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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Friday, April 19, 2024

प्यास आँखों की

तेरी यादों को कुछ ऐसे हम छुपा लेंगे 
तेरे ख़यालों से अपना रिश्ता निभा लेंगे 
तू नहीं सामने तो भी ऐसा क्या बिगड़ता है 
प्यास आँखों की आंसुओं से हम बुझा लेंगे 

सब्र कर लेंगे क़यामत का और क़िस्मत का 
तुझको ऍ दोस्त हम दोस्ती सिखा देंगे 

राह में तेरी हम ऐसे मुंतज़िर होंगे 
दिल को धड़कते ही रहने की हम सज़ा देंगे 

आईना उम्र की दहलीज़ें जब दिखाएगा 
घर से अपने हम हर आईना हटा देंगे 

इस दफ़ा ना सही लेकिन ये तो होगा इक दिन 
तुझको हर हाल मे हम बस अपना बना लेंगे 

तेरी यादों को कुछ ऐसे हम छुपा लेंगे 
तेरे ख़यालों से अपना रिश्ता निभा लेंगे 
तू नहीं सामने तो भी ऐसा क्या बिगड़ता है 
प्यास आँखों की आंसुओं से हम बुझा लेंगे 

Thursday, April 18, 2024

आवाज़

आदत की बात है ये इन्सां की चाहतों में 
ये दिन के बाद अक्सर ही शाम चाहता है 
हर इक को ज़िन्दगी में एक नाम तो मिला है 
फिर भी वो ज़िन्दगी में एक नाम चाहता है 

जम्हूरियत का होना बस नाम के लिए है 
होता कहाँ है जो कुछ अवाम चाहता है 

जो ज़िन्दगी में अपनी ख़ुद सर नहीं हुआ है 
वो ज़िन्दगी भी अपनी आज़ाद चाहता है 

ना सोचने की कोशिश दमाग़ कर रहा है 
जैसे थका मुसाफ़िर आराम चाहता है 

दर पे खड़ा हूँ तेरे इस तरह जैसे कोई 
बेरोज़गार इन्सां कुछ काम चाहता है 

ऊपर वो आसमा में बादल खड़ा है जैसे 
लम्बी सज़ा का मुजरिम अंजाम चाहता है 

फूलों की ख्वाहिशों में काँटा ही बन चुका है 
वालिद की फ़िक्र बेग़म औलाद चाहता है 

शायर के फ़लसफ़े में मेहनत लगी बड़ी है 
पढता तो शेर है बस इक दाद चाहता है 

बेताब सा सितारा तन्हाइयों का मारा 
कहना है कुछ उसे वो आवाज़ चाहता है 

Monday, April 15, 2024

क्या ख़बर है तेरी

और बता क्या ख़बर है तेरी 
आज कैसे याद आ गई मेरी 
तुम तो मसरूफ़ थे अपनी राहों पे 
आज क्यूँ राह मुड़ गई तेरी 

जबसे मंज़िलें तेरे ख्वाबों में हैं 
और बुलंदी तेरे इरादों में हैं 
नज़र तूने इधर नहीं फेरी 
तो आज कैसे याद आ गई मेरी 

कोई काम निकल आया होगा तेरा 
वरना वक़्त तो काफी ज़ाया होगा तेरा 
कहीं तुझे हो तो नहीं रही देरी 
वैसे कैसे याद आ गई मेरी 

अब आये हो तो ज़रा सुकून कर लो 
ताज़ी सी कुछ साँसें ही भर लो 
सफ़र में बोहोत काम आएँगी तेरी 
और बता क्या ख़बर है तेरी 

Sunday, April 14, 2024

तुम क्या कर रही हो अभी

तुम क्या कर रही हो अभी 
पूछो मुझसे तो कभी 
तुम क्या कर रही हो अभी 
बस यूँही बात कर लो कभी 

क्या तूने मुझको याद किया 
या फिर तू मुझको भूल गया 
क्यूँ लगता है मन को ये पिया  
तू खुद पूछेगा नहीं ... के 

