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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Saturday, March 30, 2024

भूला

मसरूफ़ियत में कई काम भूल जाता हूँ 
मिलकर करना है सलाम भूल जाता हूँ 
दिलचस्प हूँ और अनोखा बोहोत हूँ 
खाने हैं मुझको बादाम भूल जाता हूँ  

फिर से चल पड़ता हूँ लंबे सफर पे 
हासिल किए मैं मक़ाम भूल जाता हूँ
रिश्तों से अक्सर पुकारता हूँ सबको
क्या है के सबके मैं नाम भूल जाता हूँ 

मैययत दिवाली या होली के शादी 
लोगों में हूँ बदनाम भूल जाता हूँ 
सीने से लगकर ही मिलता हूँ सबसे 
दुश्मन मैं अपने तमाम भूल जाता हूँ 

आज़ाद कोई भी होता नहीं है 
याद दाश्त का हूँ ग़ुलाम भूल जाता हूँ 
अपनी सफाई में क्या ही कहूँ मैं 
खुद पर लगे इल्ज़ाम भूल जाता हूँ 

सोचा हुआ लिखना पड़ता है अब तो 
जीवन की अब है ये शाम भूल जाता हूँ 
पढ़ना पड़ेगा मुझे ये भी लिखकर 
खुद के लिखे मैं कलाम भूल जाता हूँ 

Friday, March 29, 2024

तौर

रात दिन दर-ब-दर ऐलान नहीं चाहिए 
मुश्किलें हल करो ज़बान नहीं चाहिए 
मुश्किलों को अगर शैतान हटा सकता है 
दे दो शैतान ये भगवान नहीं चाहिए 

जाओ कह दो हुकूमत से सईबी से उधर
हमको अब राह बर नादान नहीं चाहिए

मैं तो आता हूँ तेरा हक़ दिलाने को तुझे  
मुझे हक़ दो मेरा, निशान नहीं चाहिए 

ये कैसी चाहतें हैं पर्बतों की अब तुमको 
चाहिए चोटी पर ढलान नहीं चाहिए 

गलतियां होती हैं इंसान हो मशीन नहीं 
गलतियां ठीक करो बयान नहीं चाहिए

पेड़ पानी भी लाएगा, हरियाली भी
मुझे अब तरफ मक़ान नहीं चाहिए

मशीनों से करोगे क्या ही रिश्ते दारियाँ 
मशीनें हैं इन्हें इंसान नहीं चाहिए 

जिन मकानों की बड़ी बात करते हो अक्सर 
उन मकानों को मेहमान नहीं चाहिए 

हम पसीने में तपे जाते हैं महलों के लिए 
कुछ निवाले दो आसमान नहीं चाहिए 

तौर जिस दिन मेरा मुझसे जुदा हो जाएगा 
जिस्म में तब मुझे ये जान नहीं चाहिए 

मिसाल

धुंधली पड़ी यादों पे जरा इक नज़र तो डाल
कहकर ये बात मुझसे किया उसने ये सवाल 

अच्छा था गया वक़्त या ये वक़्त है बेहतर
मैंने कहा करता नहीं मैं वक़्त का मलाल 

जो वक़्त था वो वक़्त है हर वक़्त रहेगा
होता है जो भी इसमें नहीं वक़्त का कमाल 

लिखता है कोई नज़्म कोई गीत कहानी
किरदार यहाँ वक़्त का करते हैं इस्तेमाल 

ये बात मेरी तुझको लगती होगी मुख्तलिफ़
इस बात मे कहीं भी नहीं है मेरा खयाल 

मैं कौन हूँ इतना भी नहीं इल्म है मुझे
कह दूँ ये बड़ी बात इतनी मेरी क्या मजाल 

कठपुतली हूँ कहानी कह के जाऊंगा तुझे
उम्मीद है ये बात रहेगी कहीं मिसाल 

Tuesday, March 26, 2024

पसीना

लोग रहते हैं यहाँ पर तो मक़ीनों की तरह 
है हुकूमत की भी क़ुदरत तो यक़ीनों की तरह 
कहकशाँ और भी हैं दुनिया की बात करते हो 
ये 
तेरी ज़िन्दगी मिट्टी है ज़मीनों की तरह 

बात करते हो जो सबसे तो ज़हीनों की तरह 
पेश आते हो महफ़िलों में नगीनों की तरह 
आईने में सच कहना तुझे क्या दीखता है?
क्या पेहेनते हो ये चेहरे पे हसीनों की तरह?

