कोशिशों पर भी ये तकदीर तो बदल ना सकी
आग को घर भी बनाया मगर ये जल ना सकी
सबक़ पढ़ा था संभलने का मगर हम क्या करें
हम अपनी हद में रहे पर हदें संभल ना सकी
ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...
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