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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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Tuesday, February 11, 2025

कोई पागल समझता है

असली शायर: कुमार विश्वास 

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
कोई ठोकर से है मुझको हुआ घायल समझता है
मैं घायल जानता हूँ हूँ मैं दीवाना मैं पागल हूँ
मगर दीवाने की हालत तो बस पागल समझता है

ये लड्डू है बना घी से तभी ये टेढ़ा मेढ़ा है
मगर तू हाय क्यों जाने इसे मगदल समझता है

कहाँ किस रासते आती है जाड़ों में किनारों से 
हवा घुसती कहाँ से है तेरा कंबल समझता है

कभी दिल्ली का बाशिंदा चला जाता है गर ऊटी
तमिल नाडू को बेचारा हरा केरल समझता है

मेरे बाबा जो कहते थे वो सहगल और है कोई 
मेरा बेटा किसी रैपर को ही सहगल समझता है

दिखाकर और सिखाकर भी किसी को कुछ नहीं समझा 
मगर 'ज़ाहिर' तो आँखों के हर इक सिग्नल समझता है

कभी भी छोड़ना मत अपनी माँ का पाक सा पल्लू
ये तेरा आसमाँ है जिसको तू आँचल समझता है
(आस माँ की आसमाँ है जिसे आँचल समझता है )

Saturday, February 1, 2025

इज़्ज़त

इस दुनिया में सबको अपनी कुछ बात सुनानी होती है 

रस्ते की कहानी है तो कहीं मंज़िल की निशानी होती है 

बाज़ारी हो चेहरे की चमक या हो हाथों में फ़ोन नया 

आपा धापी की दुनिया में औक़ात दिखानी होती है 


है क़र्ज़ सभी के माथे पर तो फ़र्ज़ कोई क्या पालेगा 

अपने काँधे पर ख़ुद अपनी ही लाश उठानी होती है 


शहरों की गर्दी में अपने अंदर क्या खून बचाओगे 

जीवन की गाड़ी भी अब तो पानी से चलानी होती है 

[गर्दी = revolution/क्रांति]


दुनिया वाले इक दूजे की दुनिया तो उजाड़े देते हैं 

और फिर अपनी उजड़ी दुनिया ख़ुद को ही बसानी होती है 


ये उम्र तमाशा है इसमें बचपन से है बूढ़ा होना 

देखे दुनिया जिस मंज़र को अक्सर वो जवानी होती है 


ये प्यार भी क्या है बला भला कैसी यादें दे जाता है 

दिल पर जो दाग़ रहे वो ही दिलबर की निशानी होती है 


होता ही नहीं है शहरों में तो वक़्त कहाँ से लाओगे 

ख़ुद से ही 'ज़ाहिर' ख़ुद को ही आवाज़ लगानी होती है 


इज़्ज़त की बातें रहने दो अब नहीं ज़माना इज़्ज़त का 

बोहतों को कार गुज़ारिश में इज़्ज़त ही गवानी होती है 

[कार गुज़ारिश = request for work]

Thursday, January 9, 2025

तोता

ये जो होता है, जो भी होता है 
कोई हँसता है, कोई रोता है 
सब सिखाया है, सब पढ़ाया है  
मैं भी तोता हूँ, तू भी तोता है 

झूठ सूरज है झूठ तारे हैं 
झूठ मौसम के सब इशारे हैं 
झूठ है के तुम भी इन्हीं से हो 
झूठ ये भी के ये तुम्हारे हैं 
 
वक़्त धोखा है जिसमे जीते हो 
वक़्त धोखा है जिसमे मरते हो 
सच नहीं है ये इस घड़ी में भी 
मैं जो कहता हूँ तुम जो सुनते हो 

कौन कहता है मर गया हूँ मैं 
कौन कहता है खाली पन है अब 
ये तो 'ज़ाहिर' है कुछ नहीं बदला 
काम पे जा ही तो रहे हैं सब 

Tuesday, December 3, 2024

पुराना

Bahr: 1222-1222-122


मेरा कहना अभी खलता नहीं है
कोई मुझसे यहां जलता नहीं है
किसी से कल कोई ये कह रहा था
पुराना नोट अब चलता नहीं है

