Bahr: 1222-1222-122
मेरा कहना अभी खलता नहीं है
कोई मुझसे यहां जलता नहीं है
किसी से कल कोई ये कह रहा था
पुराना नोट अब चलता नहीं है
ये किन राहों पे है निकला ज़माना
के सूरज शाम को ढलता नहीं है
ये कैसा आदमी बेदर्द है के
लगी है चोट पर मलता नहीं है
पुराना ही तो कहलायेगा मुझसा
हवा के साथ जो चलता नहीं है
मगर अब तक नहीं बदला वो ये के
कभी दिन मौत का टलता नहीं है
दफ़न होकर जिसम पिघला तो है पर
न जाने क्यूँ ये दिल गलता नहीं है

No comments:
Post a Comment