About Me

My photo
I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Showing posts with label qata. Show all posts
Showing posts with label qata. Show all posts

Friday, November 15, 2024

बदलते बदलते

Bahr: 
  • 122
  • 122
  • 122
  • 122

  • समझते हैं हम सब जिसे एक सूरज 
    सितारे हैं वो बारी बारी चमकते 
    हर इक दिन नया इक सितारा फलक पे 
    कहाता है सूरज सरकते सरकते 

    मेरी नज़्र से उनको शिकवे बड़े हैं 
    तुम्हें तो कदर ही नहीं है मेरी अब 
    ये साड़ी ये झुमके ये काजल तो देखो 
    वो कहती है मुझसे सवरते सवरते 

    मेरे बाग़ का फूल इक दिन खिला था 
    बड़ा खूबसूरत बड़ा आब ओ ताबी 
    वो खुशबू से महका रहा था ये दुनिया 
    हवा में समाया बिखरते बिखरते 

    गुबारों की बस्ती संभाले हुए था 
    संभाले थे उसने सभी अपने रिश्ते 
    मगर एक दिन ऐसा फूटा वो बादल 
    बरस ही गया वो संभलते संभलते 

    ना जाने ये किस दिन का बदला है तेरा 
    परस्ती तेरी की अक़ीदत की खातिर 
    मैं जैसा था अब तो मैं वैसा नहीं हूँ 
    बदल ही गया हूँ बदलते बदलते
    [परस्ती = Worship,अक़ीदत = Attachment ]

    Thursday, November 7, 2024

    ताल

    Bahr: 
  • 2122
  • 1122
  • 112
  • इस क़दर वक़्त है मसरूफ यहाँ 
    वक्त को खुद ही नहीं वक्त मिला 
    सबको देते हो जो भी मांगे तुझे
    ऐसा क्या था जो तुझे भी न मिला

    आँख किसकी मिली पहले क्या पता 
    हाल क्या पूछते हो दिल का मेरे 
    चैन तुझको न मिला मान लिया 
    तेरी सौगंध मुझे भी न मिला 

    दिल से गर दिल कि सदा मिल न सकी 
    दोस्त कैसे तु बनायेगा बता 
    दोस्त साज़ों की तरह हैं ये तेरे 
    साज़ के ताल से तू ताल मिला 

    Wednesday, May 29, 2024

    अब चलो जाओ

    जब भी मिलते हो तो कहते हो 'अब चलो जाओ'
    इतना आसां नहीं ये बात फिर ना दोहराओ  
    हम समझते हैं के हम कुछ भी समझते ही नहीं 
    और ये चाहत है के ये बात तुम समझ जाओ 

    इस गली भूल कर आना भी अब नहीं होता 
    आँख पथरा गई हैं अब तो कुछ तरस खाओ 
    बात ये है के अगर अब कोई बहाना भी नहीं 
    ये बता कर के मेरी आँख नम ही कर जाओ 

    Tuesday, May 21, 2024

    मुराद

    वो कहते रहते हैं अक्सर कभी तो याद करो 
    और हम कहें के भूलने की तुम फ़र्याद करो 
    राग़ों मे दौड़ते फिरते हैं वो लहू की तरह 
    ऐ खुदा अब मेरे जसबे को तुम मुराद करो 

    Saturday, April 6, 2024

    मार डाला

    जिन्हें चाहतें थी तेरी चाहतों की 
    तेरी हसरतों ने उन्हें मार डाला 
    तेरी ज़ुल्फ़ की उलझनों से जो निकले
    निगाहों ने तेरी उन्हें मार डाल 

    तेरी खुशबू जैसा महकता है संदल 
    तेरे तन बदन का सुखन है निराला 
    जिन्हें तेरी आँखों ने देखा नहीं था 
    अदाओं ने तेरी उन्हें मार डाला 

