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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Wednesday, September 4, 2024

तो क्या

अगर तू है तो क्या है 
अगर मैं हूँ तो क्या 
ये मजमा बे पनाह है 
मैं ना रहूँ तो क्या 
[मजमा = भीड़]

कहाँ ख़ुश है तू फिर भी 
तुझे कितना मिला
मिले हमें मिले जो 
जो ना मिले तो क्या 

ख़्वाहिशें खिल ना पाई 
सिलसिला-ए-गिला 
कभी मिले नहीं जो  
जुदा हुए तो क्या 

ये मुमकिन है के तुझसे 
प्यार उसको न हो 
मगर फिर सोचता हूं
अगर हुआ तो क्या 

चंद टुकड़ों की खातिर  
ज़दें दिखला मुझे 
जो हासिल कर लिया तो 
न कर पाए तो क्या 

हजारों चाँद तारे 
अकेला आसमाँ 
अगर ये आसमाँ में
ना होते भी तो क्या 

रोज़ बातें वही हैं 
नया कुछ भी नहीं 
जुगाली आदतों की 
अगर कर ली तो क्या 

मिला ऐसा ना कोई 
कहे जो फैसला 
मेरे हक़ में हुआ है 
ना होता भी तो क्या 

रवायत है के दुनिया 
वजाहतों से है 
है अफ़सुर्दा ज़माना 
ख़ुदा भी है तो क्या 
[रवायत = रिवाज़, वजाहत = आदर, अफ़सुर्दा = बे-हाल]
 
ये बातें कह रहा हूँ 
तो लगता है मुझे 
मुझे सबने सुना है 
न भी सुना तो क्या

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