तुम क्या कर रही हो अभी 
बस यूँही बात कर लो कभी 

सारा दिन कैसे निकलेगा 
दिल ख़ाब ये तेरे देखेगा 
तेरा पैग़ाम ये आएगा 
पूछेगा फिर तू यही ... के 

तुम क्या कर रही हो अभी 
पूछो मुझसे तो कभी 

अच्छा लगता है पूछते हो 
मुझको यूँ समझते बूझते हो 
दिल की बातें तुम जानते हो 
मेरे हमदम हो तभी 

बस यूँही बात कर लो कभी 
तुम क्या कर रही हो अभी 
पूछो ना फिर से अभी
तुम क्या कर रही हो अभी 

ज़िम्मेदार

मेरे जीवन के मौसम की तू बहार लगता है 
मैं नैया हूँ भँवर में तू मेरी पतवार लगता है 
किसी के मन में तो कोई उतर सकता नहीं लेकिन 
तेरे एहसास की सौगंध मुझे तू यार लगता है 

बुलाने की कभी तुझको ज़रुरत ही नहीं पड़ती 
मेरा बस सोचना तुझको मेरी पुकार लगता है 

मेरी चाहत मेरे सब शौक़ की बातें न मुझसे कर 
तुझे जो ना गवारा हो मुझे बेकार लगता है 

अलावा तेरे कोई भी न हमसे मिलता जुलता है 
तेरा होना मेरे संसार को संसार लगता है 

मेरी गलती पे मुझको टोकना तेरा मुनासिब है 
ख़फ़ा तुम मुझसे हो जाओ तो मन लाचार लगता है 

अगर जीवन में कोई भी मेरे कोई तमाशा हो 
मेरा ज़िम्मा तू रख लेगा तू ज़िम्मेदार लगता है 

Saturday, April 13, 2024

मज़ा

मुझे आज इतना मज़ा आ रहा है 
जो कुछ चाहिए सब मिले जा रहा है 

पहाड़ों से देखो ये क्या दिख रहा है 
खिलौना वहाँ से कहाँ जा रहा है 
मैं बादल पे बैठूँ या मुट्ठी से पकड़ूँ 
मेरे मुँह से देखो धुंआं आ रहा है 

मैं झूलों पे बैठूं उड़ूँ फिर गगन में 
झुलाओ मुझे क्या मज़ा आ रहा है 
न जाने वो क्या है मेरी छत से देखो 
वो पंछी के जैसा उड़े जा रहा है 

चलाएंगे काग़ज़ की कश्ती बना कर 
वो बादल का टुकड़ा इधर आ रहा है 
चलो भीगते हैं सभी बारिशों में 
अरे मोर देखो यही गा रहा है 

मुझे आज इतना मज़ा आ रहा है 
जो कुछ चाहिए सब मिले जा रहा है 

Friday, April 12, 2024

किताबी फूल

करो मुहब्बत तुम लेकिन कभी इज़हार मत करो 
एक फूल क़िताबों में बेकार मत करो
इक बार में ही सीख लो तुम कर के ये ख़ता
ख़ता ये ज़िन्दगी में बार बार मत करो 

लिखता है कहानी तो लिख कर तू भूल जा 
खुद को ही कहानी का किरदार मत करो 

थोड़ा तो आज़मा लो कहते हैं तजरुबे  
एक तरफ़ा कभी प्यार बे शुमार मत करो 

खायेगा फिर से धोखा अगर प्यार करेगा 
खुद से ही अब खुद को गद्दार मत करो 

कमज़ोर सा ये दिल है, है ये मोम से बना 
अंगार से जला के तार तार मत करो 

इक बार में ही सीख लो तुम कर के ये ख़ता
ख़ता 
ये ज़िन्दगी में बार बार मत करो 
करो मुहब्बत तुम लेकिन कभी इज़हार मत करो 
एक फूल क़िताबों में बेकार मत करो

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...