उन लिफाफों में कैसा वो मजमून था
बात ही बात में हमसे खुलने लगे
देखता हूँ, आंकता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
तुम ये रंगत कहाँ तक ही ले जाओगे?
बेचता हूँ, ठैरता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
अपनी शोहरत को कब तक यूँ सेहलाओगे?
तोलता हूँ, मोलता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
अपनी दौलत से खुद को क्या नेहलाओगे?
ताकता हूँ, घूरता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
अपनी हरकत से तुम बाज़ कब आओगे?
रेख़्ता हूँ, फेकता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
मेरी मोहलत से कब तक यूँ घबराओगे?
कोसता हूँ, रोकता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
अपनी सूरत से कब तक यूँ शर्माओगे?
सेंधता हूँ, खोलता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
ऐसी लानत से बचकर कहाँ जाओगे?
तानता हूँ, ओढ़ता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
ऐसी फुर्सत के पल तुम कहाँ पाओगे?
मांजता हूँ, रेतता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
क्या वो जन्नत उठाकर यहाँ लाओगे?
छीनता हूँ, लूटता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
अब ये बरकत के गाने कहाँ गाओगे?
बेलता हूँ, सेकता हूँ, बोलता हूँ
कुछ सही कुछ नहीं
इसकी क़ीमत मुझे तुम क्या दिलवाओगे?
बोहत शोर है यहाँ, कहाँ सन्नाटे मिलेंगे
फूलों की ख़ाहिशों में, यहाँ कांटे मिलेंगे
रुलाते मिलेंगे, मुस्कुराते मिलेंगे
तुझे नींद के मसीहा भी जगाते मिलेंगे
दावों की क़तारों में, तुझे घाटे मिलेंगे
हटाते मिलेंगे, तुझे भुलाते मिलेंगे
तू टूट जाए ऐसे, तुझे दावे मिलेंगे
हमदर्द तेरे हँसते, और हंसाते मिलेंगे
ये दुनिया है भई दुनिया, यहाँ सारे मिलेंगे
कुछ आते मिलेंगे, तो कुछ जाते मिलेंगे
ए दोस्त, चल कभी तो तुझसे, आके मिलेंगे
घडी के कांटे मिलेंगे, हम मिलाते मिलेंगे
लो आ गया, लो आ गया मौसम
प्यार की तरह छा गया मौसम
कितने अर्से से बाट देखी थी
दिल में ठंडक दिला गया मौसम
बात बनती न थी न आने से
बात बनती न थी न जाने से
आने जाने की उलझनों में ही
घाव कितने भुला गया मौसम
लो आ गया लो आ गया मौसम
बाग़ बिखरे खिला गया मौसम
फूल की खुशबुएँ बिखेर यहाँ
दिल की धड़कन बढ़ा गया मौसम
जब न आया था याद आती थी
कितने मंसूबे ये बनाती थी
ये है मेहमान कुछ महीनों का
फिर कोई आएगा नया मौसम
लो आ गया लो आ गया मौसम
याद किसकी दिला गया मौसम
आँख से आंसुओं ने बारिश की
हँसके आया, रुला गया मौसम
मेरे नसीब ने यूँ क़र्ज़ मिलाये होंगे
मौसम-ए-वस्ल तभी वक़्त पे आये होंगे
...... (मौसम-ए-वस्ल = जुदाई का मौसम)
मैं तो अब भूल चुका भूल चुका हूँ शायद
तेरे एहसास ने ये दर्द संभाले होंगे
तेरी यादों में मैंने आसमाँ से बातें की
तेरे तो दिन थे मगर अपनी मैंने रातें की
देख गिन रखे हैं फलक पे बता देता हूँ
रात से सुबह तलक कितने सितारे होंगे
इक दफा झूठ ही कह देते कि मैं ग़ैर नहीं
प्यार अब भी है तुझे मुझसे कोई बैर नहीं
किया हलाल सर-ए-आम किसी के दिल को
तू बता दे के ऐसे कितने नज़ारे होंगे
मैं तो पीता हूँ आब जीने को
और जीता शराब पीने को
बोतलें जब मुझे पी लेती हैं
शक्ल देता हूँ मैं नगीने को
भीड़ इतनी भी ना करो मिलकर
सांस थोड़ी मुझे भी, जीने को
जब तलक मौत ख़ुद नहीं आती
किसने देखा है ख़ुद सक़ीने को ...... (सक़ीना = शांति)
वो तो कहता है तू ज़हीन कहाँ ...... (ज़हीन = प्रतिभावान)
कोई समझाए इस कमीने को 😁
मैं तो पीता हूँ आब जीने को
और जीता शराब पीने को
बोतलें जब मुझे पी लेती हैं
शक्ल देता हूँ मैं नगीने को
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...