असली शायर: फ़हमी बदायूनी
ये माना के तुमने संभाला मुझे
मेरी ज़ुल्मतों से निकाला मुझे
महरबाँ मगर मैं परेशान हूँ
बहुत चुभ रहा है उजाला मुझे
[जुलमत = darkness]
हरा लाल नीला गुलाबी नहीं
कोई ला के दे रंग काला मुझे
फ़िसलता चला जा रहा था कहीं
तभी मुश्किलों ने संभाला मुझे
मैं करता भी कैसे नवाज़िश वहाँ
के नज़रों ने ही मार डाला मुझे
[नवाज़िश = appreciate/respect]
चमकता था सिक्के की मानिंद मैं
तभी तक सभी ने उछाला मुझे
[मानिंद = like something, की तरह ]
वो कहता रहा मैं भी सेहता रहा
अरे बुत बनाकर उबाला मुझे
[बुत = statue/frozen]
मैं 'ज़ाहिर' हूँ बेबस करूँ शायरी
नहीं चाहिए कोई हाला मुझे
[हाला = शराब]

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