लहरों की तरह जज़्बात भी होते हैं
गिरते उठते हँसते और रोते हैं
जीवन की मंज़िल मौत के धागे से
जुड़कर फिर से जीवन ही होते हैं
हर मौज में इतना शोर के सन्नाटे
आराम से गहराई में सोते हैं
कुछ कहती है हर बूँद ये जीवन की
कुछ शख्स यहाँ पहचान के होते हैं
आवाज़ नहीं होती गहराई में
ऐसे ही तो वाक़िफ़ भी होते हैं
दीखता तो नहीं है कुछ भी पानी में
जाईके में नमकीन से होते हैं
बुनियाद की अज़मत इतनी होती है
इसके जानिब दुःख खुद भी रोते हैं
हम तुम आकर जीवन के सागर में
मोती की तरह किरदार पिरोते हैं

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