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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Friday, January 19, 2024

कल-क़ता

मैं तो पीता हूँ आब जीने को 
और जीता हूँ शराब पीने को 
बोतलें जब मुझे पी लेती हैं 
शक्ल देता हूँ मैं नगीने को 

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कहता हूं लफ़्ज़ उसके, जिसने है डाली जान
दिल में आ जाती बातें, कह जाती है ये जुबां
कितना भी लिख, दीवारों पे, मिट जायेंगे ये निशान
मैं कम कहता हूं, लेकिन मेरी कुछ बातें तो मान

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कहते हैं बात अपनी हम अपनी इस क़ता से 
अक्सर सीखा है हमने ठोकर खाकर जहां से 
बैठे जब महफिलों में कहने को दिल की बातें 
वा-वाही लूटी हमने दर्दों की दास्ताँ से 

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आँखों से बोल देना दिल से कुछ सुन लेना
मेरे ख़यालातों से कुछ सपने बुन लेना 
लफ़्ज़ों की बंदिशों को अच्छी सी धुन देना 
दिल की धड़कन सुनते ही ये गीत चुन लेना 

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हाथों की रौशनी ने चेहरे को जगमगाया 
मैं सबको भूल बैठा तू मुझको याद आया 
वो सपना ही था शायद हाँ सपना ही था छाया 
तू सबको भूल बैठा मैं तुझको याद आया 

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Friday, January 12, 2024

कभी याद रखना कभी भूल जाना

समा वादियां दिल मुहब्बत फ़साना
ये बातें ज़रा तुम फिर आज़माना 
ज़रूरी नहीं है तुम्हारी परस्तिश 
कभी याद रखना कभी भूल जाना 

सितारों से लढ़ना बहारें लुटाना
अगर हार जाएँ निगाहें चुराना 
जो हारे हुए हों उन्हें भी जिताकर 
कभी याद रखना कभी भूल जाना 

वो दिन याद आते हैं जब ज़िन्दगी के 
वो लम्हे जिन्हें साथ रखना किसी के 
किसी बात पे बेवझा तिलमिलाना 
कभी याद रखना कभी भूल जाना 

जो कहता है दिल वो ज़ुबान बोलती है
है शायर का दिल कुछ कहाँ तोलती है
ज़रूरी नहीं इनको दिल से लगाना
कभी याद रखना कभी भूल जाना

Thursday, January 11, 2024

इन्सान

इन्सान... ज़ेहन से जो आवारा

ये खुद भी है कठपुतली

खुद इसे क्या पता


बेजान जिस्म में जो है जान

कहां से आती है

खुद इसे क्या पता


जाने क्या ढूंढता है दिल

किसकी ख्वाहिश में है शामिल

किन तलाशों में गुम है ये

खुद इसे क्या पता


ख़ुशी किसमें ये ढूंढे है

सुकूं किसको ये समझे है

कहीं मिलते भी हैं क्या ये

खुद इसे क्या पता


सांस आती और जाती है

जाने क्या कुछ करवाती है

जिंदगी किसको कहते हैं

खुद इसे क्या पता


ख़ुदा का नाम देता है

ख़ुदा का नाम लेता है

मगर खुद में क्या रखा है

ये इसे क्या पता

नज़र लग जाती है

नज़र से बच के ज़रा हां!! नज़र लग जाती है

कोई बेहद सी हुई बात

जब नज़र आती है


तेरे आग़ोश में आकार

और कुछ देर बहला कर

तुझको बेहोश कहला कर

वो सरक जाती है


नज़र से बच के ज़रा ...... 


कोई हमदम नहीं तो क्या

कोई मेहरम नहीं तो क्या

सांस ज़िंदा तुझे रखने 

तो चली आती है


नज़र से बच के ज़रा ...... 


कुछ यहां छुप नहीं सकता

तू छुपा कुछ नहीं सकता

मुश्क सौ तालों में तो क्या

वो महक जाती है

नज़र से बच के ज़रा ...... 


मैंने देखे हैं ऐसे दिल

लगते हमदर्द हैं क़ातिल

जो नज़र से लगा लें तो / (अक़्स गर देख ले उनकी)

नज़र लग जाती है - 3


नज़र से बच के ज़रा हां। … नज़र लग जाती है


Friday, May 12, 2023

दिलबर मेरा

मैं हूं जिसकी मिल्कियत
दिलबर मेरा वो आएगा
इक दिन मुझे आगोश में
लेकर मुझे सेहलाएगा

जब याद सी आने लगे
बातों से वो बहलाएगा

उसकी यादों में सदा
मैने संभाले हैं सिंगार
उसकी यादों में सदा
मेरे ये सावन बहार

सुनती हूं वो आएगा
डोली में लेकर जायेगा

वो आएगा या दूर से ही
पास अपने बुलाएगा?
मैं सोच कर ही सिहर उठी
वो कैसे क्या कर जायेगा

वो आएगा वो आएगा
पर कब तलक यूं रुलाएगा

ये है ज़िंदगी या वो ज़िंदगी
ये पता ही ना चला कभी

क्या पता है तुझको वो कौन है

आओ आज तुझको बता ही दूं
उसे मौत कहते हैं सभी

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Mai hun jiski milkiyat
Dilbar mera wo ayega
Ek din mujhe aagosh me
Lekar mujhe sehlayega
Jab yaad si aane lage
Baaton se wo behlaayega
Uski yaadon me sada
Maine sambhaale hain singaar
Uski yaadon me sada
Mere ye saavan aur bahaar
sunti hun ke woh ayega
Doli me le kar jaayega
Wo ayega ya dur se hi
Paas apne bulaayega
Mai soch kar hi sihar uthi
Wo kaise kya kar jayega 
Wo ayega wo ayega
Par kab talak yun rulaayega

#Usay maut kehte hain sabhi
#Par mere liye wohi zindagi
Ye hai zindagi ya wo zindagi
#Ye pata hi na chala kabhi
Kya pata hai tujhko wo kaun hai
Aao aaj tujhko bata hi dun
Usay maut kehte hain sabhi

Tuesday, November 29, 2022

तुमने भी शायद है मुझे याद किया

तेरा तस्सवुर फिर मुराद किया 
बेतहाशा ये बरसों बाद किया 
बेसबब बढ़ गई रफ़्तार दिल की 
तुमने भी शायद है मुझे याद किया 


Monday, November 28, 2022

सुनता हूँ तुझसे दूर हूँ बोहत

सुनता हूँ तुझसे दूर हूँ बोहत 
हालातों से मजबूर हूँ बोहत 
ज़माने को बड़ी फ़िक्र है मेरी
कहते जो हैं मग़रूर हूँ बोहत 

तेरे बारे में सुनता रहा 
इनके ख़ाबों को बुनता रहा 
बस तेरी मेरी दास्ताँ से ही 
इन गलियों में मशहूर हूँ बोहत 

तुम जाने कब ना जाने कहाँ 
मेरी दुनिया कहकर अलविदा 
मुझको भी अपने संग ले गए 
खुद मैं खुद से अब दूर हूँ बोहत 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...