वो सज़ा दे दो 
मुझको मंजूर कूटना तेरा 
बेरुखी मुझको करती है मायूस 
अब जरूरी है फूटना तेरा 

दूर जाने की सोचना भी नहीं 
सह न पाऊँगा छूटना तेरा 
सह न पाऊँगा छूटना तेरा 
सह न पाऊँगा छूटना तेरा 

Sunday, April 14, 2024

तुम क्या कर रही हो अभी

तुम क्या कर रही हो अभी 
पूछो मुझसे तो कभी 
तुम क्या कर रही हो अभी 
बस यूँही बात कर लो कभी 

क्या तूने मुझको याद किया 
या फिर तू मुझको भूल गया 
क्यूँ लगता है मन को ये पिया  
तू खुद पूछेगा नहीं ... के 

तुम क्या कर रही हो अभी 
बस यूँही बात कर लो कभी 

सारा दिन कैसे निकलेगा 
दिल ख़ाब ये तेरे देखेगा 
तेरा पैग़ाम ये आएगा 
पूछेगा फिर तू यही ... के 

तुम क्या कर रही हो अभी 
पूछो मुझसे तो कभी 

अच्छा लगता है पूछते हो 
मुझको यूँ समझते बूझते हो 
दिल की बातें तुम जानते हो 
मेरे हमदम हो तभी 

बस यूँही बात कर लो कभी 
तुम क्या कर रही हो अभी 
पूछो ना फिर से अभी
तुम क्या कर रही हो अभी 

Tuesday, April 9, 2024

सदा

देखा जो उन्हें बाग़ में महसूस ये हुआ 
रंगीन था ये बाग़ महकता कभी न था 
सूरत तो उनकी दूर तक मशहूर थी मगर 
चेहरे से पहले हुस्न टपकता कभी न था 
[बाग़ = garden], [हुस्न = beauty]

नज़रों से देखते तो थे, इस बार बात की 
आँखों में पहले आब चमकता कभी न था 
पहले तमीज़ तीर की होती थी कुछ अलग 
करता था दिल पे चोट, गुज़रता कभी न था 
[आब = water]

दिल होश में रहता था शराबों के शहर में 
कितने भी जाम हों ये बहकता कभी न था 
दिल की रग़ों में जोश था लेकिन ये इस क़दर 
पैग़ाम देखने को तड़पता कभी न था 
[जाम = peg], [रग = veins], [पैग़ाम = messege]

देखी है क़ायनात में क़यामत से ज़ीनातें 
दो पल भी देखने को ठहरता कभी न था 
उनकी सदा सुनी है जबसे दिल को यूँ लगा 
दिल काम तो करता था धड़कता कभी न था 
[क़ायनात = universe], [क़यामत = doom day]

Friday, March 22, 2024

लाचारी

गुफ़्तगू में तेरी बारी मेरी बारी से कम है क्या 
मैं जैसे जी रहा हूँ ये कलाकारी से कम है क्या 
न मतलब पूछ तू मुझसे बे वझा क्यों झगड़ते हो 
दिलों के बीच की बातें रिश्तेदारी से कम है क्या 

मेरा क़ातिल मेरे ही घर खून मेरा कर रहा हो 
मेरा ये फिर भी चुप रहना वफ़ादारी से कम है क्या 

किसी भी बात में लफ़्ज़ों का होना तो मुनासिब है 
बिना लफ़्ज़ों के फ़रमाना समझदारी से कम है क्या 

ज़रा देखूं तो पर्दों से ज़रा हट के तुझे भी मैं 
तेरे आँखों की मुस्कानें अदाकारी से कम हैं क्या 

वो कहते हैं नहीं रहते हैं पर्दों में कभी लेकिन 
निगाहों पे पड़ी ज़ुल्फ़ें पर्देदारी से कम है क्या 

न पूछो क्या हुआ है मर्ज़ हमको क्या अलालत है 
तेरी ही धुन में फिरते हैं ये बीमारी से कम है क्या 

फ़िज़ाओं में तेरी खुशबू ज़हन में तुम ही रहते हो 
अकेला दिल धड़कता है ये लाचारी से कम है क्या 

Tuesday, March 12, 2024

रुहदारी

तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

कितना भी समझाओ इसको मक्कारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

हफ़्तों से मिलने की देखो तैयारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

कभी दिन में हो कभी रात हो 
बेवक़्त ही कोई बात हो 
दिल धक् धक् कर के कितनी होशियारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

तुम आओगे छा जाओगे 
या ऐसे ही चले जाओगे 
तेरे इरादों से मुझको जुआरी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

अजी आओ तो फ़रमाओ तो 
हमसे बातें बतलाओ तो 
तेरा ये मजनू बातें बड़ी प्यारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

Monday, March 11, 2024

शायर के ख़्वाब

फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से 
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से 

दिन रात आप की ही बात सोचते हैं हम 
शुरुआत कैसे की थी हमने एहतराम से 

काग़ज़ पे चार हर्फ़ ही क्या लिख दिए मैंने 
साँसे तेरी रुक सी गई मेरे कलाम से 

तेरा घडी-घडी घडी की ओर देखना 
और याद है बिगड़ना तेरा मेरे नाम से 

हमको भी याद हैं वो तेरे ख़ास बहाने 
कुछ काम ज़रूरी से ज़रूरी थे शाम से 

हंसना तेरा रोना तेरा कनखी से देखना 
और कहना ये के काम रखिये अपने काम से 

वो वक़्त तो यादों की शक्ल याद रहेंगे 
वो दिन नहीं आने अभी कितने भी दाम से 

फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से 
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...