    तेरे सुर्ख होंठों पे लफ्जों के झरने 
    नहीं जिसने देखे अकल पे है ताला 
    तेरे मयकदे तक न जो आ सके हों  
    सदाओं ने तेरी उन्हें मार डाला  

    Monday, March 25, 2024

    नहीं समझोगे

    अब तो रहने दो मेरी बात तुम नहीं समझोगे 
    मेरी बे-ढंग सोच है तुम नहीं समझोगे 
    मैं बोलता ही जाऊँगा दीवानों की तरह 
    जो सोच रखा है तुमने तुम वही समझोगे 

    तुम नहीं समझोगे के क्यूँ तुम नहीं समझोगे 
    ये बात सोचने की है ये नहीं समझोगे 
    जो मैं कह दूँ के रहने दो मेरी बातों को 
    तो मैं खुद में ही हूँ मग़रूर यही समझोगे 

    ये समझ दिल की है दिमाग़ से ना समझोगे 
    है सोच के परे की बात नहीं समझोगे 
    जो आँख मूँद लो दिमाग़ को खाली कर दो 
    तब जो समझोगे तो समझो के सही समझोगे 

    Saturday, March 23, 2024

    मंज़िलें

    मंज़िलों की गुफ़्तगू मुझसे अभी होनी नहीं [गुफ़्तगू = conversation]
    रास्ते देखे हैं मैंने मंज़िलें देखी नहीं 
    थक गया था जब मुसाफ़िर कह गया मंज़िल उसे 
    जिसको मंज़िल कह रहा था वो कभी सोची नहीं 

    ख़्वाहिशों में रास्तों की रास्ते मिल जाते हैं 
    मंज़िलों की ख़्वाहिशों में लोग चलते भी नहीं 

    ज़िन्दगी के इस सफर की बेमिसाली खूब है [बेमिसाली = uniqueness]
    मोड़ पे हर, खूब हैं दर, पर कोई खिड़की नहीं [दर = door]

    झूठ की होती चमक है क़ाफ़ियों की ही तरहा [क़ाफ़िया = rhyming word]
    क़ाफ़ियों से शेर हरदम मुस्तख़म होते नहीं [मुस्तख़म = establish]

    रास्ते सौग़ात हैं अब की अभी मिलती हमें [सौग़ात = gift]
    चल पड़ो तो, चल पड़ोगे रास्ते मुश्किल सही 

    मंज़िलों की बात करते हैं वो झूठे लोग हैं 
    दर असल सच मुच कहीं भी मंज़िलें होती नहीं 

    Wednesday, March 6, 2024

    आवारगी

    याद आती जो तेरी तुझसे मिलने आ जाता 
    तुम मेरे साथ ही रहते हो तो क्या याद करूँ 
    भूल जाने की कोई बात कहाँ बनती है 
    याद आते नहीं क्या ये बड़ा सुबूत नहीं 

    बात बनती है बनाता हूँ जहां तक हो सके 
    मेरी फितरत ही ऐसी है तो मैं क्या ही करूँ 
    वैसे चुप रहता हूँ कहता हूँ मैं तो कुछ भी नहीं 
    मुझको छेड़ोगे कहने को तो पछताओगे 

    मुझे न क़ैद करो मैं कोई परिंदा नहीं 
    खुली हवा में साँसों की मुझको आदत है 
    बात कहने की हो या फिर हो बात सुनने की 
    कोई ना पेश हो सलीके से तो दम घुटता है 

    बड़े बेचैन हो रहे हो क्या बात है दोस्त 
    तू कलम में भी अगर है तो कोई बात नहीं 
    तू अगर चाहे लिख दूँगा तुझे पढूंगा नहीं 
    कोई पूछेगा तो कह दूंगा मैं हूँ आवारा  

    Monday, March 4, 2024

    गुमाँ

    उड़ने की बातें करते हो 
    और चलने से भी डरते हो 
    बदलोगे हाथों की लकीरें 
    तुम कैसी बातें करते हो 

