एक संत एकांत सजावत
हूँ का परिचय ढूँढत है
ज्यों परिचय की परत उघारत
फिर फिर अखियाँ मूँदत है
ना तन ना मन ना जग चिंतन
हूँ का रूप ना पूरत है
ना है सत देखे जो दर्पण
ना सत आपन मूरत है
तात मात ना पुत्र ना पुत्री
ना है मरद ना औरत है
बिधी धारत छाड़त ढूँढन की
हूँ तो प्रगट ना होवत है
मानुस पंछी जन्तु सब ही
घट है घट घट जीवन है
घट चालत जाके कारण वह
कवन न जानत ईंधन है

Vivek, you are a multi talented personality 👍
ReplyDeleteThank you Bhaiya
DeleteSuperb
ReplyDeleteVersatile and Multi Talented Vivek
ReplyDelete24-08-2024 Baithak Bangalore
ReplyDelete