राज करते हैं कई लोग ख़लीफ़ों की तरह 
और कुनबे भी बनाते हैं क़बीलों की तरह 
एक क़तरा भी नहीं हैं वो समंदर के यहाँ 
सबको मिट्टी में ही मिलना है पसीनों की तरह 
 

Monday, March 25, 2024

नहीं समझोगे

अब तो रहने दो मेरी बात तुम नहीं समझोगे 
मेरी बे-ढंग सोच है तुम नहीं समझोगे 
मैं बोलता ही जाऊँगा दीवानों की तरह 
जो सोच रखा है तुमने तुम वही समझोगे 

तुम नहीं समझोगे के क्यूँ तुम नहीं समझोगे 
ये बात सोचने की है ये नहीं समझोगे 
जो मैं कह दूँ के रहने दो मेरी बातों को 
तो मैं खुद में ही हूँ मग़रूर यही समझोगे 

ये समझ दिल की है दिमाग़ से ना समझोगे 
है सोच के परे की बात नहीं समझोगे 
जो आँख मूँद लो दिमाग़ को खाली कर दो 
तब जो समझोगे तो समझो के सही समझोगे 

रात

वो भी क्या दिन थे ज़िन्दगी के मेरे 
गीत तेरे ही गुनगुनाते थे 
तुम ही दीखते थे महफिलों में मुझे 
सब तेरे नाम से बुलाते थे 

किस तरह दिन बरस ये बीत गए 
रात दिन कैसे आते जाते थे 
कुछ समझ पाता दिल तो कहते तुझे 
वक़्त को कैसे हम भुलाते थे 

जब कभी नाम तेरा सुनते थे 
ज़िद की हद को आज़माते थे 
रोक लेते थे मुस्कुरा के उन्हें 
अश्क़ आँखों तलक तो आते थे 

इक तमाशा सा देखने के लिए 
दोस्त मौसम की तरह आते थे 
हमसे उम्मीद कर के रोने की 
बेवझा हँसते और हंसाते थे 

कोई तारा जो टूटता था कभी 
आस सी दिल को हम दिलाते थे 
प्यास आँखों की फिर भी रुक ना सकी
कितने आंसू इसे पिलाते थे 

आसमानों में ये कहानी है 
ग़म तेरे कैसे हम मिटाते थे 
परवरिश दिन की जब तमाम हुई 
रात को रात भर सुलाते थे 

Saturday, March 23, 2024

मंज़िलें

मंज़िलों की गुफ़्तगू मुझसे अभी होनी नहीं [गुफ़्तगू = conversation]
रास्ते देखे हैं मैंने मंज़िलें देखी नहीं 
थक गया था जब मुसाफ़िर कह गया मंज़िल उसे 
जिसको मंज़िल कह रहा था वो कभी सोची नहीं 

ख़्वाहिशों में रास्तों की रास्ते मिल जाते हैं 
मंज़िलों की ख़्वाहिशों में लोग चलते भी नहीं 

ज़िन्दगी के इस सफर की बेमिसाली खूब है [बेमिसाली = uniqueness]
मोड़ पे हर, खूब हैं दर, पर कोई खिड़की नहीं [दर = door]

झूठ की होती चमक है क़ाफ़ियों की ही तरहा [क़ाफ़िया = rhyming word]
क़ाफ़ियों से शेर हरदम मुस्तख़म होते नहीं [मुस्तख़म = establish]

रास्ते सौग़ात हैं अब की अभी मिलती हमें [सौग़ात = gift]
चल पड़ो तो, चल पड़ोगे रास्ते मुश्किल सही 

मंज़िलों की बात करते हैं वो झूठे लोग हैं 
दर असल सच मुच कहीं भी मंज़िलें होती नहीं 

Friday, March 22, 2024

लाचारी

गुफ़्तगू में तेरी बारी मेरी बारी से कम है क्या 
मैं जैसे जी रहा हूँ ये कलाकारी से कम है क्या 
न मतलब पूछ तू मुझसे बे वझा क्यों झगड़ते हो 
दिलों के बीच की बातें रिश्तेदारी से कम है क्या 

मेरा क़ातिल मेरे ही घर खून मेरा कर रहा हो 
मेरा ये फिर भी चुप रहना वफ़ादारी से कम है क्या 

