राग़िब न कर मेरी रूह को
अरमाँ ये खो गए हैं
रहने दो चाँद की ज़द अभी
वो ख़याल सो गए हैं
तेरी जीत का मेरी हार का
हर बार का जो है सिलसिला
है क़रार अहद-ए-ख़िलाफ़ का
कहाँ ज़ख्म ये नए हैं
जो दिला रहे तुझे हौसले
रख उनसे भी कुछ फ़ासिले
मुझे क्या पता तेरे दिल में वो
क्या शुबा सा बो गए हैं
ये इधर उधर की ही बात है
कभी साथ है कभी मात है
अब क्या कहें के वो कौनसा
दुःख अपना रो गए हैं

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