ये किन राहों पे है निकला ज़माना
के सूरज शाम को ढलता नहीं है

ये कैसा आदमी बेदर्द है के
लगी है चोट पर मलता नहीं है

पुराना ही तो कहलायेगा मुझसा
हवा के साथ जो चलता नहीं है

मगर अब तक नहीं बदला वो ये के
कभी दिन मौत का टलता नहीं है

दफ़न होकर जिसम पिघला तो है पर
न जाने क्यूँ ये दिल गलता नहीं है

Saturday, November 30, 2024

बात इतनी सी है

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

क्या मुनासिब है क्या है रवायत यहाँ 
पीढ़ी दर पीढ़ियों तक जो कहता रहा 
पर मुनासिब था तब जो ये किसको पता था 
मुनासिब रहेगा हमेशा यहाँ 
बात इतनी सी है 

है मेरी नाक तुझसी मेरी आँख तुझसी 
मेरे हाथ तुझसे मेरी भूख तुझसी 
धरम और मज़हब ने कब तुझसे मुझको 
अलग था बताया ज़रा ये बता 
बात इतनी सी है 

चाँद सूरज सितारे या फिर आसमां 
ज़िन्दगी सबको देते हैं इक सी यहाँ  
कुइ पंछी कभी भी किसी और पंछी 
को कहता नहीं मैं यहाँ तू वहाँ 
बात इतनी सी है 

जीभ पे ज़ायक़ा तो सभी का है इक सा 
नमक कोई मीठा तो कहता नहीं 
ये दिल चाहे कितनी करे ऐहतरामी 
मगर बे लिहाज़ी भी सेहता नहीं 
बात इतनी सी है 

तू सच है तो सच ये भी है के कोई 
झूठ की डोर को है संभाले हुए 
अगर झूठ ही न हुआ करता तो क्या तू 
दीखता कभी दिल जलाते हुए 
बात इतनी सी है 

बात कहने न सुनने समझने की है 
बात ये बात में न उलझने की है 
बात की बात के तेरी धड़कन को मैं 
सुन सकूं मेरी धड़कन को तू सुन सके 
बात इतनी सी है 

Sunday, November 17, 2024

खुदकुशी

Bahr:
  • 1222
  • 1222
  • 122

  • ये किसने खुदकुशी की बात कह दी  
    जो ज़िम्मेदारियों से डर चुका है ?
    वो बातें बे वजह दोहरा रहा है 
    जो करना है उसे वो कर चुका है 

    नहीं है जड़ से कोई रब्त उसका 
    वो अपनी शाख़ से ही झर चुका है 
    ज़रूरत अब नहीं उसकी किसीको 
    वो पीला पड़ गया है सड़ चुका है 

    नहीं है पीठ में उसके भी हड्डी 
    तभी उसका यहाँ पे सर झुका है 
    तड़पता है वो साँसों के लिए तो 
    उसे कह दे कोई वो मर चुका है 

    Friday, November 15, 2024

    बदलते बदलते

    Bahr: 
  • 122
  • 122
  • 122
  • 122

  • समझते हैं हम सब जिसे एक सूरज 
    सितारे हैं वो बारी बारी चमकते 
    हर इक दिन नया इक सितारा फलक पे 
    कहाता है सूरज सरकते सरकते 

    मेरी नज़्र से उनको शिकवे बड़े हैं 
    तुम्हें तो कदर ही नहीं है मेरी अब 
    ये साड़ी ये झुमके ये काजल तो देखो 
    वो कहती है मुझसे सवरते सवरते 

    मेरे बाग़ का फूल इक दिन खिला था 
    बड़ा खूबसूरत बड़ा आब ओ ताबी 
    वो खुशबू से महका रहा था ये दुनिया 
    हवा में समाया बिखरते बिखरते 

    गुबारों की बस्ती संभाले हुए था 
    संभाले थे उसने सभी अपने रिश्ते 
    मगर एक दिन ऐसा फूटा वो बादल 
    बरस ही गया वो संभलते संभलते 

    ना जाने ये किस दिन का बदला है तेरा 
    परस्ती तेरी की अक़ीदत की खातिर 
    मैं जैसा था अब तो मैं वैसा नहीं हूँ 
    बदल ही गया हूँ बदलते बदलते
    [परस्ती = Worship,अक़ीदत = Attachment ]

    Wednesday, October 23, 2024

    इजाज़त

    Behr (1222 1222 122)

    इजाज़त हो ज़रा जी कर के देखूं 
    अदा अपनी पुरानी कर के देखूं 
    हैं दिलकश तेरी नज़रों के नज़ारे 
    ये दिल चाहे तुझे जी भर के देखूं 

