कुछ बातें
तो रह जाती हैं बातों में
जो खुद से ही
कभी कहते हैं रातों में
धुंधली सी
आँखों की बरसातों में
कुछ बातें
झूमती हैं हवाओं में
रह जाती हैं कुछ बातें
कह जाती हैं कुछ रातें
और हम तो बस तुझको ही हैं दोहराते
दोहराते ...... दोहराती हैं कुछ बातें
कुछ बातें
याद आती सन्नाटों में
मुझे पागल
बना जाती जज़्बातों से
बड़ी उलझन
शिकस्तों से और मातों से
हैं कुछ बातें
अटक जाती हैं नातों मे
हारना तो नहीं मुझे
जीतना भी नहीं मुझे
तो कैसे मैं कहूँ तुझे
कि आ जा रे ...... तू आ जा रे, सुना जा रे
तेरी ऐसी ... ही ... कुछ बातें ... कुछ बातें

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