रात दिन दर-ब-दर ऐलान नहीं चाहिए
मुश्किलें हल करो ज़बान नहीं चाहिए
मुश्किलों को अगर शैतान हटा सकता है
दे दो शैतान ये भगवान नहीं चाहिए
जाओ कह दो हुकूमत से सईबी से उधर
हमको अब राह बर नादान नहीं चाहिए
मैं तो आता हूँ तेरा हक़ दिलाने को तुझे
मुझे हक़ दो मेरा, निशान नहीं चाहिए
ये कैसी चाहतें हैं पर्बतों की अब तुमको
चाहिए चोटी पर ढलान नहीं चाहिए
गलतियां होती हैं इंसान हो मशीन नहीं
गलतियां ठीक करो बयान नहीं चाहिए
पेड़ पानी भी लाएगा, हरियाली भी
मुझे अब तरफ मक़ान नहीं चाहिए
मशीनों से करोगे क्या ही रिश्ते दारियाँ
मशीनें हैं इन्हें इंसान नहीं चाहिए
जिन मकानों की बड़ी बात करते हो अक्सर
उन मकानों को मेहमान नहीं चाहिए
हम पसीने में तपे जाते हैं महलों के लिए
कुछ निवाले दो आसमान नहीं चाहिए
तौर जिस दिन मेरा मुझसे जुदा हो जाएगा
जिस्म में तब मुझे ये जान नहीं चाहिए

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