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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Thursday, August 22, 2024

क्या मिला

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 
है कैसी किस जहां की
तेरी अय्याशियां 

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 

इंसानों में बसे हो 
हैवानों की तरह 
और बातें कर रहे हो 
देवताओं की तरह 

क्या मिला क्या मिला 
ये बता दो क्या मिला 
एक नन्ही चिड़िया को  
तुझे रौंद के क्या मिला 

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 

कितना है बदगुमां तू 
किस मिट्टी का बना तू 
कातिल है रहमतों का 
और बनता रहनुमा तू 
फरमान दे रहा है 
ना फरमानों की तरह 

क्या मिला क्या मिला 
इक फूल को कुचल कर 
क्या मिला क्या मिला

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 

तेरी तो मिलकियत है 
अपनी क्या हैसियत है 
लाचारों को मिटाना 
क्या ये ही इंसानियत है 
सदमों से घिर चुके हम 
हैरानों की तरह 

क्या मिला क्या मिला 
करके ये क्या मिला 
हम सब पे ज़ुल्म ढा कर  
क्या मिला क्या मिला 

Sunday, August 18, 2024

ख़ुद गर्ज़

ऐसे कैसे ये तुमने सोच लिया 
आज के बाद भूल जाओगे 
इतना आसाँ भी नहीं बच पाना 
हर तरफ अक्स मेरे पाओगे 

तुम जो जाने की बात करते हो 
जो हम गए तो जान जाओगे 
बड़ी मुश्किल से रात गुज़रेगी 
बिन मेरे रह ही नहीं पाओगे 

बात ऐसी अगर करोगे तो 
क्या मेरा साथ तुम निभाओगे 
दो घडी बैठ के बातें तो करो 
क्या पता खुद ही मान जाओगे 

तेरी शर्तों के ऐसे पैमाने 
और कितना मुझे रुलाओगे 
प्यार ख़ुद गर्ज़ तो नहीं होता 
प्यार होते ही समझ जाओगे 

Saturday, August 17, 2024

साँस

जुदा हुए थे कभी और कब मिलेंगे भला 
आज भी ज़िंदा मैंने अपनी प्यास रक्खी है 
ज़मी से मेल कभी ना कभी तो होगा ही 
के चाँद ने तो आज भी ये आस रक्खी है 

ये ज़िन्दगी का सफ़र सांस की अमानत है 
तो क्यूँ शिकन यूँ लबों पर उदास रक्खी है 
अपनी साँसों से चुराकर बड़ी हिफ़ाज़त से 
नाम तेरे भी मैंने एक साँस रक्खी है
 
यकीं नहीं तो देख दिल मे मेरे झांक ज़रा 
ज़ियादती वो इश्क की संभाल रक्खी है 
भंवर उठा तो तुझे प्यार खैंच लाएगा 
के मैंने दिल मे क़ैद वो भड़ास रक्खी है

ज़ख़्मी

देखूँ तुझे दुआ करूँ 
दिन रात यही ख़ाब 
लेकिन अगर चश्मा न हो 
देखूं क्या तुझे ख़ाक 

महसूस तो होती है 
तेरी रंगत तेरी ख़ुश्बू 
सोने दे हुई रात अब 
आ जाएंगे जुगनू  

सब कहते हैं फूलों से हैं 
लब तेरे गुलाबी 
लेकिन ज़रा कम कर ले 
तू ये पेट की चर्बी 

ज़ख़्मी मेरा दिल है अगर 
वजहों में तेरा नाम 
बातें ज़हन की भूल कर 
चुपचाप करो काम  

Friday, August 16, 2024

रब

Bahr" 
  • 1222
  • 1222
  • 1222
  • 1222

  • समझने की जो बातें थी उन्हें मैं बद समझ बैठा 
    जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 

    पहन कर मुस्कराहट सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
    मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहा ज़ो दब समझ बैठा 

    क्या मैं मासूम था या फिर ये मेरी बेवक़ूफ़ी थी 
    किसी का हाथ देखा तो उसे मैं हद समझ बैठा 

    यहाँ इंसान चूहों की तरह दौड़ाए जाते हैं 
    हर इक इंसान लालच में तलब से दौड़ने बैठा 

    उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
    के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

    वो माली का जो बेटा है बड़ा नादान बच्चा है 
    जिसे देखा बड़ी गाड़ी में बस साहब समझ बैठा

    यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
    बना कर के मशीनें खुद को इंसां रब समझ बैठा  

    बड़े नुस्खे नहीं थे ज़िन्दगी में कामयाबी के
    बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

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    समझने की जो बातें थी उन्हें गलत समझ बैठा 
    जो गिरहन का अँधेरा था उसे मैं शब् समझ बैठा 

    मुस्कराहट पेहेन कर सब यहाँ बाहर निकलते हैं 
    मैं बाज़ारू तवज्जोः को लिहाज़ अदब समझ बैठा 

    क्या मैं मासूम था या फिर ये मेरी बेवक़ूफ़ी थी 
    किसी का हाथ देखा तो उसे मदद समझ बैठा 

    यहाँ इंसान चूहों की तरह दौड़ाए जाते हैं 
    हर इक इंसान लालच में दौड़ने को तलब बैठा 

    उन्हें कहना उन्हें सुनना बड़ा पेचीदा लगता है 
    के उनकी बात नाहक़ ही मैं कब से सच समझ बैठा 

    एक बेटा है माली का बड़ा नादान बच्चा है 
    गाड़ियों में जिन्हें देखा उन्हें साहब समझ बैठा 

    यही मैं सोचता हूँ के कहाँ और कब समझ बैठा 
    बना कर के मशीन इंसान खुद को  रब समझ बैठा 
     
    पूछते हैं लोग अक्सर कामयाबी के कुछ नुस्खे 
    बड़ी छोटी सी ख्वाहिश थी जिसे मैं सब समझ बैठा

    Wednesday, August 14, 2024

    बात

    बहरों के सामने तू आवाज़ क्या करेगा 
    ख़ुद उड़ सके न उनको आज़ाद क्या करेगा 

    चादर को ओढ़ते हैं अपना क़फ़न समझ कर 
    तू उनसे ज़िन्दगी की फ़रियाद क्या करेगा 

    इल्ज़ाम हर किसी पर लाज़िम नहीं है क्यों कि  
    जो साथ ही नहीं था वो याद क्या करेगा 

    मायूस है वो मुझसे ये सोच कर के मेरी 
    बर्बाद ज़िन्दगी को बर्बाद क्या करेगा 

    रेहमत उसे न बक्शो वेह्शी है वो दरिंदा 
    पहले ही मर चुका है जल्लाद क्या करेगा 

    साँसें ये चल रही हैं कह दे तू जो है कहना 
    जो सांस रुक गई तो फिर बात क्या करेगा 

    Sunday, August 11, 2024

    सादा दिली

    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना - २ 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    महफ़िल में इक दफ़ा भी मुझे देखता नहीं 
    तन्हाईयों में मुझको मनाता है आइना
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    मुझसे ही मांगता है रौशनी के सौ दिए 
    एहसान मेरे मुझको गिनाता है आइना 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    रखा था कब से हमने संभाले जिस आग को 
    आंसू की शक्ल उसको बुझाता है आइना 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    बातें बनाओगे वो भी तुम इसके सामने?
    दुनिया की सारी बातें जानता है आईना
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    सादा दिली मगर ये किसी को न आ सकी
    कोई न चाह कर भी बन सका है आइना 
    ख़ाबों के जैसे अक्स दिखाता है आइना 
    तस्वीर कैसी कैसी बनाता है आइना 

    ख़ामोशी

    ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...