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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Monday, November 14, 2022

लेकिन तेरे खतों का इंतज़ार है मुझे

तुझको भुला दिया ये ऐतबार है मुझे 
लेकिन तेरे खतों का इंतज़ार है मुझे 

ग़ाफ़िल हूँ क़ायनात से फिरता हूँ दर-बदर 
शायद तेरी आँखों से बोहोत प्यार है मुझे 

कहते हैं दुआओं का असर काम आएगा 
क़ुरबत भी तो यारों की अब नाचार है मुझे 

सोचा था तेरी याद को ख़ाबों में दूँ मज़ार 
आँखों में बसी नींद भी बेदार है मुझे 

कहती है ज़ुबाँ दिल की ज़रा दिल से काम ले 
मैं जानता हूँ दिल पे अख्तियार है मुझे 

Monday, November 7, 2022

मेरे ख़ुदा तू ही बता (Geet)

किसे बताएं के क्या हो रहा अपने संग वाक्या
कोइ छुअन सी लगे जब भी चलती है कभी हवा
किसी को देखने लगे हैं हम जब देखें आइना

मेरे ख़ुदा ऐ ख़ुदा खुद आ के तूही बता
तू ही बता क्या इस रोग की होती है कहीं दवा

बेवजह है धड़कनों का ये कैसा सिलसिला 
लगता के शिद्दतों से है किसी ने याद किया 
किसी तरह से चले पता के ये क्या है माजरा 

मेरे ख़ुदा ऐ ख़ुदा खुद आ के तूही बता
तू ही बता क्या इस रोग की होती है कहीं दवा

नाही लिखना कोई पैग़ाम ना ही नाम किसी का 
किसी अलफ़ाज़ पे कारीगरी कर देते क्यों हैं मिटा 
कोई फ़रियाद नहीं अब याद माँगूँ ना कोई दुआ  

मेरे ख़ुदा ऐ ख़ुदा खुद आ के तूही बता
तू ही बता क्या इस रोग की होती है कहीं दवा

Saturday, November 5, 2022

जाने क्यूँ ऐसा ही होता है


जाने क्यूँ ऐसा ही होता है अपना मंज़र
मिलना पड़ता है उन्हें जो नहीं होते हम-सर

ज़िन्दगी लाती है किस्मत में हमारी उनको
जो नहीं होते अपनी किस्मत में अक्सर 

जिसकी शिद्दत से होती है रौशनी दिल में
वो बुझा जाता है चराग़-ए-दिल अक्सर 

मिलना जुलना तो होता ही है तुममे मुझमें 
दिल कहीं होता है, होता है कहीं पर पैकर 

दिल में रहते तो हो क़िस्मत में भी लाकर देखो 
क्या पता उड़ना जो चाहो तो निकल आएं शहपर 

ख़ुशनुमा गीत अब गाना शुरू तुम कर दो 
कोई उदास सा हो जाता है ये हमसे कहकर 

ज़िन्दगी लाती है किस्मत में हमारी उनको
जो नहीं होते अपनी किस्मत में अक्सर 

Thursday, November 3, 2022

क्या पता उनको

अब तो यादों में खाब सीते हैं क्या पता उनको कैसे जीते हैं

ये पता था के वो ना आयेंगे

इंतेज़ार फिर भी करते जीते हैं 


रात की बात क्या बताऊँ तुम्हें 

बेकरारी में दिन भी बीते हैं 


सब्र की हद तो कब की लाँघ चुके

कहते हैं लम्हें चंद बीते हैं 


क्या वो कहते हैं इसको तन्हाई 

भीड़ में ग़म के आँसू पीते हैं 


अब तो यादों में खाब सीते हैं

क्या पता उनको कैसे जीते हैं


Friday, October 28, 2022

Yeh kya ehsaas hai (ये क्या एहसास है)

ये क्या एहसास है

के तू मेरे पास है

यूं तो एहसास हैं अनगिनत

मगर ये खास है


ये क्या एहसास है

ज़मीं आकाश है

हवाओं में तेरी ख़ातिर

कोई विश्वास है


ये क्या एहसास है

क्यूं तेरी आस है

तुझे क्या याद अब हूँ मैं

ये कैसी प्यास है


ये क्या एहसास है

जो अब तक काश है

क्यू मेरी सांसों मे उल्झी तेरी ये सांस है

Tuesday, March 22, 2022

ज़िंदगी तो इक सफ़र है

ज़िंदगी तो इक सफ़र है हर सफ़र है मुख़्तसर 

ना करो शिक़वा शिक़ायत हम सभी हैं हमसफ़र


हर किसी की ज़िंदगी में हो भले इक सी डगर

हर सफ़र की हर डगर में मुख़्तलिफ़ सा है असर


वो नज़र भी क्या नज़र है जो मिलाए ना नज़र

वो क़दम भी क्या क़दम हैं जो बढ़ाये ना क़दम 

किसको सिखलाने चले हो कौन है मुजरिम तेरा 

खुद को आइना दिखा ले खुद से हो जा हम-नज़र


लोच सा रिश्तों में रखना कर अहम को अलविदा

बांध कर रिश्तों को रखना न रहे कोई कसर

कह जो तेरे दिल में है दिल को छुपाना ना कभी

क्या पता किस पल में खो जायेगा तेरा हमसफ़र


तल्ख़ियाँ उठती हैं बेशक उठ के फिर जाती भी हैं

रोक लो ख़ुद को कभी जब तल्ख़ियों का हो असर

ना करो लहरों से बातें जब भी हो दिल में भंवर

वरना पछताना पड़ेगा तुमको गोया उम्र भर 


ज़िंदगी में हर किसी के नज़रिए की बात कर

हर कहानी सीख ये देती है के बस प्यार कर

यूं तो हर जज़्बा हर एक हरकत है खुद में फ़लसफ़ा 

तजरुबा जो मेरा पूछो प्यार ही है कारगर


हर बेहेर की ज़िन्दगी है सोचने की मोहलतें 

हर ज़हन की ज़िन्दगी है तजरुबों की दौलतें 

सुन के चंद शेरों को वाहवाई मिली तो क्या विवेक 

दिल धड़कता है तो समझो बन गई अपनी ग़ज़ल 


ज़िंदगी तो इक सफ़र है हर सफ़र है मुख़्तसर 

ना करो शिक़वा शिक़ायत हम सभी हैं हमसफ़र

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...