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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Wednesday, February 14, 2024

तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए

इस तरह फ़ासलों से अकेले हुए 
क्या पता रात के कब अंधेरे हुए 
याद आते हैं तेरे वो वादे किये 
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

इन दिनों बारिशों का ज़माना नहीं 
कब बरस जाएँ लेकिन ठिकाना नहीं 
ग़म के बादल दिहाड़े घनेरे हुए 
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

कैसा मासूम था किसको मालूम था 
उन लिफाफों में कैसा वो मजमून था 
बस बताने की ख़ातिर बसेरे हुए 
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

हमसे मिलने लगे तुम तो खिलने लगे 
बात ही बात में हमसे खुलने लगे 
क्या बताएं के कैसे लुटेरे हुए 
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

हाँ रहा मैं तेरे आसतीनों में भी 
ग़म के दिन और सालों महीनों में भी 
सांप गर मैं हुआ तुम संपेरे हुए 
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

फिर कहानी वही और रवानी वही 
तुझसे रुसवाइयों से वीरानी वही 
जाने कितने ही जन्मों के फेरे हुए 
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

क्या सुनें ना सुनें और कहें ना कहें 
और कितने बहाने तेरे हम सहें 
अब तो ख़ामोशियाँ ही हैं घेरे हुए  
तुम तो मेरे ही थे पर न मेरे हुए 

कुछ सही कुछ नहीं !!

देखता हूँ, आंकता हूँ, बोलता हूँ 
कुछ सही कुछ नहीं 
तुम ये रंगत कहाँ तक ही ले जाओगे?

बेचता हूँ, ठैरता हूँ, बोलता हूँ 
कुछ सही कुछ नहीं 
अपनी शोहरत को कब तक यूँ सेहलाओगे?

तोलता हूँ, मोलता हूँ, बोलता हूँ 
कुछ सही कुछ नहीं 
अपनी दौलत से खुद को क्या नेहलाओगे?

ताकता हूँ, घूरता हूँ, बोलता हूँ 
कुछ सही कुछ नहीं 
अपनी हरकत से तुम बाज़ कब आओगे?

रेख़्ता हूँ, फेकता हूँ, बोलता हूँ 
कुछ सही कुछ नहीं 
मेरी मोहलत से कब तक यूँ घबराओगे?

कोसता हूँ, रोकता हूँ, बोलता हूँ 
कुछ सही कुछ नहीं 
अपनी सूरत से कब तक यूँ शर्माओगे?

सेंधता हूँ, खोलता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं 
ऐसी लानत से बचकर कहाँ जाओगे?

तानता हूँ, ओढ़ता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं 
ऐसी फुर्सत के पल तुम कहाँ पाओगे?

मांजता हूँ, रेतता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं 
क्या वो जन्नत उठाकर यहाँ लाओगे?

छीनता हूँ, लूटता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं 
अब ये बरकत के गाने कहाँ गाओगे?

बेलता हूँ, सेकता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं 
इसकी क़ीमत मुझे तुम क्या दिलवाओगे?

Tuesday, February 13, 2024

मिलेंगे

बोहत शोर है यहाँ, कहाँ सन्नाटे मिलेंगे 
फूलों की ख़ाहिशों में, यहाँ कांटे मिलेंगे 

रुलाते मिलेंगे, मुस्कुराते मिलेंगे 
तुझे नींद के मसीहा भी जगाते मिलेंगे 

दावों की क़तारों में, तुझे घाटे मिलेंगे 
हटाते मिलेंगे, तुझे भुलाते मिलेंगे 

तू टूट जाए ऐसे, तुझे दावे मिलेंगे 
हमदर्द तेरे हँसते, और हंसाते मिलेंगे 

ये दुनिया है भई दुनिया, यहाँ सारे मिलेंगे 
कुछ आते मिलेंगे, तो कुछ जाते मिलेंगे 

ए दोस्त, चल कभी तो तुझसे, आके मिलेंगे 
घडी के कांटे मिलेंगे, हम मिलाते मिलेंगे 

मौसम

लो आ गया, लो आ गया मौसम 
प्यार की तरह छा गया मौसम 
कितने अर्से से बाट देखी थी 
दिल में ठंडक दिला गया मौसम 

