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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Wednesday, October 9, 2024

माँ

Behr (2122 1212 22)

ममता 
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पूछता था किसी से कल कोई 
क्या है आखिर ये मेहरबाँ होना 
दिल ने तस्वीर ये तसव्वुर की
माँ के पल्लू का आसमाँ होना 

पूजा 
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गर इबादत का है तरीक़ा के
रूह को खुद है राब्ता होना 
क्यों है दरकार फिर इबादत में
बेग़रज़ कोई दरमियाँ होना

सच्चाई 
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बात झूठी तो अच्छी लगती है
तुम को मंज़ूर था गुमाँ होना
बात क्या मैंने एक सच कह दी
लाज़मी था तेरा जुदा होना

प्यार
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प्यार की गुफ़्तगू में है मुमकिन 
चंद लफ़्ज़ों का पास ना होना 
उनसे मिलने के ऐन मौक़े पर 
खुद जुबां का ही बेज़ुबाँ होना 
 
सियासत 
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मुल्क बनते हैं जो बिगड़ने से 
उनका बेहतर है ख़ात्मा होना 
क्या ये सोचा भी है कभी तुमने 
कैसा लगता है बे मकाँ होना 

नसीहत 
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जाओ एक बार आइना देखो 
छोड़ दो खुद से बे इमां होना 
कैसे मंज़ूर है तुझे ऐसे 
दौड़ते खून का थमा होना 
 
ध्यान
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एक ज़रिया है ध्यान का ये भी  
जिस्म से इस तरह जुदा होना 
डूबना है तुझे ख़यालों में 
जैसे शायर का गुमशुदा होना

Monday, October 7, 2024

झूठा नहीं है

Behr (1222 1222 1222 122)

ग़ज़ल कहता हुआ शायर अभी फूटा नहीं है 
है उसका दिल अभी मायूस वो टूटा नहीं है 
समझना है नहीं आसां उसे मैं जानता हूँ 
वो उलटी बात कहता है मगर झूठा नहीं है 

उधेड़ो मत मेरे रिश्तों की गांठें इस क़दर तुम 
मेरी मानो अभी इतना भी वो छूटा नहीं है 
मुझे लगता नहीं वाजिब उसे तोहमत लगाना 
मैं खुद ही लुट गया उसने मुझे लूटा नहीं है 

ये सच है के मुझे मुमकिन नहीं मंज़ूर करना 
किसी में भी यहाँ इतना तो बल बूता नहीं है 
जो मैं मंज़ूर ना हूँ तो भी मुझको देख लेना 
फ़क़त शादाब की खातिर ये अंगूठा नहीं है 

उखड़ तो वो भी जाएगा किसी दिन ज़लज़ले में 
रहा हो ता उमर ऐसा कोई खूंटा नहीं है 
ये दुनिया झूठ है जैसे कोई सपना सुहाना 
यहाँ कुछ सच नहीं है और कुछ सच्चा नहीं है 

वो गुड्डी आसमानों में ही उड़ना चाहती है 
परेतों में मगर उसके अभी सूता नहीं है 
मिलेगी इंतहा ए लल्कारें उसको इस जहाँ में 
मगर अच्छा है के उस से जहाँ रूठा नहीं है 

ये नज़रें खैंचते हो क्या ये लहज़ा लाज़मी है 
कोई सोचो तेरी महफ़िल में क्यूँ आता नहीं हैं 
तसव्वुर खाब की बातें तुम्ही क्या जानते हो 
उन्हें भी खाब आते हैं जिन्हें दिखता नहीं हैं 

Thursday, September 26, 2024

ज़ियादती

ये फ़नकारों की कहते हैं अलामती नहीं करते 

दिल से करते हैं तारीफ़ें बनावटी नहीं करते 

बड़ी खूबी से रखते हैं नाम सबका ये अज़मत से 

ज़िया की आदत है ये भी ज़ियादती नहीं करते 


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जो झलक भी न दिखाए तो फज़ल ही क्या है 

जो समझ सबके ही आये वो अज़ल ही क्या है 

जो तुझे सैर कराये ना  हकीकत की तरह 

जो तरन्नुम न सजाये वो ग़ज़ल ही क्या है 

Wednesday, September 25, 2024

काफ़िर

जो तपन में से जल के कुंदनों सा आता है 
दास्तानों में अपनी सरकशी सुनाता है
व हि तो है इक शाइर का ज़खीरा हम तो बस 
मिसरे कुछ लिखे खुद हि खुद से आशिकी कर ली


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शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
मुझे भी तजरुबा करना था ज़ीस्त का मैंने 
बड़ों के तालिमात-ओ-दर से ज़िन्दगी कर ली 

खाब कल रात खेलता था राज़दारी मैं 
छुपा के बात को रखना था वरना मेरी शह 
और मुझे राज़ छुपाना भी नहीं आता था 
तो ज़ुबान अपनी काट के ही बे-बसी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
 
कोई तशख़ीस करे खुद की क्या मज़ाक़ है ये 
हमने सुन रखा है इफ़रात दर्दनाक है ये 
हमें ना जुर्म दिखा ना ही कोई खुद गरजी 
हमने हर एक ग़म के घर की तलाशी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 
 
