हर कोई अच्छा भी है सच्चा भी है और है भला
एक हम बेज़ार ज़ालिम हैं जहन्नम की तरह
बस ज़मीं पे कुछ लक़ीरें खींच कर कहते हैं लोग
अब से ये है मुल्क मेरा, मुल्क वो अबसे तेरा
है ज़रूरी मुस्कुराना एक गुड़िया की तरह
आग है हर दिल में बस उठता नहीं कोई धुआँ
हर कोई चाहता है कहना अपनी अपनी दास्ताँ
सबके अपने ज़ख़्म अपने दर्द, अपने हैं निशाँ
कुछ शिकन हो तो इबारत का पता चलता भी है
मौत है शक्लों पे जिनकी कौन दे उनको दवा
जाएज़ा अपना लिया महसूस दुनिया से हुआ
सबकी अपनी है जुबां और सबके अपने हैं बयान

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