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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Thursday, November 7, 2024

ताल

Bahr: 
  • 2122
  • 1122
  • 112
  • इस क़दर वक़्त है मसरूफ यहाँ 
    वक्त को खुद ही नहीं वक्त मिला 
    सबको देते हो जो भी मांगे तुझे
    ऐसा क्या था जो तुझे भी न मिला

    आँख किसकी मिली पहले क्या पता 
    हाल क्या पूछते हो दिल का मेरे 
    चैन तुझको न मिला मान लिया 
    तेरी सौगंध मुझे भी न मिला 

    दिल से गर दिल कि सदा मिल न सकी 
    दोस्त कैसे तु बनायेगा बता 
    दोस्त साज़ों की तरह हैं ये तेरे 
    साज़ के ताल से तू ताल मिला 

    Wednesday, November 6, 2024

    उर्दू

    जानी अनजानी सि नज़रों से यूँ गुज़रता रहा 

    शख्सियत अपनी बनाने को मैं बिखरता रहा 

    कैसे करता मैं सवाबों की बात उनसे भला 

    शख्स हर एक यहाँ मैं मेरा ही करता रहा 

    [सवाब = charity]


    सोचता हूँ मुझे शहरों में ज़िन्दगी क्या मिली 

    जीते रहने की वक़ालत में रोज़ मरता रहा 


    मुझको माज़ी की कोई बात याद आई तो मैं 

    रास्तों पे कभी चलता कभी ठहरता रहा 

    [माज़ी = past]


    ज़िन्दगी की बड़ी उलझन को भूल कर वो ग़ज़ल 

    उम्र भर मौत से दिन रात बात करता रहा 

    [ग़ज़ल = Deer stuck in the bush]


    सांस लेकर ग़मों को पी गया था मैं तो कभी 

    छोड़ कर सांस ग़मों से मैं फिर उबरता रहा 


    घर कि उम्मीद सभाले हदें वतन कि कहो 

    कशमकश में पड़ा उर्दू खुदी से लड़ता रहा 

    [उर्दू = army camp]

    Monday, November 4, 2024

    अँधेरा

    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है 
    उजाला बेवफ़ा सा है कभी ज़्यादा कभी कम है 

    अँधेरा दिन नहीं होता अँधेरी रात होती है 
    उजाला देखने दिखलाने वाली ज़ात होती है 

    अंधेरों में कोई ज़्यादा नहीं कोई कहीं कम है 
    अंधेरों में न कोई तल्खी ना ही शोख परचम है 
     
    न जाने ढूंढते फिरते हैं क्या सब इन उजालों में 
    जवाबों की ख्वाहिशों में पड़े रहते सवालों में 

    अँधेरे को मिटा दे ये चराग़ों में कहाँ दम है 
    ये आबादी उजालों की अंधेरों से बोहोत कम है 

    अंधेरों ने मुझे चुपके से कानों में बताया है 
    के देखो इन उजालों ने हौसलों को चुराया है 

    उजालों ने कहाँ किसको कभी जीना सिखाया है 
    उजालों की चका चौंधों ने सबको बस रुलाया है 

    उजालों ने ज़िन्दगी में सभी को अक्सर तोड़ा है 
    अंधेरों ने कहीं चुपके से उनको फिर से जोड़ा है 

    अँधेरा था अँधेरा है अँधेरा ही रहेगा 
    उजाला जब भी थक जाए तो अँधेरा बहेगा 

    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है अँधेरा 
    अँधेरा है तो क्या ग़म है अँधेरा ही तो हमदम है 

    Wednesday, October 23, 2024

    इजाज़त

    Behr (1222 1222 122)

    इजाज़त हो ज़रा जी कर के देखूं 
    अदा अपनी पुरानी कर के देखूं 
    हैं दिलकश तेरी नज़रों के नज़ारे 
    ये दिल चाहे तुझे जी भर के देखूं 

    न जाने क्या हुआ मेरी नज़र को 
    तेरे ये होंट गुल अख़्तर के देखूं 
    [गुल अख्तर = Bright ornamental flower]

    तेरी उल्फ़त बड़ी या मेरी उल्फ़त 
    मैं तुझसे इक दफ़ा लड़ कर के देखूं 
    [उलफ़त = affection]

    न मिल पाया ख़ुदा तो सोचा मैंने 
    ख़ुद अपना ही ख़ुदा बन कर के देखूँ 

    तिरे ज़ख़्मों को रखा है संभाले 
    कहीं तू डर ना जाए डर के देखूं 

    अँधेरा मन में हो रखा है कब से 
    जला के ख़ाब उजाला कर के देखूं 

    करो तजरी के आफ़त हर जघा है 
    कहो दुनिया के देखूं घर के देखूं 
    [तजरी = prioritization]

    परस्तिश की अहम की कुछ ना पाया 
    ज़रा ख़ुद से जुदा हो कर के देखूं 
    [परस्तिश = worship]

    धरम मज़हब की बातें एक सी हैं 
    जनेऊं ताविज़ों में भर कि देखूँ 

    कहाँ जन्नत कहाँ दोज़ख़ खड़े हैं 
    यक़ी करने को मैं भी मर के देखूं 
    [जन्नत = heaven, दोज़ख़ = hell]