किसी भी बात में लफ़्ज़ों का होना तो मुनासिब है 
बिना लफ़्ज़ों के फ़रमाना समझदारी से कम है क्या 

ज़रा देखूं तो पर्दों से ज़रा हट के तुझे भी मैं 
तेरे आँखों की मुस्कानें अदाकारी से कम हैं क्या 

वो कहते हैं नहीं रहते हैं पर्दों में कभी लेकिन 
निगाहों पे पड़ी ज़ुल्फ़ें पर्देदारी से कम है क्या 

न पूछो क्या हुआ है मर्ज़ हमको क्या अलालत है 
तेरी ही धुन में फिरते हैं ये बीमारी से कम है क्या 

फ़िज़ाओं में तेरी खुशबू ज़हन में तुम ही रहते हो 
अकेला दिल धड़कता है ये लाचारी से कम है क्या 

Wednesday, March 20, 2024

शोर

शोर, हर तरफ़ शोर 
ख्यालों में, बैठा चित चोर 
भीड़ हो या अकेला पन 
नहीं इसका कोई भी छोर । शोर, हर ... 

किसकी सुनें किस किस की सुनें 
दिल तो बड़ा कन्फूज़ है साला 
इसकी प्रायोरिटी उसकी दिल्लगी 
जैसे हो कोई मकड़ी का जाला 

ट्रैफिक दिमाग का ऐसा है बिखरा 
हो जैसे ये भी बैंगलोर। शोर, हर ... 

टाइम नहीं है इसमें राइम नहीं है 
म्यूज़िक में कहीं कोई चाइम नहीं है 
अरे कितने ही साज़ आवाज़ हैं इसमें 
फिर भी ये दिल मांगे मोर। शोर, हर ... 

चैलेंजेज़ बढ़ते ही जाते हैं 
फूलों के संग कितने कांटे हैं 
तुझको जो जीत ये करनी है हासिल 
चलना नहीं अब तू दौड़ 

शोर, हर तरफ़ शोर 
ख्यालों में, बैठा चित चोर 
भीड़ हो या अकेला पन 
नहीं इसका कोई भी छोर । शोर, हर ... 

Tuesday, March 12, 2024

रुहदारी

तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

कितना भी समझाओ इसको मक्कारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

हफ़्तों से मिलने की देखो तैयारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

कभी दिन में हो कभी रात हो 
बेवक़्त ही कोई बात हो 
दिल धक् धक् कर के कितनी होशियारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

तुम आओगे छा जाओगे 
या ऐसे ही चले जाओगे 
तेरे इरादों से मुझको जुआरी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

अजी आओ तो फ़रमाओ तो 
हमसे बातें बतलाओ तो 
तेरा ये मजनू बातें बड़ी प्यारी करता है 
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है
तेरे इश्क़ में दिल रुहदारी रुहदारी करता है

Monday, March 11, 2024

शायर के ख़्वाब

फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से 
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से 

दिन रात आप की ही बात सोचते हैं हम 
शुरुआत कैसे की थी हमने एहतराम से 

काग़ज़ पे चार हर्फ़ ही क्या लिख दिए मैंने 
साँसे तेरी रुक सी गई मेरे कलाम से 

तेरा घडी-घडी घडी की ओर देखना 
और याद है बिगड़ना तेरा मेरे नाम से 

हमको भी याद हैं वो तेरे ख़ास बहाने 
कुछ काम ज़रूरी से ज़रूरी थे शाम से 

हंसना तेरा रोना तेरा कनखी से देखना 
और कहना ये के काम रखिये अपने काम से 

वो वक़्त तो यादों की शक्ल याद रहेंगे 
वो दिन नहीं आने अभी कितने भी दाम से 

फ़ुर्सत कहाँ मिलती है जहां के हिसाब से 
कुछ पल निकाल लेते हैं शायर के ख़्वाब से 

Sunday, March 10, 2024

ज़िंदा हूँ मैं

ये पूछते हैं लोग कैसे ज़िंदा हूँ मैं 
साँसे नहीं रही तो कैसे ज़िंदा हूँ मैं 
ये मानता हूँ जिस्म में साँसे नहीं रही 
ज़ेहनों में दोस्तों के वैसे ज़िंदा हूँ मैं 