    न जाने क्या हुआ मेरी नज़र को 
    तेरे ये होंट गुल अख़्तर के देखूं 
    [गुल अख्तर = Bright ornamental flower]

    तेरी उल्फ़त बड़ी या मेरी उल्फ़त 
    मैं तुझसे इक दफ़ा लड़ कर के देखूं 
    [उलफ़त = affection]

    न मिल पाया ख़ुदा तो सोचा मैंने 
    ख़ुद अपना ही ख़ुदा बन कर के देखूँ 

    तिरे ज़ख़्मों को रखा है संभाले 
    कहीं तू डर ना जाए डर के देखूं 

    अँधेरा मन में हो रखा है कब से 
    जला के ख़ाब उजाला कर के देखूं 

    करो तजरी के आफ़त हर जघा है 
    कहो दुनिया के देखूं घर के देखूं 
    [तजरी = prioritization]

    परस्तिश की अहम की कुछ ना पाया 
    ज़रा ख़ुद से जुदा हो कर के देखूं 
    [परस्तिश = worship]

    धरम मज़हब की बातें एक सी हैं 
    जनेऊं ताविज़ों में भर कि देखूँ 

    कहाँ जन्नत कहाँ दोज़ख़ खड़े हैं 
    यक़ी करने को मैं भी मर के देखूं 
    [जन्नत = heaven, दोज़ख़ = hell]

    Wednesday, October 16, 2024

    साहब

    Behr (2122 1122 1122 22)

    सोचना जब भी क़दम कोई उठाना साहब
    लौट के आता नहीं गुज़रा ज़माना साहब

    फिर न पूछो के पता मेरा नहीं है कोई 
    भूलने दो ना मुझे मेरा ठिकाना साहब 

    कुछ मिला ही नहीं खाबों में उन्हें पाने से
    अब तो बेहतर है उन्हें भूल ही जाना साहब

    कुछ तो नग़मे हैं के जिनमें हैं सुहानी यादें
    फिर चला देना मिरा गाना पुराना साहब

    खुद मिली हो जो सज़ा याद कहाँ आती है
    भूल जाता हूं ज़रा मुझको डराना साहब 

    हैं निगाहें भरी महफ़िल में वजाहत पर ही
    आप साहब हैं सभी ने ये कहा ना साहब

    दो निवाले थे हमारी भी निगाहों में कभी 
    पर अब अच्छा नहीं लगता है ये खाना साहब

    मुझको आगे नहीं ला सकते हो तो मत लाना
    कम से कम पीछे तो मुझको ना गिराना साहब
     
    चोट लग सकती है शायर को ज़रा हौले से
    इतना आसाँ नहीं कोई वज़्न गिराना साहब

    Wednesday, October 9, 2024

    माँ

    Behr (2122 1212 22)

    ममता 
    ====
    पूछता था किसी से कल कोई 
    क्या है आखिर ये मेहरबाँ होना 
    दिल ने तस्वीर ये तसव्वुर की
    माँ के पल्लू का आसमाँ होना 

    पूजा 
    ===
    गर इबादत का है तरीक़ा के
    रूह को खुद है राब्ता होना 
    क्यों है दरकार फिर इबादत में
    बेग़रज़ कोई दरमियाँ होना

    सच्चाई 
    ====
    बात झूठी तो अच्छी लगती है
    तुम को मंज़ूर था गुमाँ होना
    बात क्या मैंने एक सच कह दी
    लाज़मी था तेरा जुदा होना

    प्यार
    ===
    प्यार की गुफ़्तगू में है मुमकिन 
    चंद लफ़्ज़ों का पास ना होना 
    उनसे मिलने के ऐन मौक़े पर 
    खुद जुबां का ही बेज़ुबाँ होना 
     
    सियासत 
    ======
    मुल्क बनते हैं जो बिगड़ने से 
    उनका बेहतर है ख़ात्मा होना 
    क्या ये सोचा भी है कभी तुमने 
    कैसा लगता है बे मकाँ होना 

    नसीहत 
    =====
    जाओ एक बार आइना देखो 
    छोड़ दो खुद से बे इमां होना 
    कैसे मंज़ूर है तुझे ऐसे 
    दौड़ते खून का थमा होना 
     
