बे बूझ सवालों में हूँ कब से फँसा कहूँ
आता नहीं समझ के किसे बे तुका कहूँ
इतने हैं रहनुमा यहाँ के सोचता हूँ मैं
किससे मैं आँख फेर लूँ किसको ख़ुदा कहूँ
ग़म दिल में बस रहा है और दिल पे बस नहीं
ख़ुद को मैं दिल शुदा कहूं के ग़म शुदा कहूँ
कितना क़रीब है तू मेरे क्या कहूँ मैं अब
बातों ने तेरी मुझको है कितना छुआ कहूँ
जीता हूँ मैं यहाँ कभी मरने के लिए ही
कितना मैं जी चुका कहूँ कितना मरा कहूँ
आँखें तलाशती हैं कोई ख़ुद सा अजनबी
कब तक मैं आइने को भला अब बुरा कहूँ
अफ़्सुर्द हाल दिल का हुआ बाद तेरे मैं
घायल हुआ हूँ कितना मैं कितना बँटा कहूँ
करता हूँ शौक़ से मेरी बर्बादी का हिसाब
लूटा है तूने कितना मैं कितना लुटा कहूँ
जिस बात का था डर मुझे उसके उलट हुई
शुक्रे ख़ुदा कहूँ इसे माँ की दुआ कहूँ
चुभती थी तेरी याद तेरे प्यार की सदा
दिल टूटने पे था मेरा कितना दुखा कहूँ
बादल की शक्ल अश्क़ भी आँखों में आ गये
कितना है इसमें कोहरा तो कितना धुआँ कहूँ
यारों ने तेरे नाम से ताने बहुत दिये
कल रात बज़्म में हुआ कितना मज़ा कहूँ
'ज़ाहिर' को मैं सुनाऊँ ग़ज़ल या क़ता कहो
क्या क्या नहीं है तुझपे लिखा क्या यहाँ कहूँ

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