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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Wednesday, June 26, 2024

हुजूम

रात ढल गई दिन गुज़र गए 
और बेवझा हम ठहर गए 
क्या हुजूम था अपने नाम का 
हम ना हम रहे हम जो थम गए 

सूनापन मिला था नसीब में 
वो ना भर सके बस उलझ गए 

कोशिशें तो की अपनी ओर से 
फिर भी दौड़ में हम पिछड़ गए 

तय हुआ था जो वो ज़ुबान थी 
अपनी बात से वो मुकर गए 

इक सवाल था लाजवाब था 
तेरे बिन कहे हम समझ गए 

चंद वक़्त को जो खड़े रहे 
जाने वो कहाँ और किधर गए 

वक़्त की तरह सब मिले हमें 
रेत की तरह सब फ़िसल गए 

हमको चाह थी बस सुकून की 
खाब ही तो थे अब बिखर गए 


-- partnered creation by दीपाली & विवेक पोहरे 

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