    ध्यान
    ====
    एक ज़रिया है ध्यान का ये भी  
    जिस्म से इस तरह जुदा होना 
    डूबना है तुझे ख़यालों में 
    जैसे शायर का गुमशुदा होना

    Monday, October 7, 2024

    झूठा नहीं है

    Behr (1222 1222 1222 122)

    ग़ज़ल कहता हुआ शायर अभी फूटा नहीं है 
    है उसका दिल अभी मायूस वो टूटा नहीं है 
    समझना है नहीं आसां उसे मैं जानता हूँ 
    वो उलटी बात कहता है मगर झूठा नहीं है 

    उधेड़ो मत मेरे रिश्तों की गांठें इस क़दर तुम 
    मेरी मानो अभी इतना भी वो छूटा नहीं है 
    मुझे लगता नहीं वाजिब उसे तोहमत लगाना 
    मैं खुद ही लुट गया उसने मुझे लूटा नहीं है 

    ये सच है के मुझे मुमकिन नहीं मंज़ूर करना 
    किसी में भी यहाँ इतना तो बल बूता नहीं है 
    जो मैं मंज़ूर ना हूँ तो भी मुझको देख लेना 
    फ़क़त शादाब की खातिर ये अंगूठा नहीं है 

    उखड़ तो वो भी जाएगा किसी दिन ज़लज़ले में 
    रहा हो ता उमर ऐसा कोई खूंटा नहीं है 
    ये दुनिया झूठ है जैसे कोई सपना सुहाना 
    यहाँ कुछ सच नहीं है और कुछ सच्चा नहीं है 

    वो गुड्डी आसमानों में ही उड़ना चाहती है 
    परेतों में मगर उसके अभी सूता नहीं है 
    मिलेगी इंतहा ए लल्कारें उसको इस जहाँ में 
    मगर अच्छा है के उस से जहाँ रूठा नहीं है 

    ये नज़रें खैंचते हो क्या ये लहज़ा लाज़मी है 
    कोई सोचो तेरी महफ़िल में क्यूँ आता नहीं हैं 
    तसव्वुर खाब की बातें तुम्ही क्या जानते हो 
    उन्हें भी खाब आते हैं जिन्हें दिखता नहीं हैं 

    Wednesday, September 25, 2024

    काफ़िर

    जो तपन में से जल के कुंदनों सा आता है 
    दास्तानों में अपनी सरकशी सुनाता है
    व हि तो है इक शाइर का ज़खीरा हम तो बस 
    मिसरे कुछ लिखे खुद हि खुद से आशिकी कर ली


    ======

    शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
    गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
    मुझे भी तजरुबा करना था ज़ीस्त का मैंने 
    बड़ों के तालिमात-ओ-दर से ज़िन्दगी कर ली 

    खाब कल रात खेलता था राज़दारी मैं 
    छुपा के बात को रखना था वरना मेरी शह 
    और मुझे राज़ छुपाना भी नहीं आता था 
    तो ज़ुबान अपनी काट के ही बे-बसी कर ली 
    शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
    गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
     
    कोई तशख़ीस करे खुद की क्या मज़ाक़ है ये 
    हमने सुन रखा है इफ़रात दर्दनाक है ये 
    हमें ना जुर्म दिखा ना ही कोई खुद गरजी 
    हमने हर एक ग़म के घर की तलाशी कर ली 
    शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
    गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
     
    जो तजरुबों की तपन में से जल के आता है 
    बहर ग़ज़ल में अपनी सर कशी सुनाता है 
    वो ही शायर है असलियत में देख लो हम तो 
    दो एक शेर लिखे खुद से आशिक़ी कर ली 
    शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
    गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

    वो नसीहत भरे कलाम पढ़ा करता था 
    वो किसी से भी नहीं बस ख़ुदा से डरता था 
    जब उसे इल्म-ओ-नसीहत की बूझ आई तो 
    एक काफ़िर ने कलामों से बेरुखी कर ली 
    शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
    गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

    तो क्या हुआ जो हम ना हो सके किसी काबिल 
    तो क्या हुआ जो मिला है हमें ये मुस्तकबिल 
    ग़मों को मिल ना सका ग़म भरा माहौल यहाँ 
    तभी ग़मों ने सजाकर हमें खुशी कर ली 
    शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
    गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

    Wednesday, September 18, 2024

    फ़रेबी

    वो मेरा दिल से हो न पाया कभी 
    दाग़ मैं दिल के धो न पाया कभी 
    चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
    मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