    Wednesday, October 16, 2024

    साहब

    Behr (2122 1122 1122 22)

    सोचना जब भी क़दम कोई उठाना साहब
    लौट के आता नहीं गुज़रा ज़माना साहब

    फिर न पूछो के पता मेरा नहीं है कोई 
    भूलने दो ना मुझे मेरा ठिकाना साहब 

    कुछ मिला ही नहीं खाबों में उन्हें पाने से
    अब तो बेहतर है उन्हें भूल ही जाना साहब

    कुछ तो नग़मे हैं के जिनमें हैं सुहानी यादें
    फिर चला देना मिरा गाना पुराना साहब

    खुद मिली हो जो सज़ा याद कहाँ आती है
    भूल जाता हूं ज़रा मुझको डराना साहब 

    हैं निगाहें भरी महफ़िल में वजाहत पर ही
    आप साहब हैं सभी ने ये कहा ना साहब

    दो निवाले थे हमारी भी निगाहों में कभी 
    पर अब अच्छा नहीं लगता है ये खाना साहब

    मुझको आगे नहीं ला सकते हो तो मत लाना
    कम से कम पीछे तो मुझको ना गिराना साहब
     
    चोट लग सकती है शायर को ज़रा हौले से
    इतना आसाँ नहीं कोई वज़्न गिराना साहब

    Wednesday, October 9, 2024

    माँ

    Behr (2122 1212 22)

    ममता 
    ====
    पूछता था किसी से कल कोई 
    क्या है आखिर ये मेहरबाँ होना 
    दिल ने तस्वीर ये तसव्वुर की
    माँ के पल्लू का आसमाँ होना 

    पूजा 
    ===
    गर इबादत का है तरीक़ा के
    रूह को खुद है राब्ता होना 
    क्यों है दरकार फिर इबादत में
    बेग़रज़ कोई दरमियाँ होना

    सच्चाई 
    ====
    बात झूठी तो अच्छी लगती है
    तुम को मंज़ूर था गुमाँ होना
    बात क्या मैंने एक सच कह दी
    लाज़मी था तेरा जुदा होना

    प्यार
    ===
    प्यार की गुफ़्तगू में है मुमकिन 
    चंद लफ़्ज़ों का पास ना होना 
    उनसे मिलने के ऐन मौक़े पर 
    खुद जुबां का ही बेज़ुबाँ होना 
     
    सियासत 
    ======
    मुल्क बनते हैं जो बिगड़ने से 
    उनका बेहतर है ख़ात्मा होना 
    क्या ये सोचा भी है कभी तुमने 
    कैसा लगता है बे मकाँ होना 

    नसीहत 
    =====
    जाओ एक बार आइना देखो 
    छोड़ दो खुद से बे इमां होना 
    कैसे मंज़ूर है तुझे ऐसे 
    दौड़ते खून का थमा होना 
     
    ध्यान
    ====
    एक ज़रिया है ध्यान का ये भी  
    जिस्म से इस तरह जुदा होना 
    डूबना है तुझे ख़यालों में 
    जैसे शायर का गुमशुदा होना

    Monday, October 7, 2024

    झूठा नहीं है

    Behr (1222 1222 1222 122)

    ग़ज़ल कहता हुआ शायर अभी फूटा नहीं है 
    है उसका दिल अभी मायूस वो टूटा नहीं है 
    समझना है नहीं आसां उसे मैं जानता हूँ 
    वो उलटी बात कहता है मगर झूठा नहीं है 

    उधेड़ो मत मेरे रिश्तों की गांठें इस क़दर तुम 
    मेरी मानो अभी इतना भी वो छूटा नहीं है 
    मुझे लगता नहीं वाजिब उसे तोहमत लगाना 
    मैं खुद ही लुट गया उसने मुझे लूटा नहीं है 

    ये सच है के मुझे मुमकिन नहीं मंज़ूर करना 
    किसी में भी यहाँ इतना तो बल बूता नहीं है 
    जो मैं मंज़ूर ना हूँ तो भी मुझको देख लेना 
    फ़क़त शादाब की खातिर ये अंगूठा नहीं है 

    उखड़ तो वो भी जाएगा किसी दिन ज़लज़ले में 
    रहा हो ता उमर ऐसा कोई खूंटा नहीं है 
    ये दुनिया झूठ है जैसे कोई सपना सुहाना 
    यहाँ कुछ सच नहीं है और कुछ सच्चा नहीं है 

    वो गुड्डी आसमानों में ही उड़ना चाहती है 
    परेतों में मगर उसके अभी सूता नहीं है 
    मिलेगी इंतहा ए लल्कारें उसको इस जहाँ में 
    मगर अच्छा है के उस से जहाँ रूठा नहीं है 

    ये नज़रें खैंचते हो क्या ये लहज़ा लाज़मी है 
    कोई सोचो तेरी महफ़िल में क्यूँ आता नहीं हैं 
    तसव्वुर खाब की बातें तुम्ही क्या जानते हो 
    उन्हें भी खाब आते हैं जिन्हें दिखता नहीं हैं 

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...