Bahr: 2122-1122-1122-112
कौन पढ़ता है क़िताबों के ये औराक़ सभी
याद रहते हैं किसे प्यार के आग़ाज़ कभी
राब्ता हैं यूँ सभी हम से हो बर्बाद ये दिल
बस तमाशे की तरह देखते अंजाम सभी
दिल को पत्थर का बना कर किसी बच्चे कि तरह
आग रगड़न से लगाते हैं ये मुश्ताक़ सभी
कश म कश दिल में लिए जो भी मिला कहता मुझे
दिल कशी से ही तो होती है ये शुर वात सभी
दिल कि चोटों से निखर आएं मेरे नक़्श नयन
हर्ज क्या है जो तराशे कोई चट्टान कभी
मैं तसव्वुर कि ही बातों से महक जाऊ यहाँ
वो हक़ीक़त में नहीं होता है इफ़रात कभी
[तसव्वुर = imagination , इफ़रात = satisfy]
गर्मी ए दिल पे ही नाचेगा ये पारे का जुआ
ये हैं 'ज़ाहिर' दिल ए बर्बाद के अलफ़ाज़ सभी

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