कह डालो जनाज़े में मेरे कुछ भी मगर 
अंदाज़ ऐसे रखना जैसे ज़िंदा हूँ मैं 

इतना भी मेरी मैय्यत पे दुःख ना करो यार 
के मुझको लगे जैसे तैसे ज़िंदा हूँ मैं 

तरकीब ये लगाई थी शेरों की शक्ल में 
लिख डाले हैं ख़याल ऐसे ज़िंदा हूँ मैं 

Saturday, March 9, 2024

सागर

लहरों की तरह जज़्बात भी होते हैं 
गिरते उठते हँसते और रोते हैं 
जीवन की मंज़िल मौत के धागे से 
जुड़कर फिर से जीवन ही होते हैं 

हर मौज में इतना शोर के सन्नाटे 
आराम से गहराई में सोते हैं 

कुछ कहती है हर बूँद ये जीवन की 
कुछ शख्स यहाँ पहचान के होते हैं 

आवाज़ नहीं होती गहराई में 
ऐसे ही तो वाक़िफ़ भी होते हैं 

दीखता तो नहीं है कुछ भी पानी में 
जाईके में नमकीन से होते हैं 

बुनियाद की अज़मत इतनी होती है 
इसके जानिब दुःख खुद भी रोते हैं  

हम तुम आकर जीवन के सागर में 
मोती की तरह किरदार पिरोते हैं 

Friday, March 8, 2024

रूह अफ़्ज़ा

आजकल हम भी तेरी उल्फतों में रहते हैं 
बारहा चारों पहर मयकदों में रहते हैं 
नज़्म, शेरों में ग़ज़ल में और मिसरों में 
तेरी  बातों के कई शायरों में रहते हैं 

तेरे रुखसार पे जो तिल की तरह दिखता है 
ये तेरे हुस्न की ही ख़िदमतों में रहते हैं 

रौशनी के लिए हम छत पे खड़े हैं कबसे 
चाँद के साथ हम भी ज़ुल्मतों में रहते हैं 

ज़रा ख़याल करो देखो कभी हमको भी 
हम तेरे साथ कई दावतों में रहते हैं 

कितनी मसरूफ हैं ज़ुल्फ़ें ये तेरे चेहरे पर 
मुश्किलों से ये कभी  फुर्सतों रहते हैं 

एक छूटी थी अभी सांस तभी देखा तुम्हें 
एक अरसे से यूँ ही मुद्दतों में रहते हैं 

आँख है झील तेरी ज़ुल्फ़ घने बादल हैं 
देख हम कैसे यहाँ क़ुदरतों में रहते हैं 

किसी नशे से कम नहीं आपकी बातें  
आप अक्सर ही मेरी आदतों में रहते हैं 

बात करते हो तो लगता है जैसे रूहअफ़्ज़ा  
नोश फरमाओ जी हम शर्बतों में रहते हैं 

Thursday, March 7, 2024

बेसबब

ऐ ख़ुदा हमको ये फिर से किस जनम का सिला दिया 
मौत मांगी थी मगर फिर ज़िन्दगी से मिला दिया 
हम तो रोते थे के क्यों फिर आ पड़े इस जहान में 
और लोगों ने हमें पुचकार के कुछ पीला दिया 

होश जब आया जहां ने क्या न जाने सिखा दिया 
जो भी सीखा था कभी मैंने वो सब कुछ भुला दिया 
झूठ सच और प्यार नफ़रत शान-ओ-शौक़त एहमियत 
डाल कर मुझमें ये बातें ज़ोर से फिर हिला दिया 

क्या खता मुझसे हुई थी ज़िन्दगी के खेल में 
क्या परख लेनी थी तुझको इस तरह की जेल में 
जब समझ आने लगी थी वो तेरे दर की ख़ुशी 
क्यों भुला कर इस जहां में बेसबब ही बिठा दिया 

Wednesday, March 6, 2024

आवारगी

याद आती जो तेरी तुझसे मिलने आ जाता 
तुम मेरे साथ ही रहते हो तो क्या याद करूँ 
भूल जाने की कोई बात कहाँ बनती है 
याद आते नहीं क्या ये बड़ा सुबूत नहीं 

बात बनती है बनाता हूँ जहां तक हो सके 
मेरी फितरत ही ऐसी है तो मैं क्या ही करूँ 
वैसे चुप रहता हूँ कहता हूँ मैं तो कुछ भी नहीं 
मुझको छेड़ोगे कहने को तो पछताओगे 