    क्योंकि खुशियां भी सलामत न रहीं
    मुझको खुशियों की भी आदत न रही
    मेरे दुश्मन भी जानते हैं मैं
    अपनी ख़ुशियों में खो ना पाया कभी
    चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो
    मैं किसी का भी हो ना पाया कभी

    मैं आदमी के जिस्म में हूँ बसा 
    मुझको लोगों ने... जब जब है डँसा  
    अश्क़ भी मेरे फ़रेबी निकले 
    रोना चाहा तो रो ना पाया कभी 
    चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
    मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

    हैसियत मेरी किस मिसाल की है 
    दर असल बात ये वबाल की है 
    खुद परस्ती की ऐसी दुनिया में 
    फ़ैसला मेरा हो ना पाया कभी 
    चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
    मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

    आज ग़मगीन सा है घर मेरा
    सबने देखा तो है सफ़र मेरा
    मैंने लूटे थे चैन लोगों के 
    चैन से मैं भी सो न पाया कभी 
    चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो
    मैं किसी का भी हो ना पाया कभी

    Saturday, September 14, 2024

    अख़बार

    असली शायर: अदा जाफ़री 

    तिरे छत की मिरी छत से नज़र दो चार हो जाना 
    बिना इज़हार या इनकार के यूँ प्यार हो जाना 
    कभी होता था अपनी गुफ़्तगू का ढंग वो नादिर 
    कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

    हमारे शेर छपते थे तुम्हारी बात छपती थी 
    ना जाने किस जनम की किस वतन की बात कबकी थी 
    अगर कुछ याद आए तो ज़हन मेरे उतर आना 
    कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

    हुआ अरसा ऍ मेरे दोस्त मिलने तो कभी आना 
    मेरी बातें भी सुन लेना और अपनी भी सुना जाना 
    अगर कोई बात ना आए ज़हन में तो ये कर लेना 
    कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

    वो मल्लाह आज भी कहता है बाबू और कैसे हो 
    हम उसको नोट देते तो कहते थे के पैसे दो 
    हमें बैठा के कश्ती में यही वो काम करता था 
    कभी इस पार को आना कभी उस पार को जाना 
    कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

    किसी को सीख देनी हो किसी से सीख लेनी हो 
    किसी को दान देना हो किसी से भीख लेनी हो 
    जो जैसा हो उसे वैसी ही सूरत अपनी दिखलाना 
    कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना 

    हर इक इंसान पौधे जान की क्या है यहाँ फितरत
    बता जाते हैं अज़मत से हर इक शय की यहां कीमत 
    यहीं नस्लों ने एक दूजे को जाना और पहचाना
    कभी अखबार पढ़ लेना कभी अखबार हो जाना

    Friday, September 13, 2024

    पत्थर

    Behr (2122 121 222)

    After learning Behr Grammar

    लख्त-ए-खूँ है ये रेत कर देखो 
    कैफ़ियत है समेट कर देखो
    लाल रंग का है इसमें लावा सा 
    अपने हाथों से छेड़ कर देखो
    [लख्त-ए-खूँ = blood clot, कैफ़ियत = kahaani)

    क्या है के ज़िन्दगी तो नाटक है
    और किरदार सबके आवारा
    हर दफा तुम ही क्यूं बनो क़ातिल
    इक दफ़ा मौत का भी डर देखो

    देख ताज़ा हवा के ये झोंके 
    शोर करते हैं ये तुझे होके 
    दिल में लहरों सी गुदगुदी होगी 
    एक पत्थर तो फ़ेंक कर देखो 


    ======================

    Before learning behr Grammar

    लख्त-ए-खूँ है रेत कर देखो 
    ये कैफ़ियत समेट कर देखो 
    चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
    आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 
    [लख्त-ए-खूँ = blood clot, कैफ़ियत = kahaani, नुमाइश  = exhibition]

    फिर किसी का दिलरुबा होना 
    मेरी वफ़ा का बेवफ़ा होना 
    अपने दिल की ख्वाहिशों के लिए 
    इक दफ़ा तुम फ़रेब कर देखो 
    चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
    आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 

    देख ताज़ा हवा के ये झोंके 
    शोर करते हैं ये तुझे होके 
    दिल में लहरों सी गुदगुदी होगी 
    एक पत्थर तो फ़ेंक कर देखो 
    चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
    आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 

