रात ढल गई दिन गुज़र गए
और बेवझा हम ठहर गए
क्या हुजूम था अपने नाम का
हम ना हम रहे हम जो थम गए
सूनापन मिला था नसीब में
वो ना भर सके बस उलझ गए
कोशिशें तो की अपनी ओर से
फिर भी दौड़ में हम पिछड़ गए
तय हुआ था जो वो ज़ुबान थी
अपनी बात से वो मुकर गए
इक सवाल था लाजवाब था
तेरे बिन कहे हम समझ गए
चंद वक़्त को जो खड़े रहे
जाने वो कहाँ और किधर गए
वक़्त की तरह सब मिले हमें
रेत की तरह सब फ़िसल गए
हमको चाह थी बस सुकून की
खाब ही तो थे अब बिखर गए
-- partnered creation by दीपाली & विवेक पोहरे

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