इन्साफ़ ज़ुल्म को जो कभी तोलता न हो
जो देख ले कभी तो ज़ुबाँ खोलता न हो
खुदगर्ज़ कितना है ये जो इंसान सोचना
ऐसा ख़ुदा बनाया के जो बोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...
दिन रात खेत में जो पसीने से तर हुआ
उसको कोई मिला नहीं जो मोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...
बच्चों कि बात तब हि तलक रास आती है
जब तक वो अपनी बात सफ़ा बोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...
हमराज़ वो ही आखरी दम तक जो कारगर
मर जाए अपने राज़ कहीं खोलता न हो || खुदगर्ज़ कितना...
इन्साफ करे ऐसा कोई भी नहीं मिला
ग़म और ख़ुशी जो एक साथ घोलता न हो ||
'ज़ाहिर' कभी हुआ ही नहीं शर्तिया यहाँ
कोयल सी हो आवाज़ मगर वो लता न हो ||

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