मैं ये सुनता हूँ के इंसान में सब होता है
फिर जो खोता है यहाँ खुद से ही सब खोता है
बेसबब फिरता है दुनिया की तलब गारी में
फिर ये होता है के दुनिया का ही सब होता है
पहले आदाब से तस्लीम रवायत में रहे
फिर ये होता है के ख़ुद से ही अदब होता है
दिल तो बेहिस की तरह कल पे टला रहता है
फिर ये होता है के कल आज से अब होता है
ऐसा लगता है के सब दुनिया को 'ज़ाहिर' कर दूँ
फिर ये होता है के रोने का सबब होता है
फिर किसी खोज में निकले है कहीं पर तनहा
फिर ये होता है के खुद में ही वो रब होता है

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