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I am a music, art, culture enthusiast and like to flow as the nature takes me. I write poetries and shayris. I use my Pen Name as 'Zaahir'. Zahir means 'Expression'. In some contextual sense it also means 'Obvious'.

Thursday, February 29, 2024

नशा

किसी ने ये पूछा मुझे कल कहीं 
कहीं मुझको तेरा नशा तो नहीं 
नहीं है नशा कह तो डाला मगर 
बता उसका कहना सही तो नहीं 

सही तो नहीं ऐसा लगता नहीं 
मगर तुम किसी से ये कहना नहीं 
मुझे भी ज़रा तू बता तो सही 
कहीं तुझको मेरा नशा तो नहीं 

न जाने क्यूँ दिल में ये रफ़्तार है 
न जाने के किस्से किसे प्यार है 
तेरी धक् मेरी धक् से धक्-धक् हुई 
कहीं हमको कोई नशा तो नहीं 

Tuesday, February 27, 2024

मौज

मौज हूँ मौज अपनी लॅहॅरों का
कोई ढांचा नहीं हूँ नॅहॅरों का
इक हवा हूँ मनचली सौंधी 
कोई तूफ़ाँ नहीं हूँ शहॅरों का 

बात सुन लो समंदर की ज़रा
क्या बड़ा है सवाल लॅहॅरों का 

फ़ितरतों का तो उसे ख़ौफ़ कहाँ (फ़ितरत = someone's nature)
जाम पीता है रोज़ ज़हॅरों का

कुछ तवज्जू हमें भी बख़्शा करो (तवज्जू = attention)
दिल तड़पता नहीं है ग़ैरों का 

तोडना है नहीं मुझे आसां  
कोई शीशा नहीं हूँ मॅहॅलों का

माना एक हर्फ़ हूँ शेरों का तेरे (हर्फ़ = letter /alphabet)
इक इबारत हूँ तेरे चॅहॅरों का (इबारत = expression)

दिल की बातों को दिल से लिखता हूँ 
ना करो ज़िक्र मेरी बेह्रों का (ज़िक्र = discussion, बेह्र = meter/rythm)

ये घडी दो घडी जो थम जाए 
देख लूँ जज़्बा मैं भी कॅहॅरों का (जज़्बा = passion)

फिर जुदाई की बात करते हो 
चेहरा तेरा है कितने चेहरों का

एक बारी हज़ार बार हुई 
तजरुबा है मुझे भी पॅहॅरों का (तजरुबा = experience)

न होते

कुछ रिश्तों के नाम न होते 
तो उनके अंजाम न होते 
राह पे गर मुड़ना ना होता 
तुम पर ये इलज़ाम न होते 

अश्कों से ख़ुद ही धुल जाते 
गर उनके हमाम न होते 

पहले जा कर मिल लेते तो 
तुम इतने हैरान न होते 

अपनी महफ़िल कौन सजाता 
जो इतने निज़ाम न होते 

हम जो न रुकते तेरी खातिर 
वो तेरे पैग़ाम न होते 

दिल से दिल तक बात पोहोचती 
तो जलसे सुनसान न होते 

प्यार से माँगा होता तुमने 
इस ख़िदमत के दाम न होते 

सब के सब गर मुलहद होते 
मंदिर में फिर राम न होते 

जंगल से बाहर ना निकलते 
तो फिर हम इंसान न होते 




Monday, February 26, 2024

नज़र

बाग़ रंगत के गीत गाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 
दिल धड़कना भी सीख जाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

यूँ पुकारा ना करो टीलों से 
पीछे पीछे ही चले आएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

लब तो हैं पर वो रोशनाई कहाँ 
बात कहना भी सीख जाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

ज़ख़्म दिल का कुरेद कर देखो 
चीज़ इक कीमती दिखाएँगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

रात की बात भूल जाओ तुम  
दिन बता कैसे ये बिताएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

आँख आंसू बहाते हैं साक़ी 
आंसू बहना ही भूल जाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