    इक से हैं तुम और मैं कितने 
    फ़र्क़ मगर ये क्यूँ करते हो 

    मेरा क़द है तुझसे बेहतर 
    बच्चों सी बातें करते हो 

    साँसों का ये तुझमे चलना 
    इसमें तुम खुद क्या करते हो 

    ख़ुद देते हो ख़ुद की मिसालें 
    किससे सब समझा करते हो 

    खाना पीना जीना मरना 
    इसके अलावा क्या करते हो 

    दुनिया चलेगी तुम ना रहोगे 
    इतना गुमाँ फिर क्यों करते हो 

    आजकल

    मिलता हूँ इक अजीब शक्सियत से आजकल 
    होता हूँ रू-ब-रू मैं हक़ीक़त से आजकल
    कहता तो कुछ नहीं है मुझे देखता है वो
    शायद मेरी हरकत से है उदास आजकल 

    है कौन आईने में मुझसे चाहता है क्या 
    चलता नहीं कुछ मेरी इजाज़त से आजकल 

    जब देखता हूँ उसको तो नज़रें वो झुका ले 
    लगता है के शर्मिंदा बोहोत है वो आजकल 

    उसने ये सिखाया के सफर बे-हिसाब है 
    मिलता है सुकूँ आज में रहने से आजकल 

    Friday, March 1, 2024

    नहीं मिला

    demo
    ये बात तो नहीं के 
    कोई नहीं मिला 
    लेकिन ये बात भी है 
    तुझसा नहीं मिला 

    फ़ार्रुख वो ही हुए जो (फ़ार्रुख = fortunate)
    रस्तों पे चल पड़े 
    हमने तो बोहोत ढूँढा 
    रस्ता नहीं मिला 

    ऐसी नज़र न देखो 
    हम हैं नए अभी 
    हमको भी घर यहां पर 
    सस्ता नहीं मिला 

    दीवारों को नवाज़ा (नवाज़ा = respect)
    हद इन्तेहाई की (हद इन्तेहाई = extremity)
    कोई भी रंग इनपे 
    जचता नहीं मिला 

    बनते हैं आसमां में 
    जोड़े कहीं मगर 
    हमको कोई असल 
    वा बस्ता नहीं मिला (वा बस्ता = connected)

    तू बे वफ़ा हुआ तो 
    ऐसा भी क्या हुआ 
    तुमसा कोई भी मुझको 
    हँसता नहीं मिला 

    Saturday, February 17, 2024

    क़ता - लापता

    demo

    सितारों से पूछा था इक दिन किसी ने 
    के क्यूँ आसमानों में यूँ तैरते हो 
    सितारों ने पूछा उसे ही पलट कर 
    ज़मीं पे हो फिर भी ये क्या घूरते हो?

    किसी से भी पूछो तमन्नाएँ दिल की (तमन्ना = desire)
    किसी से भी पूछो के क्या चाहते हो 
    किसी को नहीं है पता ख़ुद की ख़्वाहिश (ख़्वाहिश = will)
    बताएँगे वो जो सभी चाहते हों 

    ये जन्नत की हूरें ये दोज़ख़ की बातें (दोज़ख़ = hell)
    किन्हें क्या मिला है किसे ये पता है
    जो दो प्यार के बोल कहता हो तुमसे
    उसे ही इलम है वही जानता है (इल्म = knowledge)

    है तस्वीर तेरी मेरे आईने में 
    ये क्या गुफ़्तगू है ये क्या माजरा है (गुफ़्तगू = conversation)
    ये पूछूँ मैं तुमसे जो दे दो इजाज़त
    के ऐसा मेरा तुझसे क्या राब्ता है 

    भटकते हैं हम-तुम यूँ ही इस जहाँ में 
    न तेरी ख़ता है न मेरी ख़ता है (ख़ता = fault)
    हमें हिक़मतों का सबक़ देने वाले (हिक़मत = ज्ञान, wisdom)
    न जाने किधर हैं कहाँ लापता हैं 



    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...