आज फिर बारिश हुई
फिर भी हम रोए नहीं
रात भर बिजली गिरी
और हम सोए नहीं
करवटों से सिलवटें
रात भर बढ़ती रही
फैसलों के वास्ते
हम कहीं खोए नहीं
ये भी कैसी बात है जो
लफ़्ज़ में ढलती नहीं
अपने दामन मुह छुपाकर
कबसे हम रोए नहीं
ये भी सच है इस में तेरी
और मेरी गलती नहीं
रात भर बिजली गिरी
और हम सोए नहीं
आज फिर बारिश हुई
फिर भी हम रोए नहीं
रात भर बिजली गिरी
और हम सोए नहीं

No comments:
Post a Comment