कुछ रिश्तों के नाम न होते
तो उनके अंजाम न होते
तो उनके अंजाम न होते
राह पे गर मुड़ना ना होता
तुम पर ये इलज़ाम न होते
अश्कों से ख़ुद ही धुल जाते
गर उनके हमाम न होते
पहले जा कर मिल लेते तो
तुम इतने हैरान न होते
अपनी महफ़िल कौन सजाता
जो इतने निज़ाम न होते
हम जो न रुकते तेरी खातिर
वो तेरे पैग़ाम न होते
दिल से दिल तक बात पोहोचती
तो जलसे सुनसान न होते
प्यार से माँगा होता तुमने
इस ख़िदमत के दाम न होते
सब के सब गर मुलहद होते
मंदिर में फिर राम न होते
जंगल से बाहर ना निकलते
तो फिर हम इंसान न होते

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