मुझे न क़ैद करो मैं कोई परिंदा नहीं 
खुली हवा में साँसों की मुझको आदत है 
बात कहने की हो या फिर हो बात सुनने की 
कोई ना पेश हो सलीके से तो दम घुटता है 

बड़े बेचैन हो रहे हो क्या बात है दोस्त 
तू कलम में भी अगर है तो कोई बात नहीं 
तू अगर चाहे लिख दूँगा तुझे पढूंगा नहीं 
कोई पूछेगा तो कह दूंगा मैं हूँ आवारा  

Monday, March 4, 2024

गुमाँ

उड़ने की बातें करते हो 
और चलने से भी डरते हो 
बदलोगे हाथों की लकीरें 
तुम कैसी बातें करते हो 

इक से हैं तुम और मैं कितने 
फ़र्क़ मगर ये क्यूँ करते हो 

मेरा क़द है तुझसे बेहतर 
बच्चों सी बातें करते हो 

साँसों का ये तुझमे चलना 
इसमें तुम खुद क्या करते हो 

ख़ुद देते हो ख़ुद की मिसालें 
किससे सब समझा करते हो 

खाना पीना जीना मरना 
इसके अलावा क्या करते हो 

दुनिया चलेगी तुम ना रहोगे 
इतना गुमाँ फिर क्यों करते हो 

आजकल

मिलता हूँ इक अजीब शक्सियत से आजकल 
होता हूँ रू-ब-रू मैं हक़ीक़त से आजकल
कहता तो कुछ नहीं है मुझे देखता है वो
शायद मेरी हरकत से है उदास आजकल 

है कौन आईने में मुझसे चाहता है क्या 
चलता नहीं कुछ मेरी इजाज़त से आजकल 

जब देखता हूँ उसको तो नज़रें वो झुका ले 
लगता है के शर्मिंदा बोहोत है वो आजकल 

उसने ये सिखाया के सफर बे-हिसाब है 
मिलता है सुकूँ आज में रहने से आजकल 

इल्तेजा

कोई कहीं कभी किसी जघा तनहा 
मेरे ख्यालों से भी होकर गुज़रेगा 
जिसे मैं देख ही नहीं सकता हूँ अभी 
देख लेना वो ख़ाबों से ही उतरेगा 

ये दिल से आवाज़ें आती हैं इतनी मेरे 
के इनको चाहूँ तो भी झूठा कैसे कहूँ 
कोई कशिश तो आकर पास मेरे 
है कानों में क्या कहती है ये किससे कहूँ 

मैं उसका हाथ प्यार से जो हाथ में लूँ 
मुझे यक़ीन है कभी न वो छोड़ेगा 
जिसे मैं देख भी नहीं सकता हूँ अभी 
देख लेना वो ख़ाबों से ही उतरेगा 

चले आओ चले आओ 
मुझे ऐसे न तड़पाओ 
यूँ धड़कन में धड़क कर तुम 
रग़ों में ही समा जाओ 

ये इल्तेजा है बेचारे इस दिल की मेरे 
कभी तो बात मेरी भी वो सुन लेगा 
जिसे मैं देख भी नहीं सकता हूँ अभी 
देख लेना वो ख़ाबों से ही उतरेगा 


Male
Female

Friday, March 1, 2024

नहीं मिला

demo
ये बात तो नहीं के 
कोई नहीं मिला 
लेकिन ये बात भी है 
तुझसा नहीं मिला 

फ़ार्रुख वो ही हुए जो (फ़ार्रुख = fortunate)
रस्तों पे चल पड़े 
हमने तो बोहोत ढूँढा 
रस्ता नहीं मिला 

ऐसी नज़र न देखो 
हम हैं नए अभी 
हमको भी घर यहां पर 
सस्ता नहीं मिला 

दीवारों को नवाज़ा (नवाज़ा = respect)
हद इन्तेहाई की (हद इन्तेहाई = extremity)
कोई भी रंग इनपे 
जचता नहीं मिला 

बनते हैं आसमां में 
जोड़े कहीं मगर 
हमको कोई असल 
वा बस्ता नहीं मिला (वा बस्ता = connected)

तू बे वफ़ा हुआ तो 
ऐसा भी क्या हुआ 
तुमसा कोई भी मुझको 
हँसता नहीं मिला 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...