बात बनती न थी न आने से 
बात बनती न थी न जाने से 
आने जाने की उलझनों में ही 
घाव कितने भुला गया मौसम 

लो आ गया लो आ गया मौसम 
बाग़ बिखरे खिला गया मौसम 
फूल की खुशबुएँ बिखेर यहाँ 
दिल की धड़कन बढ़ा गया मौसम 

जब न आया था याद आती थी 
कितने मंसूबे ये बनाती थी 
ये है मेहमान कुछ महीनों का 
फिर कोई आएगा नया मौसम 

लो आ गया लो आ गया मौसम 
याद किसकी दिला गया मौसम 
आँख से आंसुओं ने बारिश की 
हँसके आया, रुला गया मौसम 

Monday, February 12, 2024

वस्ल

मेरे नसीब ने यूँ क़र्ज़ मिलाये होंगे 
मौसम-ए-वस्ल तभी वक़्त पे आये होंगे
             ...... (मौसम-ए-वस्ल = जुदाई का मौसम)
मैं तो अब भूल चुका भूल चुका हूँ शायद 
तेरे एहसास ने ये दर्द संभाले होंगे 

तेरी यादों में मैंने आसमाँ से बातें की 
तेरे तो दिन थे मगर अपनी मैंने रातें की
देख गिन रखे हैं फलक पे बता देता हूँ
रात से सुबह तलक कितने सितारे होंगे 

इक दफा झूठ ही कह देते कि मैं ग़ैर नहीं 
प्यार अब भी है तुझे मुझसे कोई बैर नहीं 
किया हलाल सर-ए-आम किसी के दिल को 
तू बता दे के ऐसे कितने नज़ारे होंगे 


Sunday, February 11, 2024

शराब

मैं तो पीता हूँ आब जीने को
और जीता शराब पीने को
बोतलें जब मुझे पी लेती हैं
शक्ल देता हूँ मैं नगीने को 

भीड़ इतनी भी ना करो मिलकर 
सांस थोड़ी मुझे भी, जीने को

जब तलक मौत ख़ुद नहीं आती 
किसने देखा है ख़ुद सक़ीने को ...... (सक़ीना = शांति)

वो तो कहता है तू ज़हीन कहाँ ...... (ज़हीन = प्रतिभावान)
कोई समझाए इस कमीने को 😁

मैं तो पीता हूँ आब जीने को
और जीता शराब पीने को
बोतलें जब मुझे पी लेती हैं
शक्ल देता हूँ मैं नगीने को 

ख़याल मेरे

कहीं तो ले चलो ख़याल मेरे 
कोई न ले जहां बयान मेरे 
ऐसा भी तो कोई मंज़र हो 
जवाब उनके हों सवाल मेरे 

किन चराग़ों की बात करते हो 
ये नहीं ये नहीं मक़ान मेरे 

सुर्ख़ कलियों ने हमसे ये पूछा ....... (सुर्ख़ = लाल)
कैसे लगते हैं ये जमाल मेरे ....... (जमाल = सुंदरता)

वो ज़माने भी याद आते हैं 
रुख़ पे रखते थे वो गुलाब मेरे 

लूट कर कैद कर लिया इन ने ....... (इन ने = इन्होंने)
नैन लगते हैं ये इजाज़ तेरे ....... (इजाज़ = चमत्कार)

ये न पूछो कि मेरे क्या तुम हो 
ज़िन्दगी हो मेरे जहान मेरे 

ऐसा भी तो कोई मंज़र हो 
जवाब उनके हों सवाल मेरे 

कहीं तो ले चलो ख़याल मेरे 
कोई न ले जहां बयान मेरे 
ऐसा भी तो कोई मंज़र हो 
जवाब उनके हों सवाल मेरे 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...