बात कहने को बात कहनी थी
जो अनकही थी दिल में रहनी थी
बोझ कैसे उतरता दिल का भला
दिल कि बातें न थी वो ज़हनी थी
गिर गई वो चलो अच्छा ही हुआ
वो इमारत कभी तो ढहनी थी
ख़ुद को अब भी मेरा बताने को
उसने मेरी ही शाल पहनी थी
जाने कैसे हुआ पलट क्यूँ गई
जो हवा मेरी ओर बहनी थी
उससे वा बस्त होके 'ज़ाहिर' था
तंज़ ओ फ़िक्रों की बात सहनी थी
फूल तूफ़ान आ के लेके गया
बच गई सिर्फ़ एक टहनी थी

No comments:
Post a Comment