सच और झूठ किसे कहते हैं
ये भी हमें मालूम न था
हम किस्के घर में रहते हैं
ये भी हमें मालूम न था
रात का साथी दिन को बिछ्ड़ा
तो कुछ बाद्ल घिर आये
दिन और रात इसे कहते हैं
ये भी हमें मालूम न था
घर की याद कभी जब आई
तो आई की याद आई
घर पे मां तनहा रहती है
ये भी हमें मालूम न था
थोड़ी दूर पे दैर-ओ-हरम है
फिर भी भटकते हैं सारे
कौन ख़ुदा है कौन तमाशा
ये भी हमें मालूम न था
कैसी क़सद है कैसी क़सद है
जीना मरना दूभर है
जीते रहना अपनी सज़ा है
ये भी हमें मालूम न था
बारिश से बचकर जो निकले
फ़िसलन से ना बच पाये
सबके नसीब में येही लिखा है
ये भी हमें मालूम न था
ख़ुद अपने ही हाथों सूली
चढ़ने की ठानी हमनें
दुनियादारी एक सज़ा है
ये भी हमें मालूम न था
तुमको क्या मालूम है कहते
तुम तो ठहरे अनजाने
दुनिया को मालूम है सबकुछ
ये भी हमें मालूम न था
About Me
- Vivek Pohre
- I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.
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"..बारिश से बचकर जो निकले
ReplyDeleteफ़िसलन से ना बच पाये
सबके नसीब में येही लिखा है
ये भी हमें मालूम न था.."
ख़ूबसूरत शेर.
बढ़िया ग़ज़ल. :)