About Me
- Vivek Pohre
- I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Saturday, March 30, 2024
भूला
Friday, March 29, 2024
तौर
मिसाल
धुंधली पड़ी यादों पे जरा इक नज़र तो डाल
कहकर ये बात मुझसे किया उसने ये सवाल
अच्छा था गया वक़्त या ये वक़्त है बेहतर
मैंने कहा करता नहीं मैं वक़्त का मलाल
जो वक़्त था वो वक़्त है हर वक़्त रहेगा
होता है जो भी इसमें नहीं वक़्त का कमाल
लिखता है कोई नज़्म कोई गीत कहानी
किरदार यहाँ वक़्त का करते हैं इस्तेमाल
ये बात मेरी तुझको लगती होगी मुख्तलिफ़
इस बात मे कहीं भी नहीं है मेरा खयाल
मैं कौन हूँ इतना भी नहीं इल्म है मुझे
कह दूँ ये बड़ी बात इतनी मेरी क्या मजाल
कठपुतली हूँ कहानी कह के जाऊंगा तुझे
उम्मीद है ये बात रहेगी कहीं मिसाल
Tuesday, March 26, 2024
पसीना
लोग रहते हैं यहाँ पर तो मक़ीनों की तरह
है हुकूमत की भी क़ुदरत तो यक़ीनों की तरह
कहकशाँ और भी हैं दुनिया की बात करते हो
ये तेरी ज़िन्दगी मिट्टी है ज़मीनों की तरह
बात करते हो जो सबसे तो ज़हीनों की तरह
पेश आते हो महफ़िलों में नगीनों की तरह
आईने में सच कहना तुझे क्या दीखता है?
क्या पेहेनते हो ये चेहरे पे हसीनों की तरह?
राज करते हैं कई लोग ख़लीफ़ों की तरह
और कुनबे भी बनाते हैं क़बीलों की तरह
एक क़तरा भी नहीं हैं वो समंदर के यहाँ
सबको मिट्टी में ही मिलना है पसीनों की तरह
Monday, March 25, 2024
नहीं समझोगे
अब तो रहने दो मेरी बात तुम नहीं समझोगे
मेरी बे-ढंग सोच है तुम नहीं समझोगे
मैं बोलता ही जाऊँगा दीवानों की तरह
जो सोच रखा है तुमने तुम वही समझोगे
तुम नहीं समझोगे के क्यूँ तुम नहीं समझोगे
ये बात सोचने की है ये नहीं समझोगे
जो मैं कह दूँ के रहने दो मेरी बातों को
तो मैं खुद में ही हूँ मग़रूर यही समझोगे
ये समझ दिल की है दिमाग़ से ना समझोगे
है सोच के परे की बात नहीं समझोगे
जो आँख मूँद लो दिमाग़ को खाली कर दो
तब जो समझोगे तो समझो के सही समझोगे
रात
Saturday, March 23, 2024
मंज़िलें
Friday, March 22, 2024
लाचारी
Wednesday, March 20, 2024
शोर
Tuesday, March 12, 2024
रुहदारी
Monday, March 11, 2024
शायर के ख़्वाब
Sunday, March 10, 2024
ज़िंदा हूँ मैं
Saturday, March 9, 2024
सागर
Friday, March 8, 2024
रूह अफ़्ज़ा
Thursday, March 7, 2024
बेसबब
Wednesday, March 6, 2024
आवारगी
Monday, March 4, 2024
गुमाँ
आजकल
मिलता हूँ इक अजीब शक्सियत से आजकल
होता हूँ रू-ब-रू मैं हक़ीक़त से आजकल
कहता तो कुछ नहीं है मुझे देखता है वो
शायद मेरी हरकत से है उदास आजकल
है कौन आईने में मुझसे चाहता है क्या
चलता नहीं कुछ मेरी इजाज़त से आजकल
जब देखता हूँ उसको तो नज़रें वो झुका ले
लगता है के शर्मिंदा बोहोत है वो आजकल
उसने ये सिखाया के सफर बे-हिसाब है
मिलता है सुकूँ आज में रहने से आजकल
इल्तेजा
Friday, March 1, 2024
नहीं मिला

ख़ामोशी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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सब है पराया रख ना क्या है ग़म हैं किसी के अ पना क्या है उम्र गुज़ारी खुल गई आँखें उम्र गुज़ारी अब जागा हूँ उम्र गुज़ारी त...
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तेरी अदीम निगाहों ने बे पनाह किया बिना किये मुझे आगाह ही तबाह किया ये किस तरह कि है उल्फत के मेरी फ़िक्र नहीं न कैद ही किया मुझको न ही रियाह ...
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जब कभी तेरा ख़याल आता है जाने क्या दिल को हुआ जाता है वक़्त ठहरा हुआ सा लगता है तू मेरे दिल में समा जाता है ग़ैर लगती है ये दुनिया मुझ को तू सग...