जो तजरुबों की तपन में से जल के आता है 
बहर ग़ज़ल में अपनी सर कशी सुनाता है 
वो ही शायर है असलियत में देख लो हम तो 
दो एक शेर लिखे खुद से आशिक़ी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

वो नसीहत भरे कलाम पढ़ा करता था 
वो किसी से भी नहीं बस ख़ुदा से डरता था 
जब उसे इल्म-ओ-नसीहत की बूझ आई तो 
एक काफ़िर ने कलामों से बेरुखी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

तो क्या हुआ जो हम ना हो सके किसी काबिल 
तो क्या हुआ जो मिला है हमें ये मुस्तकबिल 
ग़मों को मिल ना सका ग़म भरा माहौल यहाँ 
तभी ग़मों ने सजाकर हमें खुशी कर ली 
शजर गुलों के रंग से, ज़रा सा ना खुश था 
गुलों ने पीली पत्तियों से दोस्ती कर ली 

Wednesday, September 18, 2024

फ़रेबी

वो मेरा दिल से हो न पाया कभी 
दाग़ मैं दिल के धो न पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

क्योंकि खुशियां भी सलामत न रहीं
मुझको खुशियों की भी आदत न रही
मेरे दुश्मन भी जानते हैं मैं
अपनी ख़ुशियों में खो ना पाया कभी
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी

मैं आदमी के जिस्म में हूँ बसा 
मुझको लोगों ने... जब जब है डँसा  
अश्क़ भी मेरे फ़रेबी निकले 
रोना चाहा तो रो ना पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

हैसियत मेरी किस मिसाल की है 
दर असल बात ये वबाल की है 
खुद परस्ती की ऐसी दुनिया में 
फ़ैसला मेरा हो ना पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो 
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी 

आज ग़मगीन सा है घर मेरा
सबने देखा तो है सफ़र मेरा
मैंने लूटे थे चैन लोगों के 
चैन से मैं भी सो न पाया कभी 
चाहे इस बात को कुछ यूँ कह लो
मैं किसी का भी हो ना पाया कभी

Saturday, September 14, 2024

अख़बार

असली शायर: अदा जाफ़री 

तिरे छत की मिरी छत से नज़र दो चार हो जाना 
बिना इज़हार या इनकार के यूँ प्यार हो जाना 
कभी होता था अपनी गुफ़्तगू का ढंग वो नादिर 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हमारे शेर छपते थे तुम्हारी बात छपती थी 
ना जाने किस जनम की किस वतन की बात कबकी थी 
अगर कुछ याद आए तो ज़हन मेरे उतर आना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

हुआ अरसा ऍ मेरे दोस्त मिलने तो कभी आना 
मेरी बातें भी सुन लेना और अपनी भी सुना जाना 
अगर कोई बात ना आए ज़हन में तो ये कर लेना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

वो मल्लाह आज भी कहता है बाबू और कैसे हो 
हम उसको नोट देते तो कहते थे के पैसे दो 
हमें बैठा के कश्ती में यही वो काम करता था 
कभी इस पार को आना कभी उस पार को जाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना

किसी को सीख देनी हो किसी से सीख लेनी हो 
किसी को दान देना हो किसी से भीख लेनी हो 
जो जैसा हो उसे वैसी ही सूरत अपनी दिखलाना 
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना 

हर इक इंसान पौधे जान की क्या है यहाँ फितरत
बता जाते हैं अज़मत से हर इक शय की यहां कीमत 
यहीं नस्लों ने एक दूजे को जाना और पहचाना
कभी अखबार पढ़ लेना कभी अखबार हो जाना

Friday, September 13, 2024

पत्थर

Behr (2122 121 222)

After learning Behr Grammar

लख्त-ए-खूँ है ये रेत कर देखो 
कैफ़ियत है समेट कर देखो
लाल रंग का है इसमें लावा सा 
अपने हाथों से छेड़ कर देखो
[लख्त-ए-खूँ = blood clot, कैफ़ियत = kahaani)

क्या है के ज़िन्दगी तो नाटक है
और किरदार सबके आवारा
हर दफा तुम ही क्यूं बनो क़ातिल
इक दफ़ा मौत का भी डर देखो

देख ताज़ा हवा के ये झोंके 
शोर करते हैं ये तुझे होके 
दिल में लहरों सी गुदगुदी होगी 
एक पत्थर तो फ़ेंक कर देखो 


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Before learning behr Grammar

लख्त-ए-खूँ है रेत कर देखो 
ये कैफ़ियत समेट कर देखो 
चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 
[लख्त-ए-खूँ = blood clot, कैफ़ियत = kahaani, नुमाइश  = exhibition]

फिर किसी का दिलरुबा होना 
मेरी वफ़ा का बेवफ़ा होना 
अपने दिल की ख्वाहिशों के लिए 
इक दफ़ा तुम फ़रेब कर देखो 
चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 

देख ताज़ा हवा के ये झोंके 
शोर करते हैं ये तुझे होके 
दिल में लहरों सी गुदगुदी होगी 
एक पत्थर तो फ़ेंक कर देखो 
चोट दिल पर है नुमाइश के लिए 
आओ आ जाओ कुरेद कर देखो 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...