खुली जो आँख तो धुंधला सा इक नज़ारा था
इक नये नाम से किसी ने तो पुकारा था
कौन हूँ मैं ये शायद मुझे मालूम था तब
सामने मेरे मगर दस्तूर का निवाला था
कोई तल्ख़ी ना थी मुझको कोई रंजिश भी ना थी
इनसे वाक़िफ़ हुआ जब आईना सम्भाला था
मेरी चाहत ना थी कुछ ना ही आरज़ू थी कोई
इस ज़माने ने मुझे जान के बिगाड़ा था
बेतुकी बात है लेकिन ये रात ख़्वाबों में
देखा कांधों पे मेरे ख़ुद मेरा जनाज़ा था

Wah !!
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