    बे-असर

    Behr (2122 1212 112)
    After

    ज़र्फ़-ए-हस्ती तो साज़ गर ही रही
    शख़्सियत मेरी बे नज़र ही रही
    पोश सारे नक़ाब चेहरों पे
    मेरी हर बात बे-असर ही रही

    हम मुक़म्मल नहीं हैं कहते रहो 
    ज़द नहीं है तो ज़िद पे बैठे रहो 
    क्या नतीजे हैं गुफ्तगू से मिले 
    तेरी बातें अगर मगर ही रही 

    ज़िन्दगी झील हम किनारे रहे 
    जाने कितनों के हम सहारे रहे 
    बात इतनी सी पालने के लिए 
    हम इधर थे तो वो उधर ही रही 

    कल वफ़ाओं की रात चलती रही 
    जाने उनकी कमी क्युं खलती रही 
    आँख दुनिया की जब सितारे हुईं 
    अपनी पूछो तो आँख तर ही रही 

    ये जो फितरत की बात करते रहे 
    अपनी आदत से रोज़ मरते रहे 
    जिस्म इन्सां का बस मिला था इन्हें 
    रूह फिर भी तो जानवर ही रही 

    हमको महफिल में वो बुलाते रहे
    सर भी अपना यूं ही हिलाते रहे
    बात सबने मेरी सुनी तो मगर 
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    =====================

    Before 

    ज़र्फ़-ए-हस्ती साज़ गर ही रही 
    शख़्सियत मेरी बे नज़र ही रही 
    नक़ाब पोश सारे चेहरों में 
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    हम मुक़म्मल नहीं हैं कहते हो 
    ज़द नहीं है तो ज़िद पे बैठे हो 
    क्या नतीजे निकलते बातों के 
    बात अपनी अगर मगर ही रही 
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    ज़िन्दगी झील हम किनारे हैं 
    एक दूजे के हम सहारे हैं 
    बात इतनी संभालने के लिए 
    मैं इधर था तो वो उधर ही रही 
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    जब वफ़ाओं की बात चलती है 
    जाने किसकी कमी सी खलती है 
    रात नज़रें सभी सितारे हुए 
    मेरी पूछो तो आँख तर ही रही 
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 


    फितरतों की ये बात करते हैं 
    अपनी आदत से रोज़ मरते हैं 
    जिस्म इन्सां का बस मिला इनको 
    रूह फिर भी तो जानवर ही रही 
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    महफिलों में मुझे बुलाते रहे
    सर भी अपना यूं ही हिलाते रहे
    बात सबने मेरी सुनी लेकिन
    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    मेरी हर बात बे-असर ही रही 

    Thursday, September 12, 2024

    राग़िब

    राग़िब न कर मेरी रूह को 
    अरमाँ ये खो गए हैं 
    रहने दो चाँद की ज़द अभी 
    वो ख़याल सो गए हैं 

    तेरी जीत का मेरी हार का 
    हर बार का जो है सिलसिला 
    है क़रार अहद-ए-ख़िलाफ़ का 
    कहाँ ज़ख्म ये नए हैं 

    जो दिला रहे तुझे हौसले 
    रख उनसे भी कुछ फ़ासिले 
    मुझे क्या पता तेरे दिल में वो 
    क्या शुबा सा बो गए हैं 

    ये इधर उधर की ही बात है 
    कभी साथ है कभी मात है 
    अब क्या कहें के वो कौनसा 
    दुःख अपना रो गए हैं 

    Monday, September 9, 2024

    अक्सर

      Behr 2122 2122 2122

    After

    शायरों की ये बुरी आदत है अक्सर 
    क़ैद करते हैं ये कुछ लफ़्ज़ों में मंज़र 
    और बातों को भुला देते हैं लेकिन 
    फ़लसफ़ों को लिख लिया करते हैं अक्सर 

