About Me

My photo
I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
Showing posts with label nazm. Show all posts
Showing posts with label nazm. Show all posts

Tuesday, November 19, 2024

जानवर

ये कौन है जो मुझको बांध बांध लाता है 
ये कौन है जो मुझको रोज़ बेच आता है
नफे की चाहतों में कौन यूँ दिवाना है 
ये कौन है जो मुझको केमिया खिलाता है 

ये किसने मुझको जंगलों से खैंच लाया है 
ये किसने बार बार ज़ुल्म मुझपे ढाया है 
ये कौन ब्रह्म ब्रह्म कहके ढोंग करता है 
ये कौन है जो रात दिन मुझे सताता है

ये कौन है जो अपने पाँव पे खड़ा नहीं 
ये कौन है जो मेरी जूतियाँ बनाता है 
निचोड़ कर के मेरी चर्बी खूब फूले है 
ये कौन झूठ मूठ माँ मुझे बुलाता है 

मैं सोचती हूँ सोचना इसे कब आएगा 
ये कब तलक यूँ होश में ही आ न पाएगा 
के कैसे बिन मेरे ये रात दिन गुज़ारेगा 
ये कर्ज कैसे मेरे दूध के उतारेगा 

मैं जानवर हूँ झूठ मूठ मुझको माँ ना कहो 
ये जो क़ुदरत है इसके साये तले तुम भी रहो 
ज़रा कोशिश तो करो खुद के दम पे जीने की 
अपनी बैसाखी बना तुम मुझे कुरबाँ ना करो 

है तुमसे एक गुज़ारिश ये मुझे कहने दो 
के मुझे धूप छाँव बर्फ खुद ही सहने दो 
मुझे नहीं हैं ख्वाहिशें तुम्हारे चौखट की 
मैं जानवर हूँ मुझे जानवर ही रहने दो 

Sunday, November 17, 2024

क़वाद

Bahr: 
  • 12122
  • 12122

  • जिसे समझता था मैं सहारा 
    ये असलियत में तो वो नहीं है 
    जिसे समझता था मैं मोहब्बत 
    नहीं है सच में ये वो नहीं है 

    कहीं तो होगी रुहे रुमानी 
    जहाँ के तल्ख़ी बसी नहीं हो 
    मगर यहाँ के हरेक शय में 
    तो नफ़्ज़ परती भरी हुई है  

    कहीं तो हो इब्तिदा सुहानी 
    के जिसके अंजाम हों सुहाने 
    चराग़ी आँखें जला के देखी 
    मगर नहीं है कहीं नहीं है 

    पहाड़ झरना ये बहता पानी 
    सभी कि है इक सि ही कहानी 
    सभी को जीने की ख्वाहिशें हैं 
    सभी की नफ़्ज़ें दबी हुई हैं

    न जाने है कौन सी निशानी
    हैं ज़र्द के ज़र्द बिन कहानी
    जो दिल ने चाहा था ज़िन्दगी से
    जो खाब देखे ये वो नहीं हैं 

    है कौन बैठा मेरे ज़हन में 
    के जिसके मंसूबों से हूँ चलता 
    है क्या ज़हन में जो चाहता है 
    किसी को भी ना हो इत्मिनानी 

    सराब की सी है ज़िंदगानी
    दिखे जो है ना दिखे नहीं है 
    यही बुढ़ापा यही जवानी 
    क़वाद हैं पर लिखे नहीं हैं 
     

    Monday, November 4, 2024

    अँधेरा

    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है 
    उजाला बेवफ़ा सा है कभी ज़्यादा कभी कम है 

    अँधेरा दिन नहीं होता अँधेरी रात होती है 
    उजाला देखने दिखलाने वाली ज़ात होती है 

    अंधेरों में कोई ज़्यादा नहीं कोई कहीं कम है 
    अंधेरों में न कोई तल्खी ना ही शोख परचम है 
     
    न जाने ढूंढते फिरते हैं क्या सब इन उजालों में 
    जवाबों की ख्वाहिशों में पड़े रहते सवालों में 