तेरी शतरंज में मिसाल कहाँ 
खुद की बाज़ी से मात खाएंगे 
तुम अगर इक नज़र ही देख लो 

Saturday, February 24, 2024

लिफ़ाफ़े ( एक नज़्म )

demo

उनकी यादों के लिफ़ाफ़े को आज खोला है 
कितनी प्यारी सी ये तस्वीर मिली है मुझको 
जी में आता है के सारे वो लम्हे फिर से जिऊँ   
क्या ख़बर कौन से पल ये नज़ारा छिन जाए 

वो बिछड़ते नहीं तो आज ये दिन ना मिलता 
उनकी यादों के इस सुहाने पल को जीने का 
वो बिछड़ते नहीं तो ख़ाब में आते भी नहीं 
चलो अच्छा ही हुआ वो बिछड़ गए मुझसे 

कौन से तीर मार डाले मिल के लोगों ने 
मैं तो खुश हूँ बिछड़ के भी आज दिलबर से 
कभी तो दिल में ये आता है के बुला लूं उन्हें  
फिर ख्यालों में ही उनके मैं डूब जाता हूँ 

क्या ये होगा भी कभी वो ही चले आएंगे 
दर पे दस्तक सी करेंगे या चले जाएंगे 
जी मचलता है यही सोचकर जो आएं वो  
क्या कोई बात बची भी है उन से कहने को 

उनको शायद मेरे एहसास का पता भी नहीं 
वो जो ख़ुश हैं तो मेरा दिल ख़ुशी में डूबा है 
मैंने बरसों के बाद जाने क्यों दराज़ों से 
उनकी यादों के लिफ़ाफ़े को आज खोला है

सुकून

वो बोलते हैं कई बार परेशां होकर 
ज़िन्दगी में कभी कभी सुकून मिलता है 
मैं सोचता हूँ कभी दिल से मेरे इस दिल को 
सुकून ना मिले तभी सुकून मिलता है 

सब यहाँ दौड़ में होड़ों में घिरे रहते हैं 
ढूंढते हैं कहाँ कहाँ सुकून मिलता है 
कोई डगर नहीं मिली न ठिकाना के जहां 
लोग कहते हों के यहाँ सुकून मिलता है 

मुतालबा सुकून का तो इस क़दर है बढ़ा 
के दस्तियादियों के नाम ख़ून मिलता है 
सुकून लफ्ज़ बचा है यही ग़नीमत है 
सुकून को भी तो कहाँ सुकून मिलता है 

मुझसे कहते हो मगर कैसा है ये तेरा शहर 
सुकून ढूंढता हुआ जूनून मिलता है 
झाँक कर देख लें ज़रा ये गरेबाँ में कभी 
कोई नहीं वहां जहाँ सुकून मिलता है 

Friday, February 23, 2024

किश मिश

ज़िन्दगी में कभी ऐसी
फिर से आतीश नहीं होती (आतिश = light)
तुझको पा ही लेते गर हम 
फिर ये ख़्वाहिश नहीं होती (ख़्वाहिश = desire)

इश्क़ में बादल बारिश की
आज़माइश नहीं होती (आज़माइश = test)
शायरी फिर भी कर लेता
ऐसी कोशिश नहीं होती 

तू अगर मेरे ख़्वाबों में 
सारी गर्दिश नहीं होती (गर्दिश = rotation, everywhere)
शेर तुझपे तो पढ़ देता 
ऐसी लर्ज़िश नहीं होती (लर्ज़िश = vibrato)

सोच अपने सफर में गर 
ऐसी बंदिश नहीं होती (बंदिश = restriction)
खीर में सब कुछ तो होता 
मगर किश मिश नहीं होती 

ख़ामोशी

ख़ुश्क यादों का भँवर है ये मेरी  ख़ामोशी तल्ख़ लहजे का असर है ये मेरी  ख़ामोशी मैं जो ख़ामोश हूं सुन सकता हूं दुनिया तुझ को जज़्बा-ए-शौक़-ए-ज़बर ...