    हम तो मैख़ाने को जाते ही नहीं हैं 
    तेरी आँखों से पिया करते हैं अक्सर 

    जिनकी बातों में कोई भी दम नहीं है  
    वो ख़ुदा की ही क़सम खाते हैं अक्सर 

    पैरहन अपने बनाते देखा जिनको 
    ज़ख़्म भी अपने सिया करते हैं अक्सर 

    जिनसे आँखों को मिला पाना है मुश्किल 
    वो गली में मुझको दिख जाते हैं अक्सर 

    करते हैं ईमान की बातें जो हमसे 
    एक बोली में ही बिक जाते हैं अक्सर 

    जिन के घर की हैं दिवारें आसमाँ तक 
    उनके घर तूफ़ा में ढह जाते हैं अक्सर 

    जो हमें दे जाते हैं सारी विरासत 
    आदतें भी वो दे ही जाते हैं अक्सर 

    प्यार की तौज़्ही जिन्हें मालूम ना हो  
    प्यार वो ही तो किया करते हैं अक्सर 


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    Before

    शायरों की बुरी आदत है अक्सर 
    क़ैद करते हैं कुछ लफ़्ज़ों में मंज़र 
    और बातों को भुला देते हैं लेकिन 
    फ़लसफ़ों को ही लिखा करते हैं अक्सर 

    हम तो मैख़ाने को जाते ही नहीं हैं 
    तेरी आँखों से पिया करते हैं अक्सर 

    जिनकी बातों में कोई भी दम नहीं है  
    वो ख़ुदा की ही क़सम खाते हैं अक्सर 

    पैरहन अपने बनाते देखा जिनको 
    ज़ख़्म भी अपने सिया करते हैं अक्सर 

    जिनसे आँखें मिला पाना है मुश्किल 
    गली में मुझको दिख जाते हैं अक्सर 

    करते हैं बातें जो ईमान की हमसे 
    एक बोली में बिक जाते हैं अक्सर 

    जिनके घर की दीवारें आसमाँ तक 
    वो ही तूफ़ा में ढह जाते हैं अक्सर 
     

    जो हमें दे जाते हैं सारी विरासत 
    आदतें भी वो दे जाते हैं अक्सर 

    प्यार क्या है जिन्हें मालूम नहीं है  
    प्यार वो ही तो किया करते हैं अक्सर 

    Thursday, September 5, 2024

    तनहाई

    Bahr (2122 122 1212 22)

    याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा 
    तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा 
    तेरी मर्ज़ी न थी तक़दीर भी है शर्मिंदा 
    माना मुश्किल है मगर तू किसे बताएगा 

    लाज़मी है के नहीं छोर कोई चाहत के 
    क्या दबा के इन्हें रातों में तू सो पायेगा 

    बात बचकानी सी मासूमियत कि करते हो 
    चाह लोगे जिसे दिल से तुझे वो चाहेगा

    एक दिन तू भी तो हो जाएगा ख़ुदा हाफ़िज़ 
    कोई फिर तुझसा ही रोयेगा भूल जाएगा 

    याद करते हो जिसे वो तो अब न आएगा 
    तेरी तनहाई का ग़म ही तुझे सताएगा

     

    Wednesday, September 4, 2024

    तो क्या

    अगर तू है तो क्या है 
    अगर मैं हूँ तो क्या 
    ये मजमा बे पनाह है 
    मैं ना रहूँ तो क्या 
    [मजमा = भीड़]

    कहाँ ख़ुश है तू फिर भी 
    तुझे कितना मिला
    मिले हमें मिले जो 
    जो ना मिले तो क्या 

    ख़्वाहिशें खिल ना पाई 
    सिलसिला-ए-गिला 
    कभी मिले नहीं जो  
    जुदा हुए तो क्या 

    ये मुमकिन है के तुझसे 
    प्यार उसको न हो 
    मगर फिर सोचता हूं
    अगर हुआ तो क्या 

    चंद टुकड़ों की खातिर  
    ज़दें दिखला मुझे 
    जो हासिल कर लिया तो 
    न कर पाए तो क्या 

    हजारों चाँद तारे 
    अकेला आसमाँ 
    अगर ये आसमाँ में
    ना होते भी तो क्या 

    रोज़ बातें वही हैं 
    नया कुछ भी नहीं 
    जुगाली आदतों की 
    अगर कर ली तो क्या 

    मिला ऐसा ना कोई 
    कहे जो फैसला 
    मेरे हक़ में हुआ है 
    ना होता भी तो क्या 

    रवायत है के दुनिया 
    वजाहतों से है 
    है अफ़सुर्दा ज़माना 
    ख़ुदा भी है तो क्या 
    [रवायत = रिवाज़, वजाहत = आदर, अफ़सुर्दा = बे-हाल]
     
    ये बातें कह रहा हूँ 
    तो लगता है मुझे 
    मुझे सबने सुना है 
    न भी सुना तो क्या

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...