    अँधेरे को मिटा दे ये चराग़ों में कहाँ दम है 
    ये आबादी उजालों की अंधेरों से बोहोत कम है 

    अंधेरों ने मुझे चुपके से कानों में बताया है 
    के देखो इन उजालों ने हौसलों को चुराया है 

    उजालों ने कहाँ किसको कभी जीना सिखाया है 
    उजालों की चका चौंधों ने सबको बस रुलाया है 

    उजालों ने ज़िन्दगी में सभी को अक्सर तोड़ा है 
    अंधेरों ने कहीं चुपके से उनको फिर से जोड़ा है 

    अँधेरा था अँधेरा है अँधेरा ही रहेगा 
    उजाला जब भी थक जाए तो अँधेरा बहेगा 

    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है 

    Friday, September 6, 2024

    मैं सोचता हूँ

    मैं सोचता हूँ 
    मैं सोचता हूँ ये कहना - कितना मुनासिब है 
    ये मेरी सोच है कितनी, ये कितनी ग़ैर जाज़िब है  
    मैं सोचता हूँ के यहाँ अगर मैं हूँ तो कितना हूँ 
    ज़हन में काएनातें हैं और मैं ज़र्रे जितना हूँ
    [ग़ैर जाज़िब = unwelcome]

    मेरा हर लफ़्ज़ हर इक बात मेरी तो नहीं होती  
    मेरे एहसान, बद-कारी से एक हक़त नहीं होती 
    ना मेरा है तसव्वुर कुछ ना इख्तियार है कोई 
    जो कुछ भी हो रहा है इसके पीछे है तो बस वो ही  

    वोही शिरकत कराता है एक ज़र्रे की खिदमत में 
    वो ना चाहे तो सूरज भी नहीं आएगा दुनिया मे 
    किसी इंसान मे ताकत ये इतनी हो नहीं सकती 
    जिसे देखा नहीं उसको ये आँखें रो नहीं सकती 

    मैं सोचता हूँ 
    मैं सोचता हूँ मुझे कुछ सोचना ही नहीं आता 
    ज़हन मे कुछ खुदा है कुछ भुलाया नहीं जाता 
    मैं तो मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ मुख्तार हूँ उसका 
    बिना देखे बिना जाने मैं तलबगार हूँ उसका 
    [तलबगार = thirsty] 

    साँस आती है 
    सुकूं मिलता है, ज़हन चलता है, 
    हाथ उठता है, कलम लिखती है, 
    आँख से देख जुबां कहती है
    और मैं सोचता हूँ कि "मैं" सोचता हूँ 

    Sunday, August 18, 2024

    ख़ुद गर्ज़

    ऐसे कैसे ये तुमने सोच लिया 
    आज के बाद भूल जाओगे 
    इतना आसाँ भी नहीं बच पाना 
    हर तरफ अक्स मेरे पाओगे 

    तुम जो जाने की बात करते हो 
    जो हम गए तो जान जाओगे 
    बड़ी मुश्किल से रात गुज़रेगी 
    बिन मेरे रह ही नहीं पाओगे 

    बात ऐसी अगर करोगे तो 
    क्या मेरा साथ तुम निभाओगे 
    दो घडी बैठ के बातें तो करो 
    क्या पता खुद ही मान जाओगे 

    तेरी शर्तों के ऐसे पैमाने 
    और कितना मुझे रुलाओगे 
    प्यार ख़ुद गर्ज़ तो नहीं होता 
    प्यार होते ही समझ जाओगे 

    Saturday, August 17, 2024

    साँस

    जुदा हुए थे कभी और कब मिलेंगे भला 
    आज भी ज़िंदा मैंने अपनी प्यास रक्खी है 
    ज़मी से मेल कभी ना कभी तो होगा ही 
    के चाँद ने तो आज भी ये आस रक्खी है 

    ये ज़िन्दगी का सफ़र सांस की अमानत है 
    तो क्यूँ शिकन यूँ लबों पर उदास रक्खी है 
    अपनी साँसों से चुराकर बड़ी हिफ़ाज़त से 
    नाम तेरे भी मैंने एक साँस रक्खी है
     
    यकीं नहीं तो देख दिल मे मेरे झांक ज़रा 
    ज़ियादती वो इश्क की संभाल रक्खी है 
    भंवर उठा तो तुझे प्यार खैंच लाएगा 
    के मैंने दिल मे क़ैद वो भड़ास रक्खी है

    Monday, July 15, 2024

    कुछ कहो (नज़्म)

    कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 
    यूँ ही वीरान से जज़्बों के ख़ाब में ना रहो 
    ख़ाब का क्या है आज है फिर ना होगा कभी 
    भूल जाना है एक दिन ख़ाबों को सभी 

    ग़ुबार होंगे एक दिन इनको ना सहो 
    कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 

    हाँ कहना नहीं है तो क्या तेरी आँखें चुप हैं 
    जगह कम है, और छुपाने को कितना कुछ है 
    संभल रही हैं मचलती हुई बातें तेरे दिल में 
    मुझे पता है के तुम हो अभी कितनी मुश्किल में 

    ना सुनो खुद की, 
    और खुद से ही कहो 
    कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 

    तेरा पैगाम देखा जिसमे कुछ भी ना था 
    जैसे सोचा मुझे तूने और भुला भी दिया 
    मुझे पूछना है तुझसे गर इजाजत करो 
    बात करनी है तुझसे अगर हाँ तुम कहो 

    कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 
    यूँ ही वीरान से जज़्बों के ख़ाब में ना रहो 
    ख़ाब का क्या है आज है फिर ना होगा कभी 
    भूल जाना है एक दिन ख़ाबों को सभी 
    कुछ कहो, ..  कुछ तो कहो 

    Saturday, July 13, 2024

    ख़ुश्बू (नज़्म)

    रात की बात अंधेरों में फैल जाती है 
    धूप लेकिन किसी तारे में टिमटिमाती है 
    इसी तरह तेरी यादों के गाँव से अक्सर 
    तू नहीं पर तेरी ख़ुश्बू तो मिलने आती है 

    तेरी ख़ुश्बू में जाने क्या बात ऐसी रही 
    के वो अशरों के बाद भी ज़हन से जाती नहीं 
    अब तो आदत ही हो गई है और मेरे लिए 
    तुझे महसूस करना कोई बड़ी बात नहीं 

    किसके मानिंद है ख़ुश्बू तेरी मैं कैसे कहूँ 
    के कोई इत्र कोई फूल ऐसा मिल न सका 
    मुस्कराहट तेरे जैसी किसी को मिल ना सकी
    और दुनिया में कोई तेरे जैसा खिल न सका 

    Saturday, February 24, 2024

    लिफ़ाफ़े ( एक नज़्म )

    demo

    उनकी यादों के लिफ़ाफ़े को आज खोला है 
    कितनी प्यारी सी ये तस्वीर मिली है मुझको 
    जी में आता है के सारे वो लम्हे फिर से जिऊँ   
    क्या ख़बर कौन से पल ये नज़ारा छिन जाए 

    वो बिछड़ते नहीं तो आज ये दिन ना मिलता 
    उनकी यादों के इस सुहाने पल को जीने का 
    वो बिछड़ते नहीं तो ख़ाब में आते भी नहीं 
    चलो अच्छा ही हुआ वो बिछड़ गए मुझसे 

    कौन से तीर मार डाले मिल के लोगों ने 
    मैं तो खुश हूँ बिछड़ के भी आज दिलबर से 
    कभी तो दिल में ये आता है के बुला लूं उन्हें  
    फिर ख्यालों में ही उनके मैं डूब जाता हूँ 

    क्या ये होगा भी कभी वो ही चले आएंगे 
    दर पे दस्तक सी करेंगे या चले जाएंगे 
    जी मचलता है यही सोचकर जो आएं वो  
    क्या कोई बात बची भी है उन से कहने को 

    उनको शायद मेरे एहसास का पता भी नहीं 
    वो जो ख़ुश हैं तो मेरा दिल ख़ुशी में डूबा है 
    मैंने बरसों के बाद जाने क्यों दराज़ों से 
    उनकी यादों के लिफ़ाफ